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शनिवार, 15 नवंबर, 2008 को 21:19 GMT तक के समाचार
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नेशनल कॉन्फ़्रेंस: इतिहास, नए चुनावी वादे
फ़ारूक़ अब्दुल्ला
उमर अब्दुल्ला ने घोषणा की कि नेशनल कॉन्फ़्रेंस की ओर से फ़ारूक़ अब्दुल्ला मुख्यमंत्री पद के दावेदार हैं

नेशनल कॉन्फ़्रेस भारत प्रशासित जम्मू-कश्मीर की राजनीतिक मुख्यधारा की दशकों पुरानी पार्टी है जिसकी स्थापना शेख़ मोहम्मद अब्दुल्ला और अन्य नेताओं ने की थी. इसकी कमान शेख़ अब्दुल्ला के हाथों से होते हुए उनके पुत्र फ़ारूक़ अब्दुल्ला और आजकल उनके पोते उमर अब्दुल्ला के हाथ में है. फ़ारूक़ अब्दुल्ला इस पार्टी के पेट्रन हैं.

जम्मू-कश्मीर
विधानसभा क्षेत्र- 87
मतदान की तारीखें
17 नवंबर---- 10 सीटें
23 नवंबर-----6 सीटें
30 नवंबर-----5 सीटें
07दिसंबर------18 सीटें
13दिसंबर-------11 सीटें
16दिसंबर----16 सीटें
24 दिसंबर---21 सीटें
मतगणना---- 8 दिसंबर

दशकों तक जम्मू-कश्मीर की राजनीति पर छाए रहने वाले शेख़ मोहम्मद अब्दुल्ला ने 1932 में ऑल जम्मू एंड कश्मीर मुस्लिम कॉन्फ़्रेस की स्थापना की थी. लेकिन जम्मू और कश्मीर के सभी लोगों को साथ लेकर चलने की इच्छा और अपनी धर्मनिरपेक्ष विचारधारा के अनुरूप शेख़ अब्दुल्ला ने 1939 में पार्टी का नाम बदल कर ऑल जम्मू एंड कश्मीर नेशनल कॉन्फ़्रेस रख दिया.

वर्ष 1946 में इस पार्टी ने महाराजा के शासन के ख़िलाफ़ बड़ा जन अभियान चलाया और जब 1951 में चुनाव हुए तो नेशनल कॉन्फ़्रेस ने भारत प्रशासित जम्मू-कश्मीर में संविधान सभा (जो बाद में राज्य की विधानसभा बनी) की सभी 75 सीटों पर जीत हासिल की. शेख अब्दुल्ला उस समय जम्मू-कश्मीर के प्रधानमंत्री बने.

 ये चुनाव कश्मीर समस्या का हल खोजने के लिए नहीं हो रहे बल्कि लोगों को सुशासन देने के लिए और उनके रोज़मर्रा के मुद्दे सुलझाने के लिए हो रहे हैं. हम चुनाव राज्य की आर्थिक स्थिति बेहतर करने, बेरोज़गारी हटाने, बिजली का संकट हल करने, स्वच्छ पानी पहुँचाने और सुशासन प्रदान करने के मुद्दों पर लड़ रहे हैं
उमर अब्दुल्ला

शेख़ अब्दुल्ला को जम्मू-कश्मीर में भूमि सुधार और लाखों भूमिहीन किसानों को भूमि आवंटन के लिए भी याद किया जाता है. लेकिन जब शेख़ अब्दुल्ला ने जम्मू-कश्मीर की स्वायत्ता की बात ज़ोरशोर से उठानी शुरु की तो उनकी सरकार को बर्ख़ास्त कर दिया गया और अगस्त 1953 में उन्हें गिरफ़्तार कर लिया गया. इसके बाद वे अनेक वर्ष नज़रबंद रहे.

वर्ष 1964 में उनका प्रधानमंत्री नहरू के साथ मनमुटाव कुछ दूर हुआ लेकिन नेशनल कॉन्फ़्रेस और शेख़ अब्दुल्ला राजनीतिक मुख्यधारा में वर्ष 1975 की इंदिरा-अब्दुल्ला सहमति के बाद ही लौटे.

सत्ता का दौर

जेल से उनकी रिहाई के बाद, जब 1977 में चुनाव हुए तो राज्य में बड़ी संख्या में लोगों ने अपने मताधिकार का इस्तेमाल किया और नेशनल कॉन्फ़्रेस की जीत हुई. शेख़ अब्दुल्ला राज्य के मुख्यमंत्री बने.

