|
सलवा जुड़ुम बंद हो: योजना आयोग | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
योजना आयोग ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा है कि छत्तीसगढ़ राज्य में नक्सलियों के ख़िलाफ़ चल रहे सलवा जुड़ुम अभियान को बंद कर दिया जाए. चरमपंथ से प्रभावित इलाक़ों के विकास पर योजना आयोग की रिपोर्ट पर आयोग ने कहा है कि सरकार को नक्सलियों से बात करनी चाहिए और इसके लिए यह शर्त ख़त्म कर देनी चाहिए कि वे पहले हथियार छोड़ें. हालांकि अब तक भारत सरकार और छत्तीसगढ़ राज्य सरकार नक्सलियों से बातचीत की मंशा नहीं रखते और मानते हैं कि नक्सलियों के ख़िलाफ़ अभियान रोककर बातचीत करने से उन्हें और संगठित होने का मौक़ा मिलेगा. योजना आयोग की यह रिपोर्ट तैयार करने वाली समिति में सेवानिवृत नौकरशाह, पूर्व पुलिस अधिकारी और बुद्धिजीवी थे. रिपोर्ट हालांकि छत्तीसगढ़ सरकार सलवा जुड़ुम को स्वाभाविक रुप से शुरु हुआ जनआंदोलन बताती है और इसे किसी भी तरह की सरकारी सहायता नहीं है. लेकिन योजना आयोग की रिपोर्ट इसके उलट कहती है. रिपोर्ट में कहा गया है कि कई जगह लोग नक्सलियों के ख़िलाफ़ जनप्रतिरोध समितियाँ बनाते रहे हैं लेकिन समय के अनुसार इसे अधिकारियों ने प्रायोजित करना शुरु कर दिया. आयोग ने सलवा जुड़ुम को इसी श्रेणी में रखा गया है. रिपोर्ट में स्पेशल पुलिस ऑफ़िसर यानी एसपीओ के रुप में आम लोगों को हथियार देने का ज़िक्र करते हुए कहा गया है कि आदिवासी ही आदिवासी को मार रहे हैं. रिपोर्ट तैयार करने वाली योजना आयोग की समिति के चेयरमैन देबब्रत बंदोपाध्याय ने बीबीसी से कहा, "सरकार अपनी ज़िम्मेदारी निजी हाथों में नहीं सौंप सकती." सलवा जुड़ुम के चलते छत्तीसगढ़ के आदिवासियों के विस्थापित होने का भी मुद्दा उठाया है और कहा है कि आदिवासियों को अपने खेत-खलिहान और जानवर आदि छोड़कर कैंपों में रहना पड़ रहा है. रिपोर्ट कहती है, "ज़बरदस्ती हुए इस विस्थापन की वजह से आदिवासियों ने न केवल अपने गाँव छोड़े हैं बल्कि बहुत से लोग राज्य छोड़कर पड़ोसी राज्यों में चले गए हैं." नक्सलियों से बातचीत योजना आयोग ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि सरकार को नक्सलियों से बात करनी चाहिए.
हथियार छोड़ने पर ही बात करने की शर्त के बारे में रिपोर्ट कहती है, "सरकार का यह रवैया दूसरे चरमपंथी संगठनों के प्रति उसके रवैये से मेल नहीं खाता, तो नक्सलियों के साथ अलग सा बर्ताव क्यों?" योजना आयोग ने नक्सली समस्या को एक सामाजिक-आर्थिक समस्या के रुप में देखते हुए कहा है कि इसे 'अशांति' या 'उपद्रव' कहना और उसे हथियार के दम पर दबाने की कोशिश करना ठीक नहीं है. रिपोर्ट में बातचीत की सिफ़ारिश पर नक्सलियों की ओर से इस रिपोर्ट पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए उनके जनसंगठन के नेता साईंबाबा कहते हैं, "छत्तीसगढ़ में सलवा जुडुम और झारखंड में ग्राम रक्षा समितियाँ लोगों का दमन कर रही हैं, माओवादियों पर दमन कर रही हैं. गृहयुद्ध की जो स्थिति सरकार ने बना रखी है पहले उसे रोकना होगा." उन्होंने कहा कि पहले माहौल बनाया जाए तभी बात हो सकती है. हालांकि सरकारों का रवैया अब तक यह रहा है कि नक्सलियों के ख़िलाफ़ हथियारबंद अभियान को रोकने का मतलब यह होगा कि उन्हें संगठित होने का मौक़ा दिया जाए. इसलिए सरकार अब तक कहती आई है कि पहले नक्सली हथियार छोड़ें तभी बातचीत हो सकती है. | इससे जुड़ी ख़बरें सलवा जुडूम पर सुप्रीम कोर्ट सख़्त31 मार्च, 2008 | भारत और पड़ोस 'विकास का लाभ कमज़ोर वर्ग को मिले'25 जनवरी, 2008 | भारत और पड़ोस नक्सलवाद राजनीतिक समस्या है: मरांडी27 अक्तूबर, 2007 | भारत और पड़ोस झारखंड में चरम पर नक्सलवाद27 अक्तूबर, 2007 | भारत और पड़ोस नक्सली हमले में 'पुलिस लापरवाही'01 सितंबर, 2007 | भारत और पड़ोस नक्सलियों पर विधानसभा की गुप्त कार्रवाई26 जुलाई, 2007 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
| |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||