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बुधवार, 18 फ़रवरी, 2009 को 06:44 GMT तक के समाचार
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नक्सलियों ने वार्ता के लिए रखीं शर्तें

नक्सली
छत्तीसगढ़ में नक्सलियों ने हाल के बरसों में पहली बार बातचीत का प्रस्ताव किया है
छत्तीसगढ़ में नक्सलियों ने सरकार के साथ बातचीत की पेशकश करने के बाद अब इसके लिए शर्तें रखी हैं जिसमें नक्सली संगठनों से प्रतिबंध हटाना शामिल है.

नक्सलियों ने छत्तीसगढ़ के विशेष जनसुरक्षा क़ानून को भी ख़त्म करने की भी बात कही है जिसे मुख्यरुप से राज्य में नक्सली गतिविधियों पर नियंत्रण लगाने के लिए लागू किया गया है.

राज्य सरकार ने बातचीत के प्रस्ताव का स्वागत किया था और शर्तों पर सरकार की ओर से कहा गया है कि इन शर्तों को लेकर भी बातचीत की जा सकती है.

हालांकि पहले सरकार की ओर से यह भी कहा गया था कि नक्सलियों की ओर से बातचीत का प्रस्ताव उनकी हताशा को दर्शाता है.

शर्तें

नक्सलियों ने जनवरी के अंत में शासन के सामने बातचीत की पेशकश की थी और कहा था कि सरकार को इसके लिए 'जनवादी माहौल' बनाना चाहिए.

अब माओवादियों लड़ाकों ने छत्तीसगढ़ सरकार से सलवा जुडूम अभियान बंद करने, आदिवासियों को शिविरों से गाँव भेजे जाने और जुडूम अभियान के दौरान हुई आम लोगों की मौत की जांच के लिए एक समिति बनाये जाने की मांग की है.

 नक्सली यह देखना चाहते हैं कि क्या रमन सिंह सरकार अभी भी उनके ख़िलाफ़ सैन्य रणनीति ही जारी रखना चाहती है या उसमें कोई बदलाव आया है?"
पीवी रमना, सुरक्षा मामलों के जानकार

भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) की क्षेत्रीय ईकाई के एक प्रवक्ता पांडू उर्फ़ पनदन्ना ने पिछले हफ़्ते पत्रकारों के एक दल को अपने ठिकाने पर बुलाकर उनसे बातचीत की.

उन्होंने कहा है कि बातचीत से पहले राज्य सरकार को विशेष सुरक्षा क़ानून वापस लेना चाहिए और माओवादी पार्टी और उससे जुड़े संगठनों पर से प्रतिबंध हटाना चाहिए.

लगभग तीन साल पहले लागू किए गए छत्तीसगढ़ विशेष जनसुरक्षा क़ानून के तहत प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से गैर-कानूनी गतिविधियों में लगे किसी भी आदमी, समूह और संगठन को सज़ा हो सकती है.

इस क़ानून का कई संगठनों ने विरोध किया था और कहा था कि इस क़ानून का दायरा इतना व्यापक है कि इसके तहत किसी भी व्यक्ति को लपेटा जा सकता है.

माओवादियों से बातचीत के लिए गए पत्रकारों में से एक राजेश शुक्ला के अनुसार नक्सली प्रवक्ता ने यह भी कहा कि आम लोगों की मौत की जाँच करने वाली समिति में बुद्धिजीवियों, प्रगतिशील नेताओं और जनवादी पत्रकारों को शामिल किया जाना चाहिए.

उनका कहना है कि इस समिति के लिए कुछ लोगों का नाम माओवादी सुझाना चाहते हैं.

गुरिल्लाओं की ओर से औधोगिक घरानों को 'बेजा फ़ायदा और दी गई सुरक्षा' को खत्म करने की बात भी कही गई है.

राजेश शुक्ला के मुताबिक़ मओवादिओं ने कहा है कि वह वार्ता के लिए राज्य के किसी शहर में जाने को तैयार हैं और मुख्यमंत्री और उनका कोई प्रतिनिधि जंगल में उनके ठिकाने पर भी आकर बात कर सकता है जिनकी सुरक्षा की वह गारंटी लेंगें.

 न यहाँ नक्सलियों पर किसी मानवधिकार या जनवादी संस्था या फिर जनता का ही का कोई दबाव दिखता है जिसके कारण वह हिंसा की समाप्ति की कोशिश करें और न ही सरकार दबाव में दिखती है; मगर फिर भी बातचीत की पेशकश हुई है. हालाँकि इससे विरोधाभास और भी ज़्यादा सामने आता है. क्योंकि जहाँ एक ओर नक्सली वार्ता की रूपरेखा तैयार होने के पहले ही 'जनवादी माहौल' तैयार करने की शर्तें रखने लगे हैं वहीं सरकार संविधान के दायरे में बातें करने को कह रही है
रुचिर गर्ग, नक्सली मामलों के जानकार

एक ओर जहाँ सरकार-नक्सली वार्ता को लेकर चर्चा जारी है वहीं नक्सली विचारक वरवर राव का कहना है कि उनके पास नक्सलियों की छत्तीसगढ़ ईकाई की बातचीत की पेशकश के बारे में कोई आधिकारिक जानकारी नहीं और उन्हें भी इसका पता मीडिया के माध्यम से ही हुआ है.

मगर उनका कहना था कि प्रत्येक बातचीत के लिए पार्टी की शीर्ष ईकाई 'सेंट्रल कमेटी' की इजाज़त ज़रूरी नहीं.

