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बुधवार, 12 नवंबर, 2008 को 05:10 GMT तक के समाचार
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बस्तर के कई इलाक़ों में सन्नाटा

बस्तर में सुरक्षाकर्मी
नक्सलियों की वजह से बस्तर के क़स्बाई इलाक़ों में सुरक्षाव्यवस्था कड़ी दिखती है (फ़ोटो: राघवेन्द्र सिंह)

दक्षिण छत्तीसगढ़ का बस्तर इलाक़ा श्रीलंका के जाफ़ना से कम नहीं लगता. चारों तरफ़ बख्तरबंद गाडियाँ, उस पर कसी हुई संगीनों की नाल घुमाते सुरक्षा बलों के जवान और ऊपर उड़ान भरते हुए हेलीकॉप्टर.

यहाँ रेखाएँ खिंचीं हुईं हैं क्योंकि यह एक तरह से रणभूमि है.

एक ऐसी लड़ाई लड़ी जा रही है जिसका कोई नतीजा निकलता नज़र नहीं आता.

दंतेवाडा, बस्तर, नारायणपुर और बीजापुर के कई इलाक़े ऐसे हैं जो प्रतिबंधित क्षेत्र घोषित किए जा चुके हैं.

कहीं प्रतिबंध अर्धसैनिक बलों ने लगा रखा है तो कहीं भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) की पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी ने.

"आप बिना इजाज़त के इस तरफ़ नहीं जा सकते क्योंकि यहाँ पर सलवा जुड़ुम और अर्धसैनिक बलों का शिविर है." यह सलाह दी गीदम थाने के एक अधिकारी ने.

शायद दरोगा साहब सही कह रहे थे. इन इलाक़ों में अनजान दिखने वाले चेहरों पर भरोसा नहीं किया जा सकता.

भरोसा नहीं

पिछले कुछ सालों में कुछ ऐसी वारदातें हुईं हैं जब हथियारबंद माओवादियों ने सलवा जुड़ुम के शिविरों पर हमला करके कई लोगों को मौत के घाट उतार दिया या फिर गीदम थाने को ही लूट लिया.

कोई किसी पर भरोसा करने की स्थिति में नहीं है.

नक्सली
नक्सलियों का दावा है कि बस्तर के बड़े इलाक़े में उनकी सामानांतकर सत्ता है

राजधानी रायपुर से नारायणपुर जाने में एक ऐसी जगह भी आई जब हमारे वाहन की सघन तलाशी ली गई. परिचय पत्र दिखाने और छत्तीसगढ़ आने का कारण बताने के बाद भी सशस्त्र बल का नेतृत्व कर रहे अफ़सर को संतुष्टि नहीं हो सकी.

अधिकारी ने पूछा, "कहाँ जा रहे हो आप लोग?"

हम लोगों ने बताया की हम विधानसभा चुनाव का जायज़ा लेने आए हैं और दंतेवाडा जा रहे हैं.

इस पर अधिकारी ने कहा, "वहाँ कहाँ रुकिएगा उसका अता-पता बता दीजिए ताकि हम लोग आपका सत्यापन कर सकें."

लंबी चली तलाशी के बाद हम आगे बढ़े तो दिल धक् से रह गया.

जंगलों की श्रृंखलाओं के बीच सादे लिबास में बंदूकधारियों ने हाथ का इशारा देकर हमें रुकने को कहा. सभी के पास में अत्याधुनिक बंदूकें चमचमा रहीं थीं.

हमारे ड्राईवर शाहनवाज़ ने डरी हुई आवाज़ में पूछा "क्या यह माओवादी हैं?"

तब तक हमारे साथ जा रहे फ़िल्मकार मित्र राघवेन्द्र सिंह इस नतीजे पर पहुँचे कि सादे लिबास के बंदूकधारी दरअसल पुलिस वाले हैं. फिर दंतेवाड़ा पहुँचने तक यह नज़ारा सड़कों पर आम था.

फ़िल्मों जैसा दृश्य

सादे लिबास में बंदूकें लेकर बाज़ार हाट में चहलकदमी करते 18 से 20 साल की उम्र के आदिवासी नौजवान.

वो बंदूक लेकर ऐसे घूम रहे थे जैसे कोई धूप में छाता लेकर निकला हो. मैंने इस तरह के दृश्य मैंने शायद टीवी पर ही देखे थे.

 यह युद्ध का क्षेत्र है. हम सतर्कता नहीं बरतेंगे तो मारे जायेंगे. माओवादियों को एक बार ख़ुशक़िस्मत होना पड़ता है जबकि हमें हर रोज़
दीक्षित, सुरक्षा अधिकारी

इन कम उम्र के बच्चों के हाथों में हथियार देखकर अफ़ग़ानिस्तान पर बने कई वृत्तचित्रों की याद आ गई जिनमें इसी उम्र के अफ़ग़ान बच्चों को इसी तरह हथियार लेकर बाज़ार हाट में घूमते दिखाया गया था.

गीदम के स्पेशल सर्विस ब्यूरो के अधिकारी दीक्षित का कहना था, "यह युद्ध का क्षेत्र है. हम सतर्कता नहीं बरतेंगे तो मारे जायेंगे. माओवादियों को एक बार ख़ुशक़िस्मत होना पड़ता है जबकि हमें हर रोज़."

