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सोमवार, 13 दिसंबर, 2004 को 12:46 GMT तक के समाचार
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क़ानून जानने वाले अनोखे कार्यकर्ता

क़ानून सीखते कार्यकर्ता
क़ानून जानने वाले ये कार्यकर्ता अदालत के बाहर लोगों की मदद करते हैं
क्या आपने कभी 'बेयरफुट' वकीलों के बारे में सुना है?

दक्षिण गुजरात के आदिवासी क्षेत्रों में काम करने वाले ये वो लोग हैं जो पूरी तरह से वकील तो नहीं हैं लेकिन ये क़ानून में दिलचस्पी ज़रुर रखते हैं और सामाजिक कार्य में रुचि रखते हैं.

पिछले बारह सालों से सूरत की एक ग़ैर सरकारी संस्था 'लीगल एड एंड ह्यूमन राइट्स सेंटर' पैरा लीगल कार्यकर्ता या बेयरफुट कार्यकर्ता तैयार कर रही है.

इस संस्था ने आज तक 300 कार्यकर्ता तैयार किए हैं जो आदिवासी समाज से ही आते हैं अपने समाज की मदद कर रहे हैं.

ख़ास बात यह है कि इनमें से लगभग आधी महिलाएँ हैं.

प्रशिक्षण

इन कार्यकर्ताओं के बारे में संस्था के निदेशक सन्नी भाई कहते हैं, "हमारा मानना है कि क़ानून सबके लिए है. एक वकील बनने के लिए एलएलबी करना पड़ता है जो बहुत खर्चीला होता है, लेकिन सामान्य झगड़े निपटाने और पुलिस के पास फ़रियाद लेकर जाने के लिए एलएलबी की ज़रुरत नहीं होती. कोई भी आदमी जो क़ानून की थोड़ी बहुत जानकारी रखता है वह यह कर सकता है."

उनका कहना है, "इसलिए जिसकी क़ानून में थोड़ी बहुत दिलचस्पी होती है और जो समाज की सेवा करना चाहता है उसे हम ट्रेनिंग देते हैं."

वे कहते हैं कि पहले तो कार्यकर्ताओं को आठ महीने की ट्रेनिंग दी जाती है, जिसमें उन्हें हर महीने के छह दिन प्रशिक्षण दिया जाता है. इसके बाद उन्हें तीन सप्ताह की फ़ील्ड ट्रेनिंग दी जाती है.

उनका कहना है कि इसके लिए कार्यकर्ता की शैक्षणिक योग्यता गौण होती है बेयरफुट लॉयर बनने की इच्छा प्रमुख होती है.

नारायण परमार एक ऐसे ही बेयरफुट लॉयर हैं. वे पहले होमगार्ड बनना चाहते थे.

वे बताते हैं कि भारतीय दंड संहिता और आपराधिक दंड संहिता के बारे में जानने के बाद वे गाँव के बड़े लोगों के साथ काम करने लगे. वे बताते हैं कि काम करते हुए उन्होंने पुलिस के भ्रष्टाचार पर काफ़ी हद तक रोक लगाई है.

नारायण बताते हैं कि ये कार्यकर्ता अदालतों के बाहर दो पक्षों में समझौता करवाने का काम भी करते हैं जिससे लोगों का समय और पैसा बच जाता है.

सबसे पहले बेयरफ़ुट लॉयर बनने वाले लोगों में से एक शंकुतला वाध्वी का कहना है, "मैंने क़ानून की शिक्षा लेने का फ़ैसला तब किया जब उन्होंने देखा कि महिलाओं को घर से निकलने ही नहीं दिया जाता और शिक्षा तक नहीं दी जाती."

ये पूछने पर कि पुलिस वाले और सरकारी विभाग बेयरफुट लॉयर के बारे में क्या सोचते हैं सन्नी भाई बताते हैं, "पहले तो पुलिस वाले और सरकारी अधिकारी कहते हैं कि ये कौन है हमको क़ॉनून सिखाने वाला लेकिन जब उन्हें पता चलता है कि ये क़ानून जानते हैं तो वे सहयोग करने लगते हैं. इससे कार्यकर्ताओं का आत्मविश्वास भी बढ़ता है."

दक्षिण गुजरात में ये कार्यकर्ता सामाजिक बदलाव के प्रतीक बन गए हैं.

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