तेलगु साहित्यकार वरवर राव ने आंध्र प्रदेश सरकार और माओवादियों के बीच वर्ष 2004 में हुई बातचीत में मध्यस्थ के रुप में नक्सलियों का प्रतिनिधित्व किया था.

साठ के दशक के अंत में नक्सल आन्दोलन के बाद से अब तक सरकार और माओवादियों के बीच दो बार ही बातचीत हुई है, और दोनों इत्तेफाक से आंध्र प्रदेश में ही हुईं हैं.

इधर छत्तीसगढ़ के गृह मंत्री ने बयान दिया है कि वार्ता की 'शर्तों' पर 'चर्चा' हो सकती है हालाँकि मुख्य मंत्री रमन सिंह ने साफ़ कर दिया है कि वार्ता का प्रारंभिक दौर आधिकारिक स्तर पर ही होगा और इस चरण की सफलता के बाद ही राजनेता इसमें हिस्सा लेंगें.

अलग-अलग राय

शासन का एक धड़ा इस मामले में केन्द्र सरकार को भी अप्रत्यक्ष रूप से शामिल रखना चाहता है.

सूत्रों के अनुसार इस मामले में केन्द्र सरकार के सलाहकारों में से कुछ वार्ता को आगे ले जाने के पक्ष में हैं वहीँ दूसरा इसे उस रणनीति के नज़रिए से देखता है.

बस्तर में जलाया गया एक गाँव
नक्सली हिंसा और सलवा जुड़ूम के कारण हज़ारों आदिवासियों को विस्थापित होकर सरकारी कैंपों में रहना पड़ रहा है

इस दूसरे पक्ष का कहना है कि वार्ता और उसके पहले के 'संघर्ष विराम' की अवधि में, जब दोनों पक्षों की ओर से एक दूसरे के ख़िलाफ़ कार्रवाई बंद रहेगी, विद्रोही नए लोगों की संगठन में भर्ती, धन उगाही और दोबारा एकजुट होने के लिए करेंगें जैसा कि उन्होंने कथित रुप से आंध्र प्रदेश में किया था.

हालाँकि आंध्र प्रदेश पुलिस को गुरिल्लाओं के ख़िलाफ़ बड़ी सफलताएँ भी बातचीत के बाद के दिनों में ही मिली थीं क्योंकि माओवादी नेताओं के बाहर आने की वजह से पुलिस को नक्सली ठिकानों का अंदाजा हो गया था.

सुरक्षा मामलों के अध्ययन से जुड़े 'इंस्टिट्यूट ऑफ डिफेंस स्टडीज़ एंड अनालिसिस' के पीवी रमना अपनी 'व्यक्तिगत' राय देते हुए कहते हैं कि नक्सली बातचीत के प्रस्ताव के माध्यम से दूसरी बार राज्य की सत्ता में आई रमन सिंह सरकार की नीति का अंदाजा लेना चाहते हैं.

उनका कहना है, "नक्सली यह देखना चाहते हैं कि क्या रमन सिंह सरकार अभी भी उनके ख़िलाफ़ सैन्य रणनीति ही जारी रखना चाहती है या उसमें कोई बदलाव आया है?"

पीवी रमना का कहना है कि अब तक नक्सली वार्ताओं में माओवादी बातचीत शुरू कर कुछ दिनों बाद कुछ मुश्किल शर्तें रखते हैं और फिर वार्ता से हाथ खीच लेते हैं क्योंकि उनके लिए बातचीत भी युद्ध का दूसरा नाम है.

नक्सल मामले के दूसरे जानकार और वरिष्ठ पत्रकार रुचिर गर्ग का कहना है कि छत्तीसगढ़ में फ़िलहाल बातचीत की ज़मीन दूर दूर तक नहीं दिखती.

उनका कहना है, "न यहाँ नक्सलियों पर किसी मानवधिकार या जनवादी संस्था या फिर जनता का ही का कोई दबाव दिखता है जिसके कारण वह हिंसा की समाप्ति की कोशिश करें और न ही सरकार दबाव में दिखती है; मगर फिर भी बातचीत की पेशकश हुई है. हालाँकि इससे विरोधाभास और भी ज़्यादा सामने आता है. क्योंकि जहाँ एक ओर नक्सली वार्ता की रूपरेखा तैयार होने के पहले ही 'जनवादी माहौल' तैयार करने की शर्तें रखने लगे हैं वहीं सरकार संविधान के दायरे में बातें करने को कह रही है."

शासन का कुछ हिस्सा यह भी दावा कर रहा है कि नक्सली सुरक्षाबलों की कार्रवाइयों के कारण दबाव में आकर बातचीत करना चाहते हैं.

तो कुछ लोग इसे प्रचार पाने के हथकंडे का नाम देते हैं. उनका कहना है कि दूसरा पक्ष भी इस आफर का इस्तेमाल यह कहकर करेगा कि हमने तो हिंसा को ख़त्म की पेशकश की थी मगर शासन ने अनसुनी कर दी.

उनका कहना है कि यह मामला इससे आगे नहीं जा सकता, कम से कम आने वाले कुछ समय में तो नहीं; क्योंकि कुछ ही माह में आम चुनाव होने हैं और उसके ठीक पहले कोई भी सरकार नक्सल समस्या जैसे संवेदनशील मसले पर शायद ही कोई नया कदम उठाए.

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