उनका कहना था, "वो एक बार ख़ुशक़िस्मत तब होते हैं जब वो सही तरीक़े से बारूदी सुरंग के विस्फोट को अंजाम देते हैं जबकि हमें रोज़ ख़ुशक़िस्मत इसलिए होना पड़ता है कि हमें रोज़ सही सलामत वापस अपने कैंप लौटना है."

चुनाव बहिष्कार

यह इलाक़ा माओवादियों के स्वघोषित दंडकारण्य क्षेत्र का हिस्सा है और संगठन का दावा है कि इन इलाक़ों में उनकी समानांतर सत्ता चलती है.

माओवादियों के पोस्टर
लोग कहते हैं कि अधिकारी इन पोस्टरों को हटाने की हिम्मत नहीं कर पा रहे हैं (फ़ोटो: राघवेन्द्र सिंह)

हालांकि पुलिस और प्रशासन इस बात से इनकार करते हैं मगर इन इलाक़ों में घूमने के बाद यह तो समझ में आता है कि सरकारी तंत्र की पकड़ सिर्फ़ क़स्बाई इलाक़ों तक ही सीमित है.

कहीं-कहीं पर तो क़स्बों पर से भी प्रशासन की पकड़ ढीली पड़ चुकी है. गीदम से चित्रकूट तक माओवादियों ने डंके की चोट पर चुनाव बहिष्कार के पर्चे चिपका रखे हैं.

स्थानीय लोगों का कहना है कि यह पोस्टर कई हफ्तों से इसी तरह टंगे हुए हैं मगर प्रशासनिक अधिकारियों में इन्हें हटाने की हिम्मत नहीं है.

उधर ग्रामीण इलाकों में तो प्रशासन नदारद ही है.

बुनियादी सुविधाओं की बाट जोहते इन इलाकों में हर साल औसतन 500 लोगों की मौत हैजा, मलेरिया या अन्य संक्रमण से इलाज के अभाव में होती रही है. इस वर्ष भी स्तिथि कमोबेश वैसी ही है.

माओवादियों के चुनाव बहिष्कार के नारे के बाद ग्रामीण इलाकों में चुनाव की कोई सुगबुगाहट नहीं है जबकि शहरी इलाक़े राजनीतिक दलों के पोस्टरों से पटे पड़े हैं.

इन इलाकों में न तो प्रचारक जा रहे हैं और न ही कार्यकर्ता.

दंतेवाड़ा में पिछले नौ नवंबर को ऐसे ही सुदूर इलाक़े में प्रचार कर रहे भारतीय जनता पार्टी के दो नेताओं की माओवादियों ने निर्मम हत्या कर दी जिसके बाद इलाक़े में दहशत व्याप्त है.

हालांकि चुनाव को देखते हुए भारी संख्या में अर्धसैनिक बलों की तैनाती की गई है लेकिन माओवादियों के नियंत्रण वाले इलाक़ों में उनकी मौजूदगी नहीं है.

तमाम व्यवस्थाओं के दावों के बावजूद माओवादियों ने छत्तीसगढ़ पुलिस महानिरीक्षक एमएस मरावी को गोली मारकर गंभीर रूप से घायल कर दिया. साथ ही नारायणपुर इलाक़े में संगठन के दस्तों ने बिजली के चार टावरों को भी ध्वस्त कर दिया.

सन्नाटा

दक्षिण छत्तीसगढ़ के क़स्बाई इलाक़े अगर छावनी में तब्दील हो गए हैं तो इंद्रावती नदी के उस पार अबूझमाड़ के इलाक़े में सन्नाटा पसरा हुआ है.

आदिवासियों का जलाया गया गाँव (फ़ाइल फ़ोटो)
अबूझमाड़ के सुदूर इलाक़े में अभी भी प्रशासन की पकड़ दिखाई नहीं दिखती

जिससे पूछिए तो एक ही जवाब मिलता है, "वहाँ कोई आता-जाता नहीं है. वहाँ जाने का कोई साधन नहीं है और वहाँ जाना ख़तरे से खाली नहीं है."

कुछ लोगों का कहना था कि माओवादियों की अनुमति और अनुशंसा के बिना अबूझमाड़ में जाया नहीं जा सकता. न नदी पर पुल है न सड़क और यह इलाक़ा बाक़ी राज्य से कटा हुआ है.

शायद इसीलिए इसे माओवादियों के प्रभाव का इलाक़ा कहा जाता है.

अधिकारी मानते हैं कि नक्सलवाद की समस्या का समाधान सिर्फ़ पुलिस के बल पर नहीं किया जा सकता.

ज़ाहिर है कि इसके लिए ज़रूरी है कि इन सुदूर और दुर्गम इलाकों में भी विकास की किरणें पहुँचें जिसकी पहल करने का दावा सरकार कर रही है.

कुछ इलाक़ों में बॉर्डर रोड ऑर्गेनाइजेशन (बीआरओ) सड़कें भी बना रही है हालांकि कई स्थानों पर माओवादी इसका विरोध कर रहे हैं.

दंतेवाडा के एसपी राहुल शर्मा का दावा है कि सड़कें बनने के बाद नक्सली समस्या पर क़ाबू पाने में काफ़ी मदद मिली है.

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