शेख अब्दुल्ला के निधन के बाद उनके पुत्र फ़ारूक़ अब्दुल्ला ने पार्टी की कमान संभाली और 1983 के विधानसभा चुनावों में फिर नेशनल कॉन्फ़्रेस को बड़ी जीत हासिल हुई. लेकिन जब फ़ारूक़ अब्दुल्ला और इंदिरा गांधी के बीच मतभेद पैदा हुए तब उनकी सरकार को बर्ख़ास्त कर दिया गया.

फ़ारूक़ और उमर
शेख़ अब्दुल्ला के बाद फ़ारूक़ मुख्यमंत्री बने थे. फ़ारूक़ ने पुत्र उमर को पार्टी अध्यक्ष बनाया

इसके बाद फ़ारूक़ अब्दुल्ला और राजीव गांधी के बीच रिश्ते बेहतर हुए और नेशनल कॉन्फ़्रेस ने कांग्रेस के साथ मिलकर 1987 का चुनाव लड़ा. अनेक पर्यवेक्षकों की राय है कि इन चुनावों में चाहे नेशनल कॉन्फ़्रेंस को जीत हासिल हुई लेकिन इन चुनावों में लगे व्यापक धाँधली के आरोपों ने ही राज्य में चरमपंथ का भी पथ प्रशस्त किया.

इसके बाद वर्ष 1996 में हुए चुनावों में नेशनल कॉन्फ़्रेंस को 87 में से 57 सीटें मिलीं लेकिन वर्ष 2002 में हुए विधानसभा चुनावों में पार्टी को मात्र 28 सीटें ही मिल पाईं और उसे विपक्ष में बैठना पडा.

बेरोज़गारी और बिजली संकट के मुद्दे

वर्ष 2008 के चुनावों में नेशनल कॉन्फ़्रेंस ने घोषणा की है कि उसकी ओर से मुख्यमंत्री पद के दावेदार फ़ारूक़ अब्दुल्ला है. पार्टी अध्यक्ष उमर अब्दुल्ला ने स्पष्ट किया है – "ये चुनाव कश्मीर समस्या का हल खोजने के लिए नहीं हो रहे बल्कि लोगों को सुशासन देने के लिए और उनके रोज़मर्रा के मुद्दे सुलझाने के लिए हो रहे हैं. हम चुनाव राज्य की आर्थिक स्थिति बेहतर करने, बेरोज़गारी हटाने, बिजली का संकट हल करने, स्वच्छ पानी पहुँचाने और सुशासन प्रदान करने के मुद्दों पर लड़ रहे हैं."

 हमारा प्रशासनिक एजेंडा भारत और पाकिस्तान के बीच कश्मीर समस्या के हल में कोई अड़चन नहीं डालेगा. लेकिन इनको (दोनों देशों को) समाधान खोजते समय जनता की इच्छाओं का ध्यान रखना चाहिए
नेशनल कॉन्फ़्रेंस

अलगाववादियों और चरमपंथियों के बारे में नेशनल कॉन्फ़्रेंस ने कहा है कि 'यदि वे चाहें तो चुनावों का बहिष्कार कर सकते हैं लेकिन उन्हें ज़ोर-ज़बर्दस्ती से किसी को रोकने का हक़ नहीं है.' नेशनल कॉन्फ़्रेंस ने ये भी साफ़ कहा है – "हमारा प्रशासनिक एजेंडा भारत और पाकिस्तान के बीच कश्मीर समस्या के हल में कोई अड़चन नहीं डालेगा. लेकिन इनको (दोनों देशों को) समाधान खोजते समय जनता की इच्छाओं का ध्यान रखना चाहिए."

हालाँकि पार्टी ने अपने प्रचार में लोगों की समस्याओं से जुड़े मुद्दे उठाए हैं लेकिन उसने अगले 15 साल का एक ‘विज़न डॉक्यूमेंट’ भी प्रस्तुत किया है.

15 साला 'विज़न डॉक्यूमेंट'

ग़ौरतलब है कि नेशनल कॉन्फ़्रेस की सरकार के नेतृत्व में जम्मू-कश्मीर विधानसभा ने राज्य को स्वायत्ता दिए जाने का प्रस्ताव पारित किया था लेकिन राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) सरकार के मंत्रिमंडल ने इसे ठुकरा कर दिया था.

पार्टी ने अपने विज़न डॉक्यूमेंट में कहा है कि वह केंद्रीय सरकार को इस प्रस्ताव पर फिर विचार करने का अनुरोध करेगी.

विज़न डॉक्यूमेंट में पार्टी ने आर्थिक आत्मनिर्भरता, बेरोज़गारी हटाने, ऊर्जा संकट का समाधान निकालने, प्रशासन से भष्टाचार हटाने जैसे मुद्दों पर बल दिया है. विज़न डॉक्यूमेंट का कहना है – "हमारे राज्य में पाँच लाख बेरोज़गार युवक हैं और हमें पहले उनकी समस्याओं का समाधान करना है."

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