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कांग्रेस की जीत, जीत भाजपा की भी | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
लोकसभा चुनावों की लगभग पूर्व संध्या में हुए इन चुनावों के नतीजों का अगर हम आकलन करते हैं तो कम से कम अगले वर्ष होने वाले आम चुनावों कि दृष्टि से कोई स्पष्ट विजेता उभर कर सामने नहीं आता है. भारतीय जनता पार्टी ने दो राज्य जीते हैं, कांग्रेस ने तीन और दोनों ही इस स्थिति में हैं कि इन चुनावी नतीजों का आकलन करने में वे अपनी पीठ थपथपा सकते हैं. कांग्रेस की बात करें तो उसे एंटी इनकमबेंसी (सत्ता विरोधी लहर) के लॉजिक से या सत्ता में रहने के कारण जो सत्ताधारी दल को नुकसान होता है उसके चलते राजस्थान ही नहीं मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में जीतने चाहिए थे. वैसे इन परिणामों ने सत्ता विरोधी लहर को लेकर आम धारणा को तोड़ दिया है. वो ऐसे कि जिन पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव हुए उसमें से तीन में सत्ता विरोधी लहर का कोई असर नहीं रहा और वो राज्य रहे, दिल्ली, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश. पर कांग्रेस इन तीन में से सिर्फ़ एक ही राज्य जीत पाई और वहाँ भी यानि राजस्थान में कांग्रेस, बीजेपी की वह गत बनाने में असमर्थ रही जो पिछली बार कांग्रेस की बनी थी या वर्ष 1998 में भैरोसिंह शेखावत की बीजेपी का हश्र हुआ था. याद रहे पिछली बार कांग्रेस 200 सदस्यीय विधानसभा में 50 के आसपास सिमट गई थी और 1998 में बीजेपी 200 मे से 40 सीटें भी नहीं जीत पाई थी. जीत का सेहरा पर मध्य प्रदेश और छतीसगढ़ नहीं जीत पाने का ग़म काफ़ी हद तक दिल्ली की जीत से कम हो जाता है. हालांकि दिल्ली की जीत कितनी कांग्रेस की और कितनी शीला दीक्षित की जीत है उस पर जनता की राय शायद ही किसी से छिपी है.
फिर दिल्ली में कांग्रेस की जीत का सेहरा काफ़ी हद तक बीजेपी के सिर पर भी बंधना चाहिए जिन्होंने शीला दीक्षित के सामने वीके मल्होत्रा को उम्मीदवार बना कर एक तरह से चुनावी मुहिम शुरु होने से पहले ही अपनी हार सुनिश्चित कर ली थी. खैर, अगर हम चुनावी नतीजों से उभरने वाली तस्वीर पर नज़र डाले तो कुछ बातें ख़ास तौर पर ध्यान देने योग्य है. पहला- आतंकवाद का मुद्दा किसी पार्टी, दल या राजनीतिक सोच का विशेषाधिकार नहीं है. इस मुद्दे पर समुचित संवेदना नहीं दिखाने और कहीं राजनीति खेलने का ख़ामियाजा बीजेपी को भुगतना पड़ा ख़ासकर दिल्ली में जहाँ मतदाता ज़्यादा सयाना और राजनीतिक दृष्टि से परिपक्व है. चरमपंथ पर राजनीति अगर इस मुद्दे पर बीजेपी ज़्यादा चतुरता और एक दीर्घकालीक सोच के साथ कांग्रेस को घेरती तो उसको ज़्यादा लाभ मिलता पर जनता ने उस की इस मुद्दे पर खुल्मखुल्ला राजनीति करने कि कोशिश को नकार दिया. दूसरा- शीला दीक्षित और शिवराज चौहान दोनों अपने काम और विकास के नारे पर जीत कर आए. दिल्ली में कांग्रेस कि विजय शायद कांग्रेस आलाकमान को अब तक का सबसे स्पष्ट संकेत है जनता का कि अगर पार्टी आलाकमान क्षेत्रीय नेताओं को सशक्त बनाती है और उनके लोकप्रिय होने कि स्थिति मे उनकी जड़े नहीं कटवाती है तो उससे पार्टी को लाभ मिलता है और आलाकमान और मजबूत होता है. तीन, बीजेपी का बढ़ता प्रभाव भी इन चुनावों के विश्लेषण का एक महत्वपूर्ण भाग है. दिल्ली, मध्य प्रदेश एवँ राजस्थान सभी जगह बहुजन समाज पार्टी का मत-प्रतिशत बढ़ा है. पर एक नई बात जो निकल कर सामने आई है वह है कि बीएसपी चाहे कांग्रेस के वोट बैंक में अधिक सेंध लगाती हो पर वोट बीजेपी के खाते से भी लेती है. जरा सोचिए बीजेपी का मत-प्रतिशत दिल्ली मे वर्ष 2003 में चुनावों के मुक़ाबले लगभग दोगुना हो गया है. अगर ऐसा नहीं होता तो शायद कांग्रेस का आंकड़ा 50 पार कर जाता. और अंत में इन चुनावों का शायद सबसे सकारात्म पहलू. आम तौर पर चुनावी नतीजे प्रेक्षकों कि आशा के अनुरुप ही रहे. 19-20 का फ़र्क़ चलता है. लेकिन वह प्रेक्षक और राजनेता जिनकी हर गणित जातीय समीकरणों पर आधारित थी उनको कहीं मतदाता ने एक बार फिर यह दिखलाने का प्रयास किया है कि वह इन मुद्दों पर उतना बँटा नहीं है जितना कि शायद हमारे नेता एवँ प्रेक्षक सोचते हैं और कुछ चाहते भी हैं. | इससे जुड़ी ख़बरें दिल्ली की मतगणना08 दिसंबर, 2008 | भारत और पड़ोस जीत के बावजूद दस जनपथ पर सन्नाटा08 दिसंबर, 2008 | भारत और पड़ोस मिज़ोरम में सरकार बनाने की ओर कांग्रेस08 दिसंबर, 2008 | भारत और पड़ोस मध्य प्रदेश चुनाव के रुझान और परिणाम08 दिसंबर, 2008 | भारत और पड़ोस राजस्थान में कांग्रेस को बढ़त08 दिसंबर, 2008 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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