|
चूहों ने इंसानों का भला किया | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
चूहे शायद इंसानों के लिए कुछ भलाई की वजह भी हो सकते हैं... भारत के पूर्वोत्तर राज्य मिज़ोरम की सरकार ने उन गाँवों में मज़दूरों की दिहाड़ी और अनाज की आपूर्ति बढ़ा दी है जहाँ चूहों के आतंक से लोग परेशान हैं. राज्य में बढ़ रही बाँस की फ़सल पर आ रहे फूल आजकल बड़ी संख्या में चूहों को आकर्षित कर रहे हैं. इस घटना को क्षेत्र में “मातम” के नाम से जाना जाता है. बाँस के फूलों को खाने से चूहों की न सिर्फ़ आबादी बढ़ती है बल्कि भरी-पूरी फ़सलों को भी नष्ट कर देते हैं जिन पर किसानों की ज़िंदगी चलती है. मिज़ोरम सरकार ने मज़दूरों की दिहाड़ी दोगुनी कर दी है ताकि ग्रामीण लोग अनाज की कमी की समस्या से निपट सकें. बढ़ता विनाश मिज़ोरम मंत्रिपरिषद की गुरूवार को हुए एक बैठक के बाद राज्य के गृहमंत्री टोनी टोनलुइया ने कहा, “हमने तय किया है कि ग्रामीणों को सप्ताह में मिलने वाले चावल की मात्रा भी बढ़ा दी जाए ताकि लोगों के पास खाने के लिए पर्याप्त अनाज हो.” अब हर वयस्क ग्रामीण को हर हफ़्ते दो किलो चावल और बच्चे को इसका आधा यानी एक किलो चावल मिलेगा. श्री टोनलुइया ने कहा, “हमने क्षेत्र के अधिकारियों को दिहाड़ी और अनाज की आपूर्ति तुरंत बढ़ाने के निर्देश दिए हैं.” मिज़ोरम आजकल चूहों की धमाचौकड़ी से फ़सलें नष्ट होने की वजह से अनाज के विकट संकट से जूझ रहा है. आजकल चूहों की आबादी बहुतायत में मिल रहे भोजन यानी बाँस पर फल रहे बहुसंख्य फूलों के कारण कई-कई गुना बढ़ रही है. साल 2007 में अभूतपूर्व रूप से हुई बारिश के कारण से पानी में डूबे हुए सैकड़ों घर, सड़कों, तालाबों और खेतों में हुए विनाश को भोजन की इस कमी ने और भी बढ़ा दिया है. राज्य सरकार ने मिज़ोरम को आपदा क्षेत्र घोषित करने का निर्णय किया है और त्रस्त लोगों की परेशानी को कम करने के लिए केंद्र सरकार से अतिरिक्त धन की माँग की है. राज्य के अधिकतर किसानों ने साल 2007 में चावल या मक्का नहीं बोए हैं क्योंकि उन्हें डर था कि चूहे उनकी सारी फ़सल खा जाएंगे. नुक़सान पर नियंत्रण पौध संरक्षण अधिकारी जेम्स लालसिमलिआना कहते हैं, “मातम” ने मिज़ो पहाड़ियों पर सबसे पहले 1910-11 में हमला किया था. इसके बाद यह फिर 1958-59 में देखा गया और अब इस साल लोगों को परेशान करने यह फिर आ धमका है. इसका प्रभाव 30 फ़ीसदी से भी ज़्यादा मिज़ो भूमि पर पड़ता है जिसमें ज़्यादातर फ़सल वाली भूमि होती है.”
जेम्स लालसिमलिआना के अनुसार, “इसे रोका जाना नामुमकिन है, हम सिर्फ़ नुक़सान पर नियंत्रण के उपाय कर सकते हैं.” भारत के वन और पर्यावरण मंत्रालय की एक रिपोर्ट के अनुमान के अनुसार 2007 में मिज़ोरम के 6,446 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैले जंगलों में से क़रीब 5,100 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र “मातम” की चपेट में आएगा. मिज़ोरम की कुल 900,00 आबादी में आधे से अधिक लोग किसान हैं. मिज़ोरम कृषि विभाग ने साल 2007 में किसानों के बिजाई न करने के कारण फ़सल में कम से कम 75 फ़ीसदी कमी होने का अनुमान लगाया है चूहों का आबादी पर नियंत्रण करने के लिए तत्पर राज्य सरकार ने एक चूहे को मारने पर एक रुपए के इनाम की भी घोषणा की है. सिर्फ़ 2006 में दो लाख से भी ज़्यादा चूहे मारे गए थे. चूहों का मारा जाना जारी रहा लेकिन फिर भी चूहों के झुंड आते रहे. अक्तूबर, 2005 में दक्षिणी ज़िले चम्फ़ाई में बाँस के चंगतलाई जंगलों में बाँस पर शुरूआती फूल देखे गए थे. इसके बाद 2006 में यह इतनी तेज़ी से बढ़े और हालात और ख़राब होते गए. | इससे जुड़ी ख़बरें बर्मा से पलायन कर रहे हैं चिन आदिवासी23 अक्तूबर, 2007 | भारत और पड़ोस चूहों का क़हर, अकाल का डर25 अप्रैल, 2007 | भारत और पड़ोस चूहों के सामने सेना मैदान में उतरी03 जून, 2006 | भारत और पड़ोस मोटे मोटे चूहे और मोटापे की जीन02 मार्च, 2005 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
| |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||