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शनिवार, 24 जुलाई, 2004 को 10:21 GMT तक के समाचार
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स्मारकों पर लिखे जाते हैं फ़िल्मी गीत

चारा समुदाय के लोग अपने एक प्रियजन के स्मारक पर
लोग अपने प्रियजनों के स्मारक पर जाते हैं और उनकी पसंद की चीज़ें वहाँ रख आते हैं
क्या आपको कभी ऐसे अंतिम संस्कार और श्मशान स्थल देखने का मौक़ा मिला है जहाँ 'राम नाम सत्य है' के बजाय फ़िल्मी गीतों की धुनें बजती हों या स्मारकों पर मृतक के व्यक्तित्व का बखान करने वाले फ़िल्मी गीत लिखे जा रहे हों. चाहे वह पुरुष हो या स्त्री.

भले ही आपके लिए यह एक चौंकाने वाली बात हो लेकिन गुजरात में ऐसा ही एक अनूठा श्मशान स्थल है और यहाँ 'छारा' समुदाय के लोग 'अंतिम संस्कार' के लिए अब भी यही तरीक़ा अपनाते हैं.

ग़ौरतलब है कि हिंदू संप्रदाय में शव को जलाने और बहुत आगे बढ़े तो मृतक की स्मृति में स्मारक बनाने की परंपरा तो रही है.

छारा समुदाय के लोग अपने पूर्वजों की ही पूजा करते हैं और साबरमती के तट पर मंदिरों के रूप में स्थापित किए गए इनके पूर्वजों के असंख्य स्मारक देखे जा सकते हैं.

जब छारा समुदाय के ही एक वयोवृद्ध बच्चूभाई गारंगे से इसकी वजह पूछी गई तो उन्होंने बताया, "हमें अपने पूर्वजों की ही पूजा करने के लिए बाध्य किया गया क्योंकि हिंदुओं की जाति व्यवस्था में आर्थिक और सामाजिक, दोनों ही रूपों में हम सबसे ग़रीब थे."

परंपरा के अनुसार किसी भी छारा को इन स्मारकों का एक चक्कर लगाकर उसपर लिखे उद्धरण पढ़ने होते हैं.

स्मारक लेख
स्मारक पर लिखा फ़िल्मी गीत

ऐसे ही एक छारा, विक्रम कुमार घमंडे ने अपने भाई के स्मारक को दिखाते हुए बताया, "इस स्मारक पर 'सफ़र' फिल्म के एक गीत- 'रोते-रोते ज़माने में आए थे हम, हँसते-हँसते ज़माने से जाएँगे हम' का मुखड़ा लिखा गया है क्योंकि ये मेरे भाई के व्यक्तित्व से बिल्कुल मेल खाता है."

इसके अलावा कई स्मारकों पर लोगों के जीवन की ख़ास उपलब्धियों वाले नारे या उनकी डिग्रियाँ भी लगाई गई हैं.

एक अन्य व्यक्ति अतुल इंद्रेकर बताते हैं कि इस तरह मंदिरनुमा स्मारक बनाने का काम कई पीढ़ियों से चला आ रहा है.

हालाँकि शुरूआती दौर में स्मारकों की जगह पत्थर आदि रखे जाते थे लेकिन जैसे-जैसे शिक्षा और जागरूकता बढ़ी, मंदिरनुमा स्मारकों का विकास होने लगा. आज इन्हीं मंदिरनुमा स्मारकों को स्थापित करके वे अपने पूर्वजों को याद करते हैं.

अनोखी बातें

लेकिन यहाँ का अनोखापन केवल नारों और गानों तक ही सीमित नहीं है.

 हमें अपने पूर्वजों की ही पूजा करने के लिए बाध्य किया गया क्योंकि हिंदुओं की जाति व्यवस्था में आर्थिक और सामाजिक, दोनों ही रूपों में हम सबसे ग़रीब थे
बच्चू भाई गारंगे

छारा समुदाय में यह भी प्रथा प्रयोग में देखने को मिलती है कि मृतक के परिजन और मित्र अक्सर इन स्मारकों और ऐसे स्थानों पर जाते हैं जिनसे मृतक को लगाव था. इस तरह ये लोग मृतक की भावनाओं और इच्छाओं को ध्यान में रखते हैं.

स्मारकों के पास पान मसाला, मिठाइयाँ, शराब और यहाँ तक कि तकिया भी रखा मिला.

समय के साथ छारा समुदाय के स्मारकों की संख्या बढ़ी है और स्मारकों के लिए जगह की कमी एक समस्या के रूप में अब छारा समुदाय के सामने है.

वे अपनी इस परंपरा को क़ायम रखना चाहते हैं. विक्रम बताते हैं, "ज़मीन की कमी वाक़ई हमारे लिए चिंता की एक बड़ी वजह है और समुदाय के तमाम शिक्षित लोग इसका समाधान खोजने में लगे हैं."

श्मशान भूमि का प्रयोग समुदायिक सभाओं के लिए भी किया जाता है जहाँ चाय की चुस्कियों के साथ ये लोग विभिन्न मुद्दों पर विचार-विमर्श करते हैं.

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