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शनिवार, 20 जनवरी, 2007 को 15:58 GMT तक के समाचार
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असम में हिंसा के लिए कौन हैं ज़िम्मेदार?

अल्फ़ा का हमला
अल्फ़ा ने पिछले दिनों असम में 70 हिंदी भाषियों की हत्या कर दी थी
असम में अलगाववादी संगठन उल्फ़ा ने पिछले दिनों 70 हिंदी भाषी लोगों को मार डाला था. लेकिन यह पहली बार नहीं है जब असम में उल्फ़ा ने हत्याओं का दौर शुरू किया है.

वर्ष 2003 में भी उल्फ़ा ने बिहार में एक ट्रेन में एक असमी महिला के साथ दुर्व्यवहार का बहाना बनाकर असम में कई बिहारी मजदूरों को मार दिया था.

अभी ताज़ा हत्याओं का शोर थमा भी नहीं था कि उल्फ़ा ने न सिर्फ़ गणतंत्र दिवस समारोह समाप्त करने की घोषणा कर डाली बल्कि यह भी ऐलान कर दिया कि सभी हिंदी भाषी असम छोड़ दें.

दूसरी तरफ़ केंद्र सरकार ने भी उल्फ़ा से निपटने के लिए कुछ कड़े क़दमों की घोषणा की.

लेकिन सवाल भी उठने शुरू हो गए हैं कि असम में उल्फ़ा की हिंसा की वज़ह क्या है और इस बारे में सरकारों की नीतियाँ ढुलमुल क्यों रही हैं.

पूर्वोत्तर मामलों के जानकार और वरिष्ठ पत्रकार राम बहादुर राय मानते हैं, "ये विरोध असल में बहाना है अपनी उपस्थिति और ताकत दिखाने का. इसका इतिहास असम के मुख्यमंत्री तरुण गगोई और उल्फ़ा के आपसी संबंधों में है."

वो कहते हैं कि पिछले चुनाव तरुण गगोई उल्फ़ा की मदद से लड़े थे और उन्होंने इसके लिए कुछ वादे किए होंगे जिसे पूरा नहीं किया बल्कि साँप-सीढ़ी का खेल खेल रहे हैं.

राम बहादुर राय बताते हैं, "चुनाव के समय में दोनों ओर से हुई बातचीत के आधार पर उल्फ़ा ने नवंबर 2006 में संघर्ष विराम की घोषणा कर दी थी लेकिन ख़ुफ़िया ब्यूरो, रॉ और सेना ने केंद्र सरकार को रिपोर्ट दी कि उल्फ़ा की ताकत बढ़ रही है और लूट-खसोट हो रही है इसलिए उल्फ़ा के ख़िलाफ़ अभियान चलाया जाना चाहिए."

वो कहते हैं, "ग़ौर करने वाली बात यह है कि केंद्र सरकार का उल्फ़ा के बारे में रुख कुछ और है और असम सरकार का कुछ और. हालांकि दोनों जगहों पर काँग्रेस की ही सरकार है. यह ही समस्या की जड़ भी है."

'संदेश देने की कोशिश'

सेंटर फॉर नॉर्थ ईस्ट स्टडीज एंड पॉलिसी रिसर्च के मैनेजिंग ट्रस्टी संजॉय हज़ारिका इसे उल्फ़ा पर हुए हमलों से जोड़ कर देखते हैं.

वो कहते हैं, "मेरे ख़याल से उल्फ़ा यह संदेश देना चाहता है कि अगर हमारे ऊपर हमला हुआ तो हम कमज़ोरों और निर्दोषों को अपना शिकार बनाएंगे. वे सैन्य कार्रवाई से बचना चाहते हैं."

सवाल उठता है कि उल्फ़ा अस्तित्व में आया कैसे? कैसे 80 के दशक में राज्य की कुछ राजनीतिक शक्तियों की ओर से बढ़ावा दिए जाने के बाद पूर्वोत्तर इलाक़े का एक बड़ा पृथक्तावादी संगठन बन गया?

ख़ुफ़िया ब्यूरो के संयुक्त निदेशक रह चुके और उल्फ़ा के उदय पर शुरू से नज़र रखने वाले मलय कृष्ण धर कहते हैं, "जब 80 के दशक में असम आंदोलन चल रहा था तब से परेश बरुआ हितेश्वर सैकिया के क़रीबी थे. बाद में आसू और एजीपी के आगे आने के बाद उल्फ़ा थोड़ा पीछे चला गया और अपनी ताकत संगठित करने लगा. आसू और एजीपी के विफल होने के बाद उल्फ़ा फिर आगे आ गया."

उल्फ़ा का मानना है कि भारत सरकार ने हमेशा असम के साथ उपनिवेश जैसा बर्ताव किया है. प्रशासनिक और आर्थिक सुधारों मात्र से वे संतुष्ट नहीं होंगे. उन्हें भारत से पूरी आज़ादी चाहिए.

