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शनिवार, 15 नवंबर, 2008 को 20:42 GMT तक के समाचार
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पीडीपी: इतिहास और स्वशासन का नारा
मुफ़्ती मोहम्मद सईद
मुफ़्ती सईद ने 1999 में पीडीपी की स्थापना की. पिछले चनावों में पार्टी को 87 में से 16 सीटें मिलीं

जम्मू और कश्मीर पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी की स्थापना पूर्व केंद्रीय गृह मंत्री मुफ़्ती मोहम्मद सईद ने 1999 में की थी.

भारत प्रशासित जम्मू-कश्मीर के विधानसभा चुनावों में वर्ष 2002 में इस राजनीतिक दल ने 16 सीटें जीतकर कांग्रेस के साथ गठबंधन सरकार बनाई और और वर्ष 2004 के लोकसभा चुनावों में इसे एक सीट मिली.

पीडीपी वर्ष 2008 के विधानसभा चुनाव में तो भाग ले रही है लेकिन उसने स्पष्ट किया है कि 'ये समय चुनाव कराने के लिए उपयुक्त नहीं है क्योंकि लोग राजनीतिक प्रक्रिया के प्रति काफ़ी उदासीन हैं.'

पीडीपी की अध्यक्ष मुफ़्ती मोहम्मद सईद की बेटी महबूबा मुफ़्ती हैं और वर्ष 2002 से 2005 तक जम्मू-कश्मीर राज्य के मुख्यमंत्री रहे मुफ़्ती मोहम्मद सईद इस पार्टी के पेट्रन हैं.

 'ये समय चुनाव कराने के लिए उपयुक्त नहीं है क्योंकि लोग राजनीतिक प्रक्रिया के प्रति काफ़ी उदासीन हैं
महबूबा मुफ़्ती

पार्टी और पार्टी की नीतियाँ मुफ़्ती मोहम्मद सईद के व्यक्तित्व के इर्द-गिर्द तो घूमती ही रही हैं लेकिन हाल-फ़िलहाल में इन पर पार्टी अध्यक्ष महबूबा मुफ़्ती की छाप स्पष्ट नज़र आने लगी है.

मुफ़्ती सईद का सफ़र

जम्मू-कश्मीर
विधानसभा क्षेत्र- 87
मतदान की तारीखें
17 नवंबर---- 10 सीटें
23 नवंबर-----6 सीटें
30 नवंबर-----5 सीटें
07दिसंबर------18 सीटें
13दिसंबर-------11 सीटें
16दिसंबर----16 सीटें
24 दिसंबर---21 सीटें
मतगणना---- 8 दिसंबर

मुफ़्ती मोहम्मद सईद का राजनीतिक सफ़र 1950 में नेशनल कॉन्फ़्रेंस से शुरु हुआ था लेकिन वर्ष 1959 में वे नेशनल कॉन्फ़्रेंस से अलग होकर डेमोक्रेटिक नेशनल कॉन्फ़्रेंस और फिर कांग्रेस में चले गए. वर्ष 1965 से वर्ष 1987 तक वे कांग्रेस में रहे और वर्ष 1975 से 1987 तक कांग्रेस के जम्मू-कश्मीर युनिट के अध्यक्ष थे.

वर्ष 1987 में वे कांग्रेस से बाहर चले आए और वीपी सिंह के साथ हो गए. जब 1989 में जनता दल सरकार बनी तो उन्हें केंद्रीय गृह मंत्री बनाया गया.

इसके कुछ ही दिन बाद जब भारत प्रशासित कश्मीर में चरमपंथियों ने उनकी एक बेटी रूबिया सईद का अपहरण किया तो उस समय के गृह मंत्री मुफ़्ती मोहम्मद सईद का नाम ज़्यादा चर्चा में आया.

महबूबा मुफ़्ती
चुनावों के कई दिन बाद तक पीडीपी के चुनाव में भाग लेने पर अटकलें लगती रहीं

उस समय भारत सरकार ने रूबिया सईद को छुड़ाने के लिए चरमपंथियों की माँगें स्वीकार कीं जिसके कारण जनता दल सरकार की कड़ी आलोचना हुई.

उनकी बेटी महबूबा मुफ़्ती जो जम्मू-कश्मीर विधानसभा में विधायक रह चुकी हैं, पार्टी की नीतियों के प्रचार-प्रसार में ख़ासी सक्रिय हैं. पर्यवेक्षक मानते हैं कि महबूबा मुफ़्ती ने पार्टी कार्यकर्ताओं को संगठित किया है और वे ही चुनाव अभियान का रचनात्मक नेतृत्व कर रही हैं.

उदारवादी नज़रिया

पीडीपी के गठन के बाद इस पार्टी की नीतियों में लोकलुभावन और उदारवादी दृष्टिकोण ज़्यादा झलकता नज़र आया है.

वर्ष 2002 में हुए विधानसभा चुनावों में पीडीपी ने हिरासत में लिए गए कथित चरमपंथियों के रिहा किए जाने की बात और जम्मू-कश्मीर में सुरक्षा बलों की कथित ज़्यादतियों की बात ज़ोरशोर से उठाई थी. इस पूरी विचारधारा पर मुफ़्ती मोहम्मद सईद से ज़्यादा उनकी बेटी महबूबा मुफ़्ती के व्यक्तित्व और राजनीति की छाप स्पष्ट नज़र आई.

'स्वशासन और ग्रेटर जम्मू-कश्मीर'

 भारत के संविधान में संशोधन हो...मौजूदा व्यवस्था की जगह सत्ता का विकेंद्रीकरण हो...‘ग्रेटर जम्मू-कश्मीर की क्षेत्रीय परिषद’ बने जिसमें पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर के प्रतिनिधि भी शामिल हों
पीडीपी घोषणापत्र

वर्ष 2008 में हो रहे चुनावों में पीडीपी ने ‘स्वशासन का नारा’ लगाया है. पार्टी के मुताबिक स्वशासन के लिए भारतीय संविधान में व्यापक परिवर्तन की ज़रूरत है.

इन बदलावों में प्रमुख हैं - संविधान का अनुच्छेद 356 जम्मू-कश्मीर पर लागू न हो और अनुच्छेद 249 भी लागू न हो जिससे राज्य के कार्यक्षेत्र में आने वाले विषयों पर भारतीय संसद क़ानून न बना सके.

पीडीपी ये भी चाहती है कि संविधान में हुए छठे संशोधन को निरस्त किया जाए और स्वशासन के पहले स्वरूप को बहाल किया जाए जिसके तहत जम्मू-कश्मीर की विधानसभा सदरे रियासत को चुनती थी. पीडीपी के अनुसार ये पद कश्मीर और जम्मू क्षेत्र को बारी-बारी से दिया जा सकता है.

इस तरह पीडीपी ने मौजूदा व्यवस्था की जगह सत्ता के विकेंद्रीकरण और ‘ग्रेटर जम्मू-कश्मीर की क्षेत्रीय परिषद’ की बात की है जिसमें पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर के प्रतिनिधि भी शामिल हों.

पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी का ये भी कहना है कि नागरिक इलाक़ों से सुरक्षा बलों की वापसी हो और सशस्त्र बल विशेषाधिकार क़ानून वापस लिया जाए.

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