क्या मदद के नाम पर दुकान चला रही हैं गूगल जैसी कंपनियां

इमेज स्रोत, Getty Images
- Author, साइमन जैक
- पदनाम, बिज़नेस संपादक
आज के डिजिटल दौर में जब जानकारी ताक़त है, क्या यह मानना ठीक होगा कि गूगल इस वक़्त दुनिया की सबसे ताक़तवर कंपनी है?
गूगल ने आज तक किसी भी कंपनी से ज़्यादा जानकारी जमा करके डिजिटाइज़ की, उसका विश्लेषण किया और फिर पेश की है.
गूगल आपके बारे में किसी से भी ज़्यादा जानता है. क्या सरकार जानती है कि आपके घर में कुत्ता है या नहीं? गूगल जानता है.
लेकिन ताक़त के साथ ही ज़िम्मेदारी भी आती है. ताक़तवर से उम्मीद होती है कि वह अपनी ताक़त का इस्तेमाल समाज की भलाई के लिए करेगा.
लेकिन क्या एप्पल, फ़ेसबुक और अमेज़न जैसी बड़ी तकनीकी कंपनियां इस कसौटी पर खरी उतरती हैं?

इमेज स्रोत, Getty Images
डिजिटल गैराज - समाज सेवा या स्वार्थ सिद्धि?
मैं गूगल की सीएफ़ओ (चीफ़ फ़ाइनेंशियल ऑफ़िसर) रूथ पोराट से मिलने मैनचेस्टर गया जो वहां डिजिटल गैराज खोल रही थीं.
शहर के बीच में बने डिजिटल गैराज में लोगों को बायोडेटा बनाने, स्प्रेडशीट इस्तेमाल करने, या किसी व्यापार के लिए ऑनलाइन मार्केटिंग की योजना बनाने जैसे डिजिटल कौशल सिखाए जाते हैं. वो भी एकदम मुफ़्त.
रूथ बताती हैं, "हम चाहते हैं कि हर उम्र का शख़्स डिजिटल युग में मिल रहे मौक़ों का भरपूर फ़ायदा उठा सके. दुनिया की 50 फ़ीसदी आबादी आज भी इंटरनेट का इस्तेमाल नहीं करती. ब्रिटेन के 75 फ़ीसदी कारोबारों का कहना है कि उन्हें सही डिजिटल क्षमता वाले कर्मचारी नहीं मिलते - हम इसमें मदद करना चाहते हैं."
यह सोच क़ाबिले तारीफ़ है. ग्रेटर मैनचेस्टर के मेयर एंडी बर्नहैम भी इस राय से सहमत दिखे. उन्होंने डिजिटल इकोनॉमी बनाने के लिए गूगल के प्रयासों की तारीफ़ की. लेकिन इसमें थोड़ा स्वार्थ भी छिपा है.

इमेज स्रोत, PATRICIA DE MELO MOREIRA/AFP/Getty Images
अपने उत्पादों का प्रचार?
इंटरनेट पर अपने व्यापार का प्रचार कैसे करें, इसका ट्रेनिंग मॉड्यूल मोटे तौर पर यह बताता है कि गूगल एडवर्ड्स का इस्तेमाल कैसे करें. एडवर्ड्स गूगल की वह सेवा है जो पैसे लेकर कंपनियों के नतीजे गूगल सर्च में दिखाती है.
एक कंपनी के लिए अपने उत्पाद का प्रचार करना स्वाभाविक है लेकिन जब उस कंपनी के पास वह प्लैटफ़ॉर्म हो जिसमें सारी दुनिया जानकारी ढूंढती है, तब यही सामान्य सी बात समस्या बन जाती है. जब आप गूगल में खरीदारी के लिए कुछ ढूंढते हैं तो दाम की तुलना करने वाले विज्ञापन सबसे ऊपर नज़र आते हैं. ये तुलना गूगल करता है.
कंपनी पर आरोप लगाया जाता है कि ऐसी तुलना से ग्राहकों की राय पर असर पड़ता है. गूगल जो दिखाना चाहता है वो शीर्ष पर दिखता है और बाक़ी कंपनियों के नतीजे नीचे खिसक जाते हैं. यूरोपियन यूनियन ने इस सिलसिले में गूगल पर 2.4 अरब यूरो का जुर्माना भी लगाया था जिसके ख़िलाफ़ गूगल ने अपील की थी.

इमेज स्रोत, NOAH SEELAM/Getty Images
टैक्स बचाने की कवायद
इसके अलावा टैक्स भी एक मसला है. गूगल और उसकी पेरेंट कंपनी एल्फ़ाबेट हमारे जीने और काम करने के तरीक़ों में बदलाव लाने वाली तकनीक को बनाने और बढ़ाने में बड़ी भूमिका निभा रही हैं. आर्टिफ़िशियल इंटेलीजेंस और रोबोटिक्स से दुनिया का बहुत भला होगा लेकिन बड़े पैमाने पर लोग बेरोज़गार भी हो जाएंगे.
तकनीक के क्षेत्र की बाक़ी बड़ी कंपनियां भी बदलाव में अलग-अलग तरह से योगदान कर रही हैं. अमेज़ॉन ने रीटेल (खुदरा) व्यापार की शक्ल बदल दी है वहीं ऊबर ने टैक्सी कारोबार की कायापलट दी है. लेकिन इन कंपनियों पर टैक्स बचाने के आरोप भी लगते रहते हैं.
हाल ही में लीक हुए पैराडाइज़ पेपर्स में सामने आया कि कुछ बड़ी कंपनियों जैसे एप्पल ने अपनी कमाई दुनिया के उन देशों में रखी हुई है जहां टैक्स सबसे कम है. गूगल अमरीका के अलावा बाक़ी देशों से जो कमाता है उसे बरमूडा में रखता है जहां कॉर्पोरेशन टैक्स रेट ज़ीरो है.

इमेज स्रोत, Getty Images
ज़ीरो टैक्स वाली जगहों में पहुंचाया मुनाफ़ा?
रूथ पोराट को इसमें कुछ ग़लत नहीं लगता. उन्होंने कहा, "यह नियम हमने नहीं बनाए, हम बस उनका पालन कर रहे हैं. अगर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कोई कर सुधार होता है तो हम उसका स्वागत करेंगे और उसे मानेंगे."
अच्छा, क़ानून की जाने दीजिए, क्या आपको नैतिक स्तर पर यह ठीक लगता है?
रूथ कहते हैं, "हमारा मानना है कि हम समुदाय की सेवा करते हैं. डिजिटल गैराज भी ऐसा ही एक क़दम है. हम छोटे-बड़े कारोबारों को आगे बढ़ने में मदद करते हैं जिससे रोज़गार बनते हैं और आर्थिक विकास होता है. हमें अपने काम पर गर्व है."

इमेज स्रोत, Scott Olson/AFP/Getty Images
कंपनियों को कुछ ग़लत नहीं लगता
बहुत सी कंपनियां क़ानूनी तौर पर ज़रूरी टैक्स से एक पाई ज़्यादा नहीं भरना चाहती.
यूरोप के अधिकारी और नेता इस पर नाराज़गी जताते रहे हैं. फ़्रांस के इमैनुअल मैक्रों ने हाल ही में तकनीकी कंपनियों को 'आधुनिक समाज का मुफ़्तखोर' बताया था.
लेकिन तकनीकी कंपनियों को पता है कि उनके पास ग्राहक वफ़ादार हैं. शायद इसलिए उन्हें वाक़ई नहीं लगता कि वे कुछ ग़लत कर रही हैं.
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)












