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क़ब्रों के बीच चाय की दुकान
भीड़ भरी चाय की दुकान पर आप गर्मागर्म चुस्कियाँ ले रहे हों और आपको अचानक पता चले कि आपको दोनों तरफ़ों क़ब्रों की कतारें हैं तो कैसा लगेगा? ऐसी ही चाय की एक दुकान अहमदाबाद में है--लकी टी स्टॉल. यह शहर के सबसे मशहूर टी स्टॉलों में से एक है जहाँ तरह-तरह के लोग चाय पीने और मस्का-बन (मक्खन वाली डबल रोटी) खाने आते हैं. साबरमती नदी के किनारे मिर्ज़ापुर नाम के पुराने इलाक़े का यह टी स्टॉल शहर की पहचान बन चुका है. दुकान के अंदर मौजूद क़ब्रों को पूरी देखभाल की जाती है और इस्लामी तौर-तरीक़ों के मुताबिक़ ही सब कुछ होता है.
हर क़ब्र की एक चारदीवारी बना दी गई है ताकि उन पर कोई बैठे या पैर नहीं रखे. इस बारे में कम ही जानकारी है कि क़ब्रिस्तान के बीच टी स्टॉल की शुरूआत कैसे हुई, सांप्रदायिक दृष्टि से संवेदनशील अहमदाबाद शहर में कोई यह मुद्दा छेड़ना भी नहीं चाहता. इस बारे में कोई भी मुझसे बात करने को तैयार नहीं हुआ लेकिन टी स्टॉल के मैनेजर मलयाली ब्राह्मण कृष्णन कुट्टी नायर का कहना है कि इसकी शुरूआत पचास वर्ष पहले एक दक्षिण भारतीय मुसलमान ने की थी. लगभग तीस वर्षों से इस टी स्टॉल के मैनेजर नायर कहते हैं, "इसकी शुरूआत पान की छोटी सी दुकान के तौर पर हुई थी लेकिन जल्दी ही कारोबार बढ़ गया." नायर ने बताया, "कभी किसी कब्र को नहीं छेड़ा गया, सिर्फ़ उन्हें घेर दिया गया, यहाँ तक कि पेड़ भी नहीं काटे गए."
टी स्टॉल पर काम कर रहे अरविंद भाई कहते हैं, "हमारी चाय बेहतरीन है, जो एक बार हमारी चाय पी ले वो दोबारा ज़रूर आता है. लोग वर्षों से आते रहे हैं." डर भी अरविंद भाई भी स्वीकार करते हैं कि कुछ लोग यहाँ आने से डरते हैं. वे कहते हैं कि "एक बार यहाँ आने पर लोगों का डर निकल जाता है और वे बार-बार आने लगते हैं." ऐसे ही एक ग्राहक हैं रमेश भाई जो पिछले दस वर्षों से लकी टी स्टॉल के ग्राहक हैं और काफ़ी दूर नए अहमदाबाद से अक्सर चाय पीने पहुँचते हैं. रमेश भाई कहते हैं, "मुझे ये क़ब्रें बहुत हैरत में डालती हैं, मैंने अक्सर इनकी कहानी जाननी चाही लेकिन मेरी पूछने की हिम्मत कभी नहीं हुई." इस टी स्टॉल की सबसे ख़ास बात शायद ये है कि सांप्रदायिक दृष्टि से पूरी तरह विभाजित शहर में हर धर्म और तबक़े के लोग यहाँ चाय पीने आते हैं. कहा जा सकता है कि बँटे हुए शहर को जोड़ने का काम यह अनूठा चायख़ाना कर रहा है. |
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