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विधानसभा चुनाव: सत्ता का सेमीफ़ाइनल | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
विधानसभा नतीजों को अख़बार सत्ता का सेमीफ़ाइनल मान रहे हैं. सभी अख़बारों ने चुनाव परिणामों को कांग्रेस के लिए अच्छी ख़बर माना है. राष्ट्रीय सहारा का शीर्षक है- तीन राज्यों में जीत से बढ़ा कांग्रेस का हौसला. अख़बार लिखता है कि पाँच राज्यों के विधानसभा नतीजों ने कांग्रेस में जान फूंकने का काम किया है. पार्टी सबसे ज्यादा इस बात से खुश है कि भाजपा का आतंकवाद का मुद्दा विधानसभा चुनाव में नहीं चला है. पंजाब केसरी लिखता है कि लोकतंत्र में जनता ही सर्वोपरि होती है. पाँच राज्यों के विधानसभा चुनावों ने एक बार फिर दिखा दिया है कि इस बार जीत पार्टियों की नहीं जनता की हुई है. उसका कहना है कि भाजपा दावा कर रही थी कि चार राज्यों में कमल खिलेगा और कांग्रेस संशय में थी और उसके नेताओं ने कल्पना भी नहीं की होगी कि जनादेश से उनके चेहरे खिल उठेंगे. अमर उजाला का शीर्षक है- पंजे की पकड़ और मज़बूत. अख़बार लिखता है कि लोक सभा चुनावों से पहले सत्ता के सेमीफ़ाइनल में उम्मीदों के विपरीत कांग्रेस ने दमदार प्रदर्शन करते हुए दिल्ली और मिज़ोरम पर कब्ज़ा कर लिया है. राजस्थान में भी कांग्रेस की सरकार बनती दिख रही है. परिणाम से साफ़ है कि पंजा भारी पड़ा है. वह लिखता है कि भाजपा मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ की सरकार बनाने में कामयाब रही लेकिन उसे दिल्ली में भगवा न लहरा पाने का मलला रहेगा. दैनिक जागरण में छपे विश्वेषण का शीर्षक है- राजनीति को लोकतंत्र का सबक. अख़बार लिखता है कि जिन अनुकूल समीकरणों और मुंबई हमलों के कारण भाजपा ने सपने में भी हार की नहीं सोची थी, और कांग्रेस को दिल्ली और राजस्थान में जीत का भरोसा नहीं था, लेकिन हुआ वो जो किसी दल नहीं सोचा था. हिंदुस्तान का शीर्षक है-काम को इनाम. अख़बार लिखता है कि नतीजों से साफ़ है कि लोग अब विकास की राह में रोड़ा नहीं चाहते हैं. जनसत्ता का शीर्षक है- हाथ भारी, कमल मुरझाया. नवभारत टाइम्स का कहना है कि भाजपा पर फिर भारी पड़ी कांग्रेस. अख़बार लिखता है कि दिल्ली में महंगाई और आतंकवाद का उल्टा असर पड़ा है. साथ ही मायावती के हाथी के दांत भी बस दिखानेवाले साबित हुए. टाइम्स ऑफ़ इंडिया की हेडिंग है- कांग्रेस विन्स सेमीस 3-2 यानि कांग्रेस ने 3-2 से सेमीफ़ाइनल जीता. |
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