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गुरुवार, 13 नवंबर, 2008 को 10:11 GMT तक के समाचार
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मतदाता की ख़ामोशी का मतलब?

रमन सिंह का चुनावी पोस्टर
रमन सिंह की छवि को भी पार्टी भुनाने की कोशिशों में लगी हुई है
छत्तीसगढ़ में मतदाता ख़ामोश है. न वह सत्ताधारी भाजपा को लेकर उत्साह दिखा रहा है और न लगभग निष्क्रिय रही और अंदरूनी कलह से जूझ रही विपक्षी पार्टी कांग्रेस से नाराज़ दिख रहा है.

कुछ लोग कह रहे हैं कि मतदाता भ्रमित है तो कुछ लोगों का कहना है कि मतदाता दोनों दलों से बराबरी से नाराज़ है और कुछ लोग इसे 'एंटी इंकंबेंसी' यानी सत्तारूढ़ दल से नाराज़गी की तरह देखते हैं.

छत्तीसगढ़
विधानसभा क्षेत्र-90
मतदान- 14 नवंबर और 20 नवंबर
मतगणना- 8 दिसंबर

मीडिया के सर्वेक्षणों में भले भाजपा जीतती दिख रही है लेकिन ज़मीनी स्थिति का आकलन कर रहे लोगों का कहना है कि यह कहना बहुत मुश्किल है कि ऊँट आख़िर किस करवट बैठेगा.

कुछेक विश्लेषक ही हैं जो कह पा रहे हैं कि मतदाता ख़ामोश नहीं है और वह खुलकर अपनी बात कह रहा है.

लेकिन उनके विश्लेषणों के सार में भी बहुत से 'यदि' और 'किन्तु-परन्तु' हैं.

चुनाव प्रचार कई कारणों से ठंडा है जिसमें एक बड़ा कारण यह है कि कृषि प्रधान छत्तीसगढ़ में यह ऐन फसल कटाई का समय है और इसने विश्लेषण को और कठिन बना दिया है.

यह असमंजस तब है जबकि राज्य की 90 सीटों में से 39 सीटों में मतदान को कुछ ही घंटे बचे हैं और दूसरे चरण की 51 सीटों के मतदान को कुछ ही दिन.

नारे-वायदों से निरपेक्ष

भाजपा सरकार का दावा है कि उसने छत्तीसगढ़ में विकास के अभूतपूर्व कार्य किए हैं.

सरकार ने कुछ महीनों पहले ग़रीबों को हर राशन कार्ड पर प्रति माह तीन रुपए की दर से 35 किलो चावल देना शुरु किया है.

प्रचार
शहरों में भी चुनाव प्रचार का ज़ोर दिखाई नहीं दे रहा है

इसके अलावा उसने किसानों को 14 की जगह तीन प्रतिशत ब्याज दर पर ऋण देना भी शुरु किया है.

विकास, चावल और सस्ता कर्ज़ ही चुनाव का मुख्य चुनावी मुद्दा बने हुए हैं.

कांग्रेस ने इसके जवाब में कहना शुरु किया है कि विकास तो केंद्र के पैसे से हुआ और वह भी तब जब केंद्र की कांग्रेस सरकार ने राज्य के आबंटन को चार गुना बढ़ा दिया.

दूसरे वह विकास के काम में हुए भ्रष्टाचार की बात कर रही है.

सस्ते चावल की होड़ में कांग्रेस ने दो रुपए किलो की दर से चावल देने का आश्वासन दे दिया और किसान को ब्याज मुक्त कर्ज़ देने की घोषणा कर दी है.

लेकिन मतदाता पर इन लोकलुभावन नारों-वायदों का असर ख़ास नहीं दिख रहा है.

राजधानी रायपुर से 60 किलोमीटर दूर एक गाँव में किसानी करने वाले एक मतदाता का कहना है, "एक तो चावल सभी को नहीं मिल रहा है. जिनको मिल रहा है उन्हें भी ख़ासी मशक्कत के बाद मिल रहा है और फिर 35 किलो चावल से परिवार का काम भी तो नहीं चलता."

वे कहते हैं, "जनता को अब समझ में आ रहा है कि राजनीतिक दल उनके ही पैसों से चावल की राजनीति करने की कोशिश कर रहे हैं."

जैसा कि एक और मतदाता ने रायपुर में बीबीसी से कहा, "कोई कुछ कह रहा है तो कोई कुछ, राजनीति के समय में तो ऐसा सभी कहते हैं."

जबकि बस्तर सुदूर आदिवासी इलाक़ों में चावल से बड़ा मुद्दा नक्सली हिंसा और उसके जवाब में शुरु हुए सलवा जुड़ुम आंदोलन की हिंसा है.

विकास का सवाल

राज्य में विकास का जहाँ तक सवाल है को छत्तीसगढ़ के शहरों में तो विकास दिखाई देता है लेकिन गाँवों में विकास की गति वैसी नहीं रही है.

