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बुधवार, 23 मार्च, 2005 को 07:24 GMT तक के समाचार
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ज़िंदा लोगों से नफ़रत और मुर्दों से प्यार

केजा बाई
केजा बाई के पति यहाँ काम करने आए थे
रायपुर की केजा बाई को ज़िंदा लोगों से नफ़रत है और मुर्दों से प्यार!

उनको अपनी दुनिया ही अच्छी लगती है. अपनी दुनिया यानी मुर्दों की दुनिया, जिसकी रखवाली वे पिछले 65 सालों से करती आ रही हैं.

अगर किसी को क़ब्रिस्तान में एक रात गुज़ारने के लिए कह दिया जाए तो अच्छे-अच्छों की रुह कांप जाए लेकिन केजा बाई मसीह पिछले 65 सालों से दिन-रात पारसी क़ब्रिस्तान में बतौर चौकीदार काम कर रही हैं.

छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश के इस इकलौते पारसी क़ब्रिस्तान में राज्य भर से पारसी समुदाय के लोग अपने परिजनों का अंतिम संस्कार करने के लिए आते हैं.

केजा बाई मसीह के ज़िम्मे अंतिम संस्कार की सारी व्यवस्था करना तो शामिल है ही, इस क़ब्रिस्तान की रखवाली भी केजा बाई के ही जिम्मे है.

केजा बाई का दावा है कि उनकी उम्र 104 साल है.

रायपुर में ही पली-बढ़ी केजाबाई शहर के इस क़ब्रिस्तान में पहली बार 1940 में अपने पति युसूफ़ मसीह के साथ आयी थीं. पति को इस क़ब्रिस्तान में पारसी समाज ने बतौर चौकीदार नौकरी दी थी.

मजबूरी

लेकिन कुछ ही दिनों में पति गुज़र गए. घर में रोज़ी-रोटी का संकट पैदा हो गया. आख़िरकार केजाबाई ने घर-परिवार चलाने के लिए 12 रुपए मासिक पर पति की नौकरी संभाल ली.

रहने की जगह क़ब्रिस्तान के ही एक कोने में मिल गई और अपने पाँच बच्चों के साथ वे वहीं रहने लगीं.

दुनिया वालों को जवाब
 इन मुर्दों ने मुझे ज़िंदगी दी. जब मैं दाने-दाने को मोहताज थी, तब इन मुर्दों ने मुझे अपने बीच सर छुपाने की जगह दी. अब तो उम्र के बचे-खुचे दिन भी मैं इन मुर्दों के साथ ही गुजारना चाहती हूं. इस डरपोक दुनिया की मैं परवाह क्यों करुं?
केजा बाई

केजा बाई बताती हैं कि जब उन्होंने इस क़ब्रिस्तान में रहना और काम करना शुरु किया, तब कई-कई किलोमीटर दूर तक सब तरफ़ केवल जंगल ही जंगल था. दिन में भी इस इलाके में आने से लोग डरते थे.

हर रोज़ रात को क़ब्रिस्तान के लैम्प पोस्ट में जो दिया केजा बाई जलाती थीं, वही इस इलाक़े में एकमात्र रोशनी हुआ करती थी.

केजा बाई कहती हैं- “लोगों के लिए यह विश्वास कर पाना मुश्किल था कि एक औरत इस कब्रिस्तान की रखवाली कर पाएगी. औरत तो औरत, मर्द भी कब्रिस्तान के आसपास अकेले फटकने से डरते थे. आज भी अधिकतर लोग एक अजीब क़िस्म की दहशत के साथ यहां आते हैं.”

जिस छत्तीसगढ़ में भूत-प्रेत और टोना-टोटका के नाम पर लगभग हर रोज़ कोई न कोई मामला पुलिस में दर्ज होता है, वहां एक क़ब्रिस्तान में रहने में कोई क्षण तो ऐसा आया होगा, जब केजा बाई को डर लगा हो?

केजा बाई कहती हैं- “मुर्दों से भला क्या डरना ! मुझे तो इनसे प्यार है. ये तो कभी किसी को नुक़सान नहीं पहुंचाते. इनके ही कारण तो मेरी दो जून की रोटी चलती है. मुझे डर तो ज़िंदा लोगों से लगता है. आज के लोग झूठ, मक्कारी और भ्रष्टाचार में गले तक धंसे हैं. लोग सोचते कुछ हैं, बोलते कुछ हैं और करते कुछ और हैं.”

केजा बाई को हर महीने रायपुर के पारसी समुदाय से चार सौ रुपए और नगर निगम से दो सौ रुपए की पगार मिलती है, जिससे उनका गुज़ारा चलता है.

परवाह नहीं

लेकिन बढ़ती उम्र के कारण अब उनके लिए भी काम करना मुश्किल हो रहा है.

केजा बाई
केजा बाई का सबसे छोटे बेटा अय्यूब उनके साथ रहता है

केजाबाई के सबसे छोटे बेटे अय्यूब पेशे से ड्राइवर हैं और अब 62 साल के हो गए हैं. वे चाहते हैं कि माँ अब आराम करे और पोते-पड़पोते के साथ कुछ दिन आराम से गुजार लें.

पर मामला सामाजिक प्रतिष्ठा का भी तो है.

क़ब्रिस्तान में रखवाली के कारण केजा बाई को हमेशा से समाज का एक बड़ा हिस्सा संशय की दृष्टि से देखता है. लोगों को यह भी शक़ है कि केजा बाई के पास कोई न कोई अलौकिक शक्ति है, तभी तो वो इतनी लंबी उम्र के बाद भी आसानी से सारा काम ख़ुद कर लेती हैं. इन सब कारणो से बाहरी समाज से केजा बाई का संपर्क नाम मात्र का है.

लेकिन केजा बाई को इन सब बातों की परवाह नहीं है. वे कहती हैं- “इन मुर्दों ने मुझे ज़िंदगी दी. जब मैं दाने-दाने को मोहताज थी, तब इन मुर्दों ने मुझे अपने बीच सर छुपाने की जगह दी. अब तो उम्र के बचे-खुचे दिन भी मैं इन मुर्दों के साथ ही गुज़ारना चाहती हूं. इस डरपोक दुनिया की मैं परवाह क्यों करुं?”

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