चीन की पांच बड़ी सफलताएं, जो उसे अंतरिक्ष में सुपर पावर बनने में मदद करेगा

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चीन का दावा है कि उसने चंद्रमा के दूसरी ओर के हिस्से में रोबोट अंतरिक्ष यान उतारने में सफलता पाई है.
चीन के सरकारी मीडिया ने बताया है कि बिना व्यक्ति वाले यान चांग'ए-4 दक्षिणी ध्रुव एटकेन बेसिन पर पहुंच चुका है और वो वहां की स्थितियों का न सिर्फ़ जायज़ा लेगा बल्कि जैविक प्रयोग भी करेगा.
चीन की मीडिया का कहना है कि इस अंतरिक्ष यान के उतरने को 'अंतरिक्ष की खोज में एक मील के पत्थर' के रूप में देखा जा रहा है.
चीन के अंतरिक्ष कार्यक्रमों की शुरुआत महज़ डेढ़ दशक पहले ही हुई है, ऐसे में चीन के इस दावे को सही मान लिया जाए तो यह देश के लिए एक बड़ी सफलता हो सकती है.
साल 2003 में चीन ने पहली बार अंतरिक्ष में इंसान को भेजने में सफलता पाई थी. सोवियत यूनियन और अमरीका के बाद चीन तीसरा देश है, जिसने यह सफलता पाई है.
अगले पांच सालों में अंतरिक्ष को लेकर चीन की कई महत्वाकांक्षी योजनाएं हैं. वो दुनिया का सबसे बड़ा स्पेस टेलीस्कोप, सबसे वज़नदार रॉकेट और स्पेश स्टेशन लॉन्च करने की योजना बना रहा है, जो उसे दुनिया का अगला स्पेस सुपर पावर बनने में मदद करेगा.
लेकिन अभी तक चीन ने अंतरिक्ष मिशन के मामले में क्या-क्या बड़ी उपलब्धियां हासिल की है, चलिए जानते हैं...