 मैंने कई स्तरों पर वहाँ काम किया है लेकिन मुझे नहीं लगता कि भारत सरकार की कोई स्थिर नीति नहीं है. कभी सरकार नरम नीति अपनाती है तो कभी गरम. ऐसी समस्याओं के लिए एक लंबी और स्थिर नीति होनी चाहिए.
वेद मारवाह, मणिपुर के पूर्व राज्यपाल

बीबीसी ने उल्फ़ा के नेता परेश बरुआ से पूछा कि क्या वो अपनी प्रभुसत्ता की अपनी माँग से किसी भी हालत में पीछे नहीं हटेंगे तो उनका कहना था, "मैं दृढ़तापूर्वक कहना चाहता हूँ कि उल्फ़ा असमवासियों की आज़ादी की आकाँक्षा से कभी समझौता नहीं करेगा. भारत के साथ किसी समाधान में लोगों की यह आकाँक्षा शामिल होगी."

अब सवाल यह उठता है कि क्या उल्फ़ा की इस माँग को असम के जनमानस का समर्थन प्राप्त है? संजॉय हज़ारिका ऐसा नहीं मानते.

वो कहते हैं, " असम के लोग उल्फ़ा की इस माँग को स्वीकार नहीं करेंगे और समर्थन भी नहीं देंगे. लोग चाहते हैं कि सरकार कुछ काम करे. राज्य में ढाँचागत और संचार क्षेत्र का विकास हो."

केंद्र सरकार उल्फ़ा से निपटने के लिए विकास और सेना की तैनाती की नीति पर चलती आई है.

लचर नीति

सरकार की पूर्वोत्तर नीति में क्या ख़ामियाँ हैं? अपने ज़माने के मशहूर पुलिस अधिकारी और बाद में मणिपुर और झारखंड के राज्यपाल बने वेद मारवाह तो इस बात से ही इनकार करते हैं कि सरकार की कोई पूर्वोत्तर नीति भी है.

वे कहते हैं, "मैंने कई स्तरों पर वहाँ काम किया है लेकिन मुझे नहीं लगता कि भारत सरकार की कोई स्थिर नीति नहीं है. कभी सरकार नरम नीति अपनाती है तो कभी गरम. ऐसी समस्याओं के लिए एक लंबी और स्थिर नीति होनी चाहिए."

यूँ तो पूर्वोत्तर राज्यों के लिए पूर्वोत्तर परिषद भी बनाई गई और केंद्र ने वहाँ औद्योगीकरण के लिए करोड़ों रुपए खर्च किए लेकिन तब भी आम आदमी अपने को भारत से अलग-थलग मानता रहा.

अल्फ़ा के विरोध में जुलूस
उल्फ़ा को असम में जनमानस का समर्थन नहीं है

ख़ुफ़िया ब्यूरो के पूर्व संयुक्त निदेशक मलय कृष्ण धर इस पूरे मामले को कुछ इस तरह से देखते हैं, "पूर्वोत्तर हमारे नक्शे में तो है लेकिन दिमाग में नहीं. किसी भी आम भारतीय को इससे मतलब नहीं होता कि वहाँ क्या हो रहा है. वे भी हमें आज तक बाहर वाले ही मानते हैं."

क्या उल्फ़ा से सिर्फ़ सैनिक तरीके से निपटा जा सकता है? सिर्फ़ कुछ टुकड़ियों की तैनाती भर से उल्फ़ा को राज्य में अलग-थलग किया जा सकता है?

मणिपुर के पूर्व राज्यपाल वेद मारवाह ऐसा नहीं मानते. वो कहते हैं, "सैन्य कार्रवाई एक मुश्किल प्रक्रिया है. यह दुखद है कि हमारी सरकारें इस तरह के वक्तव्य देती रहती हैं. इसका असर भी बुरा ही पड़ता है. आखिर क़ानून तोड़ने वालों पर कार्रवाई करने के लिए बयान देने की ज़रूरत ही क्या है."

भारत का आंतरिक संघर्षों से निपटने का रिकॉर्ड बहुत संतोषजनक नहीं रहा है. यहाँ इस तरह के संघर्ष का 10 साल से अधिक खींचना आम बात रही है.

असम हिंसा का भी तीन दशक पुराना इतिहास रहा है और पड़ोस में नगा लड़ाई तो 50 बरसों से भी ज़्यादा समय से चल रही है.

शायद इससे निपटने में कमी रही है एक मज़बूत राजनीतिक इच्छाशक्ति की. पूरे मामले को कुछ उस तरह देखा गया है कि मरीज़ बीमार हो गया तो ग्लूकोज चढ़ा दिया गया लेकिन ज़रूरी दवा देने की ज़रूरत नहीं समझी गई.

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