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चाय बेचने वाला उपन्यासकार | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
दिल्ली के हिंदी भवन में जहाँ हिंदी भाषा और साहित्य को बढ़ावा देने के लिए तरह-तरह के मंसूबे बनाए जाते हैं उसी इमारत के सामने एक चायवाला पटरी पर बैठकर चाय बेचता है. तो इसमें क्या ख़ास बात है, चायवाले तो हर जगह होते हैं. लेकिन इस चायवाले में ख़ास बात है, अगर आप उनकी दुकान को ही ग़ौर से देखें तो फ़र्क़ नज़र आएगा, चाय के पतीले के अलावा वहाँ किताबों का छोटा सा स्टॉल भी है. लेकिन बात अभी पूरी नहीं हुई है, ये किताबें इस चायवाले ने ही लिखी हैं, अगर सही तरीक़े से कहें तो इन किताबों को लिखने वाला ही चाय बेच रहा है. मिलिए साहित्यकार लक्ष्मण राव से.
महाराष्ट्र के अमरावती ज़िले के एक छोटे से गाँव में जन्मे लक्ष्मण राव दसवीं पास करने के बाद ही नौकरी की तलाश में दिल्ली तक चले आए. लक्ष्मण राव ने मेहनत मज़दूरी करके, बर्तन धोकर अपनी पढ़ाई जारी रखी और लेखन भी शुरू कर दिया. लेखन की शुरूआत के बारे में लक्ष्मण राव कहते हैं, "मेरा दोस्त रामदास नदी में डूबकर मर गया जिसके बाद मैं जीवन के रहस्यों के बारे में सोचने पर विवश हुआ." इस घटना के बाद उन्होंने एक उपन्यास लिखा जिसका नाम रामदास है. 1984 में उनकी मुलाक़ात तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी से हुई, तो लक्ष्मण राव ने उन पर किताब लिखने की इच्छा प्रकट की. इंदिरा गाँधी ने कहा कि वे उनके कार्यकाल के बारे में लिख सकते हैं, इसके उन्होंने नाटक लिखा- प्रधानमंत्री. लक्ष्मण राव अब तक नौ उपन्यास, तीन नाटक और सामाजिक-राजनीतिक विश्लेषण की चार किताबें लिख चुके हैं. लेखक प्रकाशक विक्रेता अपनी ज़्यादातर किताबों के प्रकाशक लक्ष्मण राव ख़ुद ही हैं, और विक्रेता भी. वे अपनी चाय की दुकान के अलावा, स्कूलों और कॉलेजों में जाकर भी किताबें बेचते हैं. राव को उनके उपन्यास नर्मदा के लिए भारतीय अनुवाद परिषद का सम्मान भी मिल चुका है. वे कहते हैं, "आजकल प्रकाशक सिर्फ़ लाइब्रेरियों के लिए 200-300 प्रतियाँ छापते हैं जबकि मैंने रामदास की 2200 प्रतियाँ छापीं जिनमें से 1900 बिक चुकी हैं." उनकी दो और किताबें छपने के लिए तैयार हैं--'पत्तियों की सरसराहट' और 'रेनू'. इसके अलावा वे राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के लिए भी एक किताब लिख रहे हैं--पत्रकारिता के मानवीय आधार. |
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