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'किसी भी स्थिति में हिंसा बर्दाश्त नहीं' | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने मंगलवार को अपनी असम यात्रा के दौरान पत्रकारों को संबोधित करते हुए कहा कि पूर्वोत्तर में हिंसा को किसी भी स्थिति में बर्दाश्त नहीं किया जाएगा. प्रधानमंत्री डिब्रूगढ़ ज़िले में पत्रकारों को संबोधित कर रहे थे. उन्होंने कहा कि राज्य में उल्फ़ा के प्रति लोगों के मन में एक नकारात्मक धारणा है और लोग हिंसा की जगह शांति और विकास चाहते हैं. उन्होंने इस मौके पर पिछले दिनों हिंसा में मारे गए लोगों के परिवारों को दो-दो लाख रूपए की आर्थिक सहायता देने की भी घोषणा की. प्रधानमंत्री ने स्वीकारा की नागरिकों की सुरक्षा सरकार का पहला कर्तव्य है और इसलिए शांति बहाली की दिशा में जो भी समूह आगे आ रहे हैं, उनका स्वागत किया जाएगा. उन्होंने यह भी बताया कि पूर्वोत्तर में चरमपंथ की समस्या को लेकर भारत सरकार ने बर्मा की सरकार से भी बातचीत की है. प्रधानमंत्री ने बताया, "बर्मा की सरकार की ओर से आश्वासन दिया गया है कि वो भारत सरकार की निशानदेही पर बर्मा में शरण लेकर रह रहे विद्रोहियों के ठिकानों को ख़त्म करने में मदद करेगी." दौरा मनमोहन सिंह फिलीपींस में दक्षिण पूर्वी एशियाई देशों के संगठन यानी आसियान की बैठक में हिस्सा लेने के बाद सोमवार को सीधे कोलकाता पहुँचे. प्रधानमंत्री ने स्पष्ट किया है कि हिंसा छोड़नेवाले किसी भी संगठन से बातचीत के रास्ते खुले हुए हैं. उनका कहना था कि यह काफ़ी दुखद है कि हाल में हुई हिंसा में इतने नागरिकों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा था. प्रधानमंत्री हिंदीभाषियों के ख़िलाफ़ हिंसा से प्रभावित असम के तिनसुकिया और डिब्रूगढ़ इलाक़ों का दौरा करेंगे. ग़ौरतलब है कि पिछले दिनों की हिंसा में 70 लोगों को मार दिया गया था जिसमें अधिकतर हिंदीभाषी थे जो वहाँ मजदूरी करते थे. अधिकारियों ने इस हिंसा के लिए यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट ऑफ़ असम यानी अल्फ़ा के विद्रोहियों को ज़िम्मेदार ठहराया है. सैन्य अभियान पत्रकार सलमान रावी के अनुसार असम में सुरक्षाबलों ने अल्फ़ा विद्रोहियों के ख़िलाफ़ एक बड़ा अभियान शुरू किया है जिसमें हज़ारों सैनिक भाग ले रहे हैं.
सैन्य अधिकारियों का कहना है कि लगभग 20 हज़ार सैनिक और सुरक्षा बलों के जवाब इस अभियान में हिस्सा ले रहे हैं और इस अभियान के तहत अनेक जंगलों और पहाड़ी इलाक़ों में कार्रवाई की जा रही है जिनमें अरुणाचल प्रदेश से लगने वाला इलाक़ा भी शामिल है. असम में इस हिंसा को लगभग एक दशक में सबसे भीषण कहा जा रहा है और इसमें जो लोग अल्फ़ा विद्रोहियों का निशाना बने उनमें से ज़्यादातर ईंट के भट्टों में काम करते थे. इस हिंसा के बाद असम में रहने वाले हज़ारों हिंदी भाषी वहाँ से भाग रहे हैं. असम में रहने वाले हिंदी भाषी लोगों के शिविरों का केंद्रीय गृह राज्य मंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल और रेल मंत्री लालू प्रसाद यादव ने भी दौरा किया था. दोनों नेताओं ने लोगों को विद्रोहियों के ख़िलाफ़ सख़्त कार्रवाई करने का भरोसा दिलाया था. असम के पुलिस अधिकारियों का कहना है कि अल्फ़ा विद्रोही 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस के मौक़े पर हिंसा में तेज़ी ला सकते हैं. इसके अलावा फ़रवरी में असम में राष्ट्रीय खेलों का भी आयोजन किया जाना है. | इससे जुड़ी ख़बरें 'अल्फ़ा हिंसा छोड़े तो बातचीत संभव'12 जनवरी, 2007 | भारत और पड़ोस अल्फ़ा के ख़िलाफ़ बर्मा से सहयोग10 जनवरी, 2007 | भारत और पड़ोस अल्फा के ख़िलाफ़ सैनिक अभियान09 जनवरी, 2007 | भारत और पड़ोस असम में सैनिक छावनी के पास धमाका08 जनवरी, 2007 | भारत और पड़ोस असम में हिंसा जारी, तनाव का माहौल07 जनवरी, 2007 | भारत और पड़ोस असम में हिंसा, 48 लोग मारे गए06 जनवरी, 2007 | भारत और पड़ोस असम शांति वार्