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चांद पर चीन की सफलता
चांग'ए कार्यक्रम का नाम चीन की उस देवी के नाम पर रखा गया है जो कहानियों के मुताबिक़ चांद पर चली गई थीं.
यह कार्यक्रम साल 2003 में शुरू हुए मिशन का हिस्सा है, जिसका मक़सद साल 2036 तक चांद पर इंसान उतारने का है.
चीन का चांग'ए-4 मिशन बेहद मुश्किल और ख़तरनाक है क्योंकि इसमें अंतरिक्ष यान को चंद्रमा के उस हिस्से में उतारना था जो अब तक छिपा रहा था.
इस हिस्से से धरती से सीधा संपर्क बनाए रखना आसान नहीं होता क्योंकि चांद का वातावरण ही संपर्क तोड़ देता है. इस समस्या के समाधान के लिए चीन ने पृथ्वी और चांद के बीच एक विशेष सैटेलाइट को लॉन्च किया जो अंतरिक्ष यान और चांग'ए 4 से संपर्क बनाए रखने में मदद करता है.
चांग'ए-4 वहां की धरती की पड़ताल करेगा और वहां आलू और दूसरे पौधे के बीज भी लगाएगा. वो वहां रेशम के कीड़े के अंडे पर भी प्रयोग करेगा.
अभी तक हमलोगों ने चांद की रोशनी वाला हिस्सा ही देखा था क्योंकि चांद अपनी धुरी पर घूमने में उतना ही वक़्त लेता है जितना पृथ्वी की कक्षा के चक्कर लगाने में.
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सबसे अधिक रॉकेट लॉन्च
बीते साल 2018 में चीन ने दूसरे देशों से मुक़ाबले सबसे अधिक रॉकेट लॉन्च किए थे. कुल 39 रॉकेट लॉन्च में सिर्फ़ एक ही असफल रहा था. वहीं साल 2016 में कुल 22 रॉकेट लॉन्च किए गए थे.
साल 2018 में अमरीका ने 34 और रूस ने 20 रॉकेट लॉन्च किए थे. अमरीका ने साल 2016 में अपने अंतरिक्ष कार्यक्रमों पर 36 बिलियन डॉलर ख़र्च किए थे, वहीं चीन का ख़र्च इस साल महज़ पांच बिलियन डॉलर का था.
ज़्यादा से ज़्यादा सैटेलाइट लॉन्च करने के लिए चीन वज़नदार रॉकेट बना रहा है, जिसका दोबारा इस्तेमाल किया जा सकेगा.
अमरीका की कई प्राइवेट कंपनियां कम क़ीमत के रॉकेट बना रही हैं, हालांकि चीन की प्राइवेट कंपनी का पहला रॉकेट अपने अभियान में असफल रहा था.
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स्पेस स्टेशन
चीन ने 2011 में स्पेश स्टेशन के कार्यक्रमों की शुरुआत की थी. ये स्टेशन छोटा था, जिस पर अंतरिक्ष वैज्ञानिक बहुत कम दिनों के लिए ही ठहर सकते थे.
साल 2016 में इसने काम करना बंद कर दिया. चीन ने इसी साल इस बात की पुष्टि की थी कि उनका स्पेस स्टेशन द तियांगोंग-1 से संपर्क टूट गया है.
पिछले साल 2018 में यह अनुमान लगाया गया था कि इस बंद पड़े स्पेस स्टेशन का मलबा 30 मार्च से दो अप्रैल के बीच धरती पर गिर सकता है.
हालांकि यह अप्रैल में दक्षिण प्रशांत महासागर में गिरा था.
चीन का दूसरा स्पेस स्टेशन तियांगोंगे-2 सेवा में है और बीजिंग ने यह तय किया है कि 2022 तक अंतरिक्ष में वो मानवसहित स्पेस स्टेशन लॉन्च करेगा.
सैटेलाइट के ख़िलाफ़ मिसाइल टेस्ट
साल 2007 में रूस और अमरीका के बाद चीन तीसरा ऐसा देश बना जो यह प्रदर्शित किया कि वो अंतरिक्ष में किसी भी सैटेलाइट को ध्वस्त कर सकता है.
यह समझा जाता है कि चीन ने ज़मीन से एक मध्यम रेंज के मिसाइल का प्रयोग मौसम सैटेलाइट को ध्वस्त करने के लिए किया था. यह सैटेलाइट 1999 में लॉन्च किया गया था.
इसके बाद चीन की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आलोचना हुई. चीन ने अपनी प्रतिक्रिया में कहा था कि वो अंतरिक्ष में किसी तरह के शसत्रीकरण के ख़िलाफ़ है और वो हथियारों की दौड़ में नहीं है.

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2016 में उसने अंतरिक्ष में अलोंग-1 उतारा जो अंतरिक्ष में फैले कचरे को इकट्ठा करने में सक्षम था.
चीन के अंतरिक्ष कार्यक्रमों से जुड़े अधिकारियों का कहना है कि अलोंग-1 पहला ऐसा सैटेलाइट है जो स्पेस कचरे को इकट्ठा करता है और इसे धरती पर वापस जाने से रोकता है.
नासा के मुताबिक़ अंतरिक्ष में कचरे का लाखों टुकड़ा इधर-उधर तैर रहे हैं जो सैटेलाइट और धरती, दोनों के लिए ख़तरा साबित हो सकते हैं.
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चिंता इस बात की है कि युद्ध के समय चीन इस तरह की तकनीक का इस्तेमाल दुश्मन देशों के सैटेलाइट को ध्वस्त करने में कर सकता है.
पिछले साल अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने अपनी सेना को यह आदेश दिया था कि वो सशस्त्र बलों की छठी शाखा 'स्पेस फोर्स' के रूप में विकसित करे.

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सुरक्षित संचार
बात जब साइबर स्पेस की हो तो सूचना को सुरक्षित रखना एक चुनौती समझा जाता है.
चीन ने इस मामले में साल 2016 में सफलता हासिल की जब उसने एक ऐसे सैटेलाइट को लॉन्च किया जो बिना रुके गुप्त रूप से सुरक्षित सूचना प्रदान करने में सक्षम था.
इसे कॉन्टम कम्यूनिकेशन कहते हैं, जिसमें दो पक्ष गुप्त सूचनाओं का आदान-प्रदान कर सकते हैं और उसकी भनक किसी को नहीं लगती है.
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