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शनिवार, 18 अक्तूबर, 2008 को 10:08 GMT तक के समाचार
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बंदिश लगाने वाले अब खुद सीख रहे हैं हिंदी

प्रबाल नेओग
प्रबाल नेओग समस्या का हल बातचीत के आधार पर चाहते हैं
राजनीतिक नारेबाज़ी को छोड़ दें तो व्यावहारिक धरातल पर भारत में हिंदी की उपयोगिता से कोई भी इनकार नहीं कर सकता.

वे चरमपंथी, अलगाववादी भी नहीं, जो हिंदी विरोध को अपने राजनीतिक कार्यक्रम का हिस्सा मानते हैं. असम के अलगाववादी संगठन अल्फ़ा के बारे में भी यह बात सच है.

प्रबाल नेओग अल्फ़ा के वरिष्ठ नेताओं में से हैं. चरमपंथियों की एक पूरी बटालियन का 17 साल तक चालन प्रबाल ने किया है.

अल्फा पर असम में हिंदीभाषियों के कई क़त्लेआम अंज़ाम देने का आरोप है. लेकिन प्रबाल आज इस बात को स्वीकार करने में ज़रा भी नहीं हिचकते कि वे ज़ल्द से ज़ल्द अच्छी हिंदी सीख लेना चाहते हैं.

अहमियत

दरअसल, प्रबाल के हिंदी प्रेम के पीछे है हिंदी की उपयोगिता. उनका कहना है कि भारत सरकार के अधिकारियों और राजनीतिक नेतृत्व के साथ हिंदी के बिना बातचीत बहुत मुश्किल होती है.

 राष्ट्रीय मीडिया वाले अपनी सारी बातें हिंदी या अंग्रेज़ी में ही पूछते हैं. ऐसे में यदि उनके सवालों का जवाब असमिया में दिया जाए तो राज्य के बाहर वाले इनका मतलब नहीं समझ पाएँगे
प्रबाल

प्रबाल को पुलिस ने कुछ महीने पहले गिरफ़्तार किया था और इन दिनों वो नलबाड़ी स्थित सरकारी शिविर में रह रहे हैं.

प्रबाल अल्फ़ा के उस गुट का नेतृत्व कर रहे हैं जो अब समस्या का हल भारत सरकार के साथ बातचीत के द्वारा चाहता है. ये लोग चाहते हैं कि उनका शीर्ष नेतृत्व सरकार के साथ बातचीत के लिए बैठे.

हालाँकि अल्फ़ा के शीर्ष नेतृत्व में शामिल परेश बरुवा और अरविंद राजखोवा की ओर से अभी कोई सकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं मिली है.

बातचीत की प्रक्रिया शुरू करने के क्रम में प्रबाल तथा उसके साथियों का सेना तथा सुरक्षा बलों के अधिकारियों से साबका पड़ा.

प्रबाल बताते हैं कि अमूमन राज्य के बाहर से आने वाले इन अधिकारियों के साथ विचार-विमर्श के लिए दो ही विकल्प हैं - हिंदी या अंग्रेज़ी.

हिदायत

यही वजह है कि प्रबाल ने अपने साथियों को हिदायत दी है कि अभ्यास के लिए रोज़ाना आपस में हिंदी में बातचीत करे. आख़िर भाषा सीखने का ये अनुभवसिद्ध तरीका जो है.

फाइल फ़ोटो
असम में चरमपंथियों ने हिंदीभाषियों को कई बार निशाना बनाया है

प्रबाल का कहना है,"राष्ट्रीय मीडिया वाले अपनी सारी बातें हिंदी या अंग्रेज़ी में ही पूछते हैं. ऐसे में यदि उनके सवालों का जवाब असमिया में दिया जाए तो राज्य के बाहर वाले इनका मतलब नहीं समझ पाएँगे."

प्रबाल का कहना है कि वो हिंदी अच्छी तरह समझ तो लेते हैं लेकिन बोल पाने में थोड़ी दिक्कत होती है.

हिंदीभाषियों के क़त्लेआम के मुद्दे पर उन्होंने कहा कि सभी मुझ पर उंगली उठाते हैं लेकिन जो भी किया गया वह हाईकमान के निर्देश पर ही किया गया था और प्रत्यक्ष रूप से वो कभी किसी भी हत्याकांड से जुड़े नहीं रहे.

प्रबाल मानते हैं कि हत्या अल्फा की गोली से हो या सेना की गोली से, लेकिन जान किसी निर्दोष की ही जाती है.

अल्फ़ा के असमिया मुखपत्र स्वाधीनता तथा अंग्रेजी मुखपत्र फ्रीडम में अक्सर 'हिंदी विस्तारवाद' शब्दों का इस्तेमाल किया जाता रहा है.

इन दो शब्दों से उल्फा असम में हिंदी की बढ़ती उपयोगिता का विरोध करता रहा है. यहाँ तक कि एस समय उल्फा ने असम में हिंदी फ़िल्मों के प्रदर्शन पर भी बंदिश लगाई थी.

विरोध और जगह भी

असम के पड़ोसी राज्य मणिपुर के चरमपंथी भी हिंदी का ज़बर्दस्त विरोध करते रहे हैं.

असम में चरमपंथियों के हिंदी विरोधी फ़तवे भले ही कामयाब नहीं हो पाए हों, लेकिन लेकिन मणिपुर की राजधानी इंफाल में आपको आज भी सिनेमाघरों में हिंदी फ़िल्म देखने को नहीं मिलेगी. केबल आपरेटर भी चरमपंथियों के डर से हिंदी चैनलों से परहेज करते हैं.

अलबत्ता नगालैंड में अलगाववादी संगठनों द्वारा हिंदी का विरोध किए जाने की बात सामने नहीं आई है.

एनएससीएन (आईएम गुट) के चरमपंथी सरकार के साथ बातचीत के दौरान इस बात की दुहाई भी दे चुके हैं कि उन्होंने कभी भी भारत की राष्ट्रभाषा का विरोध नहीं किया.

पूर्वोत्तर के नगालैंड, मणिपुर और मिज़ोरम में संपर्क भाषा के रूप में हालांकि अंग्रेजी का ख़ासा इस्तेमाल होता है, लेकिन अरुणाचल प्रदेश में हिंदी को ही संपर्क भाषा का स्थान प्राप्त है.

पूर्वोत्तर भारत के पहाड़ी प्रदेशों में बोलचाल की हिंदी का अपना ही अलग रूप है जो कई बार दिलचस्प अंदाज़ में सामने आता है. मसलन, बस यात्रा करते समय अचानक आपके कानों में ये शब्द पड़ सकते हैं 'गाड़ी रोको हम यहाँ गिरेगा.'

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