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सोमवार, 08 दिसंबर, 2008 को 11:01 GMT तक के समाचार
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मिज़ोरम में हुई कांग्रेस की वापसी

मिज़ोरम में चुनाव
मिज़ोरम आजकल मातम (चूहों के आतंक) की चपेट में है जो हर 48 सालों के बाद आता है.
पूर्वोत्तर राज्य मिज़ोरम में एक दशक के बाद कांग्रेस ने फिर सत्ता में वापसी की है.

घोषित परिणामों के अनुसार भारत में सत्तारूढ़ इस पार्टी ने कुल 40 में से 32 सीटों पर जीत दर्ज की है.

राज्य की सत्तारूढ़ पार्टी मिजो नेशनल फ़्रंट मात्र तीन ही सीट हासिल कर पाई है जबकि अन्य क्षेत्रीय दलों को पाँच सीटें मिली हैं.

एमएनएफ़ के मुख्यमंत्री ज़ोरामथंगा ने अपनी चंफ़ाई(उत्तर) सीट को भी गंवा दिया जिसे वे 1987 से जीतते आ रहे थे.

पूर्व मुख्यमंत्री लालथनहवला ने दो सीटों सरचीप और दक्षिण तुईपाई से चुनाव लड़ा और उन दोनों सीटों पर विजय भी हासिल की.

एमएनएफ़ के वर्तमान शहरी विकास मंत्री बी. लालथ्लेंगलियाना अपनी पार्टी के लिए मात्र एक पश्चिमी तुईपाई की सीट ही ले पाए.

चूहों का आतंक

एमएनएफ़ पूर्व छापामार लड़ाकों की पार्टी है जो पिछले 20 सालों से भारतीय सुरक्षा बलों के ख़िलाफ़ हिंसक अलगाववादी अभियान चला रही है.

चूहों का आतंक
चुनाव के नतीजों में चूहों के आतंक का बड़ा योगदान है.

लेकिन 1986 में एमएनएफ़ के नेताओं ने जब भारत सरकार के साथ एक समझौते पर हस्ताक्षर किए तब यह एक विधि सम्मत राजनीतिक दल बन गया.

उनके लड़ाकों ने अपने हथियार डाल दिए और उनका पुनर्वास कराया गया.

एमएनएफ़ ने चुनाव जीते जिसके बाद 1986 का समझौता हुआ लेकिन पार्टी में फूट होने और वोट न मिलने की वजह से उनकी सत्ता का समय काफ़ी कम रहा.

लेकिन तब के पाकिस्तान और अब बांग्लादेश में स्थित एमएनएफ़ के मुख्य बेस क्षेत्र में पार्टी के मुख्य इंचार्ज ज़ोरामथंगा के नेतृत्व में एमएनएफ़ 1998 में राज्य के चुनाव जीत कर फिर सत्ता में आई.

इसके बाद 2003 के विधानसभा चुनाव भी एमएनएफ़ ने ही जीते और पार्टी सत्ता में बनी रही.

वरिष्ठ मिज़ो पत्रकार एचसी वेनलालरुआता कहते हैं, "एमएनएफ़ बेहतर प्रदर्शन नहीं कर पाई और सत्ताविरोधी लहर की चपेट में आ गई."

मिज़ोरम आजकल मातम (चूहों के आतंक) की चपेट में है जो हर 48 सालों के बाद आता है.

इससे पहले मातम 1960 के दशक में आया था जब गुस्साए मिज़ो नागरिकों ने एमएनएफ़ बनाई थी.

इस बार हालांकि चूहों के आतंक का परिणाम 1960 की तरह भुखमरी तक नहीं पहुँचा लेकिन मिज़ो किसानों ने बड़ी मात्रा में फसल की तबाही और केंद्र सरकार की ओर से ख़ासी सहायता दिए जाने के बावजूद राज्य सरकार के बदतर सहायता इंतज़ामों की शिकायत की है.

विश्लेषकों का कहना है कि चूँकि चूहों ने किसानों की 80 फ़ीसदी फसल को नष्ट कर दिया जिसने एमएनएफ़ के ख़िलाफ़ सत्ता विरोधी लहर का रूप ले लिया.

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