एक मतदाता का आकलन
 ग्रामीण रोज़गार गारंटी योजना के ज़रिए गाँवों में काम की गुंजाइश थी लेकिन इसमें तालाब बनवाने या तालाब के गहरीकरण जैसी योजना का प्रावधान ही नहीं है और न किसी निर्माण कार्य की, इसलिए या तो सिर्फ़ सड़कें बन रही हैं वरना कोई काम ही नहीं है

जैसा कि राज्य में चुनाव देख रहे बीबीसी संवाददाता सलमान रावी ने कहा, "गाँवों में तो अभी भी लोग हैजा से मर रहे हैं."

विकास के इस असंतुलन ने सरकार की छवि को लेकर एक विरोधाभास भी पैदा किया है.

बलौदाबाज़ार विधानसभा क्षेत्र में रहने वाले तुकेंद्र कहते हैं, "ग्रामीण रोज़गार गारंटी योजना के ज़रिए गाँवों में काम की गुंजाइश थी लेकिन इसमें तालाब बनवाने या तालाब के गहरीकरण जैसी योजना का प्रावधान ही नहीं है और न किसी निर्माण कार्य की, इसलिए या तो सिर्फ़ सड़कें बन रही हैं वरना कोई काम ही नहीं है."

वे कहते हैं, "गाँवों में तो विकास के नाम पर कई ऐसे काम हो गए जिससे लोगों को सुविधा की जगह असुविधा होने लगी."

इसका मतलब यह भी है कि छत्तीसगढ़ में ग्रामीण रोज़गार योजना कारगर साबित नहीं हुई है. शायद इसीलिए कांग्रेस राज्य में अपनी ही केंद्र सरकार की इस बड़ी योजना को उपलब्धि की तरह नहीं गिनवा पा रही है.

ख़ामोशी का मतलब

छत्तीसगढ़ में चुनावों को नज़दीक से देख रहे राजनीतिक विश्लेषक सुदीप श्रीवास्तव इस बात से सहमत नहीं हैं कि मतदाता ख़ामोश है.

एक वरिष्ठ पत्रकार का विश्लेषण
 इसका एक मतलब तो यह है कि मतदाता परिवर्तन चाहते हैं लेकिन इसका एक मतलब यह भी हो सकता है कि वह अंतिम समय तक अपना विकल्प खुले रखकर आकलन कर रहा है

वे कहते हैं कि मतदाता अपनी राय साफ़ ज़ाहिर कर रहा है कि वह बदलाव चाहता है या नहीं.

लेकिन मतदाताओं की राय पूछे जाने पर वे कहते हैं, "यदि यह चुनाव रमन सिंह बनाम अजीत जोगी हुआ तो मतदाता रमन सिंह को चुनना चाहेगा क्योंकि रमन सिंह की छवि अजीत जोगी की तुलना में लोगों को ज़्यादा स्वीकार्य है और यह पिछले चुनाव में भी साबित हो चुका है."

सुदीप कहते हैं, "लेकिन अगर ऐसा नहीं हुआ तो लोग अपने क्षेत्र के विधायक या उसके ख़िलाफ़ खड़े प्रत्याशी की छवि देखकर वोट डालेंगे."

लेकिन मतदाता की ख़ामोशी की वकालत करने वाले एक वरिष्ठ पत्रकार का कहना है, "मतदाता देख रहा है कि किसी भी राजनीतिक दल के पास उन्हें देने के लिए कुछ नया है ही नहीं इसलिए वह चुपचाप उन्हें तौल रहा है."

जबकि बीबीसी संवाददाता सलमान रावी इस ख़ामोशी को मतदाता के भ्रम की तरह देखते हैं.

चुनाव प्रचार
मतदाता के झुकाव का साफ़ अंदाज़ा लगाना कठिन दिख रहा है

वे कहते हैं कि मतदाता राजनीतिक दलों के नारों-वायदों को नापतौल रहा है और फिर मतदान से पहले अपना मन बनाएगा.

महाराष्ट्र से छत्तीसगढ़ का चुनाव देखने आए एक वरिष्ठ पत्रकार से जब पूछा गया कि इस ख़ामोशी का क्या मतलब है तो उन्होंने कहा, "इसका एक मतलब तो यह है कि मतदाता परिवर्तन चाहते हैं लेकिन इसका एक मतलब यह भी हो सकता है कि वह अंतिम समय तक अपना विकल्प खुले रखकर आकलन कर रहा है."

लेकिन कुछ लोग इस चुप्पी को बदलाव का संकेत मानते हैं.

राज्य की राजधानी के एक वरिष्ठ पत्रकार ने कहा, "यदि मतदाता सरकार के साथ होता है तो खुलकर बोलने लगता है. लेकिन इस बार वह कुछ नहीं बोल रहा है."

वे इसे 'एंटी इंकंबेंसी' यानी सरकार के प्रति नाराज़गी का प्रतीक मानते हैं. उनका तर्क है कि सरकार ख़ुद मान रही थी कि मतदाता सरकार से नाराज़ हो सकते हैं और तभी तो पार्टी ने अपने 18 विधायकों की टिकट काट दी.

कुल मिलाकर मतदाता की चुप्पी के विश्लेषण बहुत से हैं और यह एक पहेली की तरह दिखता है ज़ाहिर है कि इस पहेली का हल आठ दिसंबर को होने वाली मतगणना के बाद ही सामने आएगा.

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