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टिकटें बाँटकर अब लड़ने को तैयार | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
टिकट के बँटवारे को लेकर फैले विरोध और उसे लेकर चल रहे दल-बदल के बीच मध्य प्रदेश के मुख्य राजनीतिक दलों, भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस ने अपने उम्मीदवारों की घोषणा कर दी है. राज्य में 27 नवंबर को विधान सभा चुनाव संपन्न होने हैं और राजनीतिक दल इसके लिए कमर कस चुके हैं. कांग्रेस ने राज्य की कुल 230 विधान सभा सीटों में से दो सीटें - बुरहानपुर और आमला विधानसभा क्षेत्र राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी और भाजपा ने बोहरीबंद सीट जनता दल (यू) के लिए छोड़ी हैं. वर्तमान भाजपा सरकार के मुख्य मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने बुधनी से अपना नामांकन दाखिल किया है जहाँ उनके विरोधी हैं कांग्रेस के महेश राजपूत और भारतीय जनशक्ति उम्मीदवार शिवशंकर पटेरिया. पूर्व में भाजपा की अहम नेता और प्रदेश की मुख्यमंत्री रह चुकीं उमा भारती की भारतीय जनशक्ति पार्टी ने चुनावी तालमेल के तहत लोक जनशक्ति और रिपब्लिकन पार्टी ऑफ़ इंडिया के लिए छोड़ी गई छह सीटों के अलावा सभी स्थानों से अपने उम्मीदवार खड़े किए हैं. उमा भारती ने ख़ुद टीकमगढ़ से पर्चा दाखिल किया है. राजनीति की बिसात पर माना जा रहा है कि शिवराज सिंह चौहान को मुख्यमंत्री बनाए जाने के विरोध में बीजेपी से बाहर आई उमा भारती भाजपा के परंपरागत हिंदुत्ववादी और पिछड़ी जातियों का वोट काटकर उसे काफ़ी नुकसान पहुँचाएँगी.
हालाँकि पार्टी प्रवक्ता उमाशंकर गुप्ता, जो भोपाल दक्षिण से भाजपा के प्रत्याशी भी हैं, कहते हैं कि मध्य प्रदेश में हर बार की तरह इस बार भी मुख्य राजनीतिक लड़ाई भाजपा और कांग्रेस के बीच ही रहेगी और जहाँ तक उमा भारती का सवाल है तो आजतक राज्य में भाजपा छोड़कर बाहर जाने वाले किसी व्यक्ति का दल के बाहर भी कोई वजूद नहीं रहा है. दो साल पहले भाजश के गठन के बाद राज्य में हुए उप चुनावों में हालाँकि उमा भारती का दल कोई सीट नहीं जीत पाया है लेकिन उसने भाजपा के वोट ज़रूर काटे हैं लेकिन फिलहाल तो उमा भारती अकेली ही लड़ रही हैं. उनके सारे सिपहसालार मैदान छोड़ भाग चुके हैं और भाजश के पास कोई ठोस संगठन भी नहीं है. हालाँकि एक तर्क यह भी है कि भाजश की मौजूदगी नकारात्मक वोटों यानी एंटी-इनकम्बेंसी मतों को कांग्रेस के पक्ष में जाने से रोकेगी. वह वोट भाजश को जाएँगें जिससे बीजेपी फायदे में रहेगी. लेकिन इस बार का विधान सभा चुनाव बहु-ध्रुवीय है, क्षेत्रीय राजनीतिक पार्टियों राष्ट्रीय समानता दल, गोंडवाना गणतंत्र पार्टी के अलावा समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी उम्मीदवारों की बड़ी संख्या के साथ मैदान में मौजूद हैं. क्षेत्रीय वर्चस्व सपा राज्य इकाई के प्रमुख नारायण त्रिपाठी का कहना है कि मध्य प्रदेश में इस समय उनके साढ़े चार लाख सामान्य और चार हज़ार सक्रिय सदस्य हैं और वह सभी निर्वाचन क्षेत्र में उनकी चुनाव समिति तक तैयार हैं. हालाँकि 2003 चुनावों के बाद एसपी सदन में तीसरी शक्ति के रूप में उभरी थी मगर कहा जाता है कि उन उम्मीदवारों की जीत अपने बल बूते हुई थी न कि पार्टी के कारण. बसपा को लेकिन कई हलकों में इस चुनाव का अहम खिलाड़ी माना जा रहा है जिसने पिछले कुछ महीनों में कई स्वर्ण और दलित सम्मेलनों के बाद सभी सीटों पर उम्मीदवार उतारकर उत्तर प्रदेश में हुए सफल प्रयोग को यहाँ दुहराने की कोशिश के संकेत दिए हैं. बसपा ने लगभग तीन दर्जन ब्राह्मण, दो दर्जन क्षत्रिय और अल्पसंख्यक उम्मीदवारों को मैदान में उतारा है. बसपा का किसी राजनीतिक दल से कोई सीधा चुनावी गठबंधन नहीं घोषित हुआ है लेकिन उमा भारती ने यह कहकर कि अगर मौक़ा मिला तो वह मायावती को प्रधानमंत्री बनाने में मदद करेंगीं, कई नई अटकलों को जन्म दिया है. वैसे आम राय है कि बसपा कांग्रेस के वोट में सेंध लगायेगी अनुसूचित जाति के वोट काटकर लेकिन इस विचार के विरोधी तर्क देते हैं कि पिछले चुनाव में अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित 34 सीटों में से 31 बीजेपी के खाते में गई थीं और इनका बीएसपी की ओर खिसकना कांग्रेस को नहीं भाजपा को नुकसान पहुँचाएगा. भाजपा के लिए चुनौती भाजपा, जो राज्य के 50 साल के इतिहास में पहली बार लगातार पाँच साल सत्ता में रहने के बाद चुनाव लड़ रही है, उसे 'एंटी-इनकम्बेंसी' झेलना है और सरकार में बढ़ी भ्रष्टाचार की शिकायत, गाँव में बिजली और खाद की भरी कमी, प्रदेश के कई इलाकों में सुखा, कुपोषण और विस्थापन के मुद्दे सरकार के लिए मुश्किल खड़ी कर सकते हैं.
कांग्रेस अबतक इन विषयों को ज़ोर शोर से उठाने में नाकामयाब रही है और पार्टी में अब तक मुख्य मंत्री के पद को लेकर बड़े नेताओं के बीच रस्साकशी जारी है जबकि उस पद के दावेदार समझे जाने वाले लीडरों में से किसी ने अब तक नामांकन भी दाखिल नही किया है. राजनीतिक विश्लेषक रशीद किदवई कहते हैं कि जनता बदलाव के लिए तैयार है लेकिन मुख्य विपक्षी दल अपने आपको 'अल्टरनेटिव' के तौर पर पेश करने में अब तक नाकाम रही है. टिकट के बँटवारे को लेकर नेताओं के बीच कलह और बढ़ गया है और कांग्रेस को कई प्रमुख स्थानीय नेताओं से हाथ धोना पड़ा है. उम्मीदवारों का चयन भाजपा के लिए भी इस हद तक मुसीबत साबित हुआ है कि पार्टी के कोषाध्यक्ष तक ने बागी के तौर पर नामांकन दाखिल कर दिया है. फिर भी इस कलह ने कम से कम इस मुद्दा रहित, लहर-विहीन और क़रीब-क़रीब करिश्मे से पैदल नेताओं से भरे चुनावों में थोड़ी तो दिलचस्पी पैदा की है. |
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