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गुरुवार, 26 जुलाई, 2007 को 19:01 GMT तक के समाचार
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नक्सलियों पर विधानसभा की गुप्त कार्रवाई

नक्सली
नक्सलियों के ख़िलाफ़ चल रहा सल्वा जुड़ुम आंदोलन विवादास्पद रहा है
छत्तीसगढ सरकार ने नक्सली समस्या पर चर्चा करने के लिए गुरुवार को विधानसभा का एक ऐसा सत्र बुलाया जिसकी कार्रवाई गुप्त रखी गई.

‘नक्सलवाद जैसी राष्ट्रीय समस्या पर खुले सदन में विचार-विमर्श नहीं किया जा सकता’ के तर्क वाले इस विशेष सत्र में पत्रकार, दर्शक और आम लोग मौजूद नहीं थे जैसा कि आमतौर पर संसद और राज्य विधानसभा की बैठकों में होता है.

छत्तीसगढ़ विधानसभा अध्यक्ष प्रेम प्रकाश पांडेय ने सत्र के शुरू होने से पहले बीबीसी से इसे सही ठहराते हुए कहा, “ नियमों में इस बात का उल्लेख है कि सदन के नेता और नेता प्रतिपक्ष की सहमति से विशेष विषय पर चर्चा के लिए इस तरह की बैठक बुलाई जा सकती है.”

अध्यक्ष का कहना था कि ऐसी एक विशेष बैठक बुलाने का प्रस्ताव मुख्यमंत्री रमन सिंह की ओर से आया था जिस पर सबकी सहमति थी.

सदन की कार्रवाई तय समय सुबह साढ़े नौ बजे की बजाए डेढ़ घंटे देर से शुरू हुई और इसमें विधायकों अलावा सिर्फ़ राज्य के मुख्य सचिव, पुलिस प्रमुख और गृह सचिव शामिल हुए.

बैठक का एजेंडा ‘नक्सलवाद और उससे जुड़ी समस्याएँ’ तो पहले से ही तय था.

लेकिन इस मामले पर पूरी चर्चा किस तरह हुई और क्या कोई सुझाव भी सामने आए, इसका पता नहीं चल सका है क्योंकि इन सभी पर सदन से बाहर चर्चा किए जाने की मनाही है.

प्रेम प्रकाश पांडेय ने कहा कि सदन में चर्चा में आए विषयों और सुझावों पर बाहर कोई बातचीत और उसका प्रकाशन विधानसभा के विशेषाधिकारों का उल्लंघन माना जाएगा.

बैठक में सरकार ने एक नई रणनीति प्रस्तुत की होगी, यह बात नेता प्रतिपक्ष महेन्द्र कर्मा की बातों से जाहिर हुई जिन्होंने कहा कि निश्चित तौर पर सरकार कोई नया व्यापक एजेंडा लेकर सामने आई होगी.

विधानसभा में विपक्षी कांग्रेस पार्टी के नेता महेन्द्र कर्मा नक्सलवाद के मामले में बीजेपी की रमन सिंह सरकार द्वारा ली गई नीतियों के समर्थक रहे हैं और सरकार समर्थित सल्वा जुड़ूम-कार्यक्रम की कमान भी एक तरह से उन्होंने ही संभाल रखी है.

रमन सिंह
मुख्यमंत्री रमन सिंह ने इस गुप्त बैठक का प्रस्ताव रखा था

शासन का कहना है कि सल्वा जुड़ूम नक्सलियों के ख़िलाफ़ आम लोगों का आंदोलन है. हालाँकि दूसरा पक्ष इसे सरकार द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम बताता है.

दो साल पहले शुरू हुए इस कार्यक्रम के बाद लगभग पचास हज़ार लोग अपने गाँव छोड़कर सरकारी कैंपों में रहने को मज़बूर हैं. इधर नक्सलियों ने भी अपनी गतिविधियाँ बस्तर के इलाक़ों में तेज कर दी हैं.

इन कारणों से नक्सलवाद से निपटने के सरकारी तौर-तरीकों का काफ़ी विरोध भी हो रहा है. पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी भी इन नीतियों के ख़िलाफ़ हैं.

हालाँकि महेंद्र कर्मा का कहना है कि नक्सलवाद जैसी राष्ट्रीय समस्या पर लोगों को दलगत राजनीति से ऊपर उठना चाहिए.

छत्तीसगढ शासन ने राजनीतिक दलों के भीतर नक्सलवाद पर मतभेद समाप्त करने के लिए पहले भी एक सर्वदलीय बैठक बुलाई थी.

इस सत्र का मक़सद भी जानकारों के अनुसार जनता तक यह संदेश पहुँचाना है कि माओवाद से निबटने की नीति पर सभी दलों की सहमति है. लेकिन उनके अनुसार यह सहमति होना अबकी स्थिति में और भी मुश्किल है जबकि सल्वा-जुड़ूम के बस्तर अथवा नए क्षेत्रों में फैलने की ख़बरें आ रहीं हैं और शासन नक्सलवादियों का साथ देने के नाम पर मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की गिरफ़्तारी और स्वयंसेवी संस्थाओं पर दबाव बनाने की मुहिम में जुटा है.

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