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कोलकाता में क़ब्रिस्तान बनेंगे पर्यटन स्थल | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
पुराने क़ब्रिस्तान और सैकड़ों साल पहले उनमें दफ़न मुर्दे भी भला पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र बन सकते हैं. यह सुन कर हैरत हो सकती है, लेकिन पश्चिम बंगाल में सरकार इसी अनूठी योजना पर काम कर रही है. राज्य की वाम मोर्चा सरकार ने कोलकाता में ब्रिटिश शासनकाल के दौरान बने क़ब्रिस्तानों को पर्यटन स्थल के तौर पर बढ़ावा देने का फ़ैसला किया है. ब्रिटेन, स्कॉटलैंड और आयरलैंड से अपने पुरखों की क़ब्र तलाशने के लिए कोलकाता आने वाले पर्यटकों की तादाद में लगातार बढ़ोतरी सरकारी फ़ैसले की प्रमुख वजह है. अनूठा प्रयास पर्यटन मंत्री मानव मुखर्जी कहते हैं, "क़ब्रिस्तानों को पर्यटन केंद्र बनने की बात अनूठी लग सकती है, लेकिन हम राज्य के हेरिटेज टूरिज्म सर्किट में सदियों पुराने इन क़ब्रिस्तानों को भी शामिल करना चाहते हैं." वो कहते हैं,"हम लंदन के हाईगेट सेमिट्री और पेरिस के पेरे-लेकाइसे सेमिट्री के तौर पर महानगर के क़ब्रिस्तानों को भी पर्यटकों के लिए आकर्षण के तौर पर बढ़ावा देना चाहते हैं." वर्ष 1772 से 1911 तक ब्रिटिश राज की राजधानी रहे कोलकाता शहर के बीचोबीच कई पुराने क़ब्रिस्तान हैं. समुचित देख-रेख की अभाव में इनमें से कुछ की हालत जर्जर है, लेकिन सरकार ने अब इनकी मरम्मत और पुनरुद्धार की योजना बनाई है. दफ़नाने की तारीख़ अहम पार्क स्ट्रीट स्थित दो क़ब्रिस्तान तो लगभग ढाई सौ साल पुराने हैं. इनमें दफ़नाए गए लोगों के रिकॉर्ड को डिजिटल रूप में संरक्षित करने का काम भी शुरू हो गया है. यह काम पूरा होने पर लोग दफ़नाने की तारीख़ के आधार पर अपने पुरखों की कब्र तलाश सकते हैं. महानगर में चार प्रमुख क़ब्रिस्तानों का संचालन करने वाले क्रिश्चियन बरियल बोर्ड (सीबीबी) ने लगभग दो सौ साल पहले इनमें दफ़नाए गए लोगों के रिकॉर्ड एक कंप्यूटर में फ़ीड करने का काम शुरू कर दिया है. इनमें ज्यादातर ब्रिटिश नागरिक थे. सीबीबी के रणजय बोस बताते हैं, "लगभग 20 हज़ार क़ब्रों और दफ़नाए गए एक लाख लोगों से संबंधित आंकड़ों को कंप्यूटर में फ़ीड करने का काम पूरा हो जाने पर अपने पुरखों की तलाश में महानगर आने वाले ब्रिटेन, स्कॉटलैंड और आयरलैंड के लोगों की तलाश कंप्यूटर पर क्लिक करते ही पूरी हो जाएगी." हेनरी लुइस भी दफ़न
पार्क स्ट्रीट सेमिट्री में जिन लोगों की कब्रें हैं उनमें एशियाटिक सोसायटी की स्थापना करने वाले मशहूर शिक्षाविद् विलियम जोंस और कवि हेनरी लुइस विवियन डिरोजियो भी शामिल हैं. पुराने मामलों में लोग कंप्यूटर में दफ़नाने की तारीख डाल कर अपने पुरखों के बारे में जानकारी हासिल कर सकते हैं. जो मामले ज्यादा पुराने नहीं हैं, उनमें नाम के सहारे ही ब्योरा तलाशा जा सकता है. तमाम आंकड़ों को डिजिटल स्वरूप देने का काम इस साल के आखिर तक पूरा हो जाएगा. बोस बताते हैं कि 'रोज़ाना कोई दो दर्जन विदेशी अपने पुरखों की कब्र तलाशने महानगर के विभिन्न क़ब्रिस्तानों में आते हैं, लेकिन रिकार्ड बेहतर नहीं होने की वजह से उनको काफ़ी परेशानी उठानी पड़ती है.' पर्यटन मंत्री कहते हैं कि "यह काम पूरा हो जाने पर विदेशी पर्यटकों को पहले की तरह यहां आ कर पुरखों की कब्र तलाशने के लिए इन कब्रिस्तानों में नहीं भटकना होगा. अब वे अपने देश में ही इंटरनेट के जरिए पुरखों की कब्र का पता लगा कर कोलकाता आ सकते हैं. इससे उनकी परेशानी भी कम हो जाएगी और समय भी बचेगा. दूसरी ओर, राज्य सरकार को इन पर्यटकों के यहां आने पर उनसे विदेशी मुद्रा की आय होगी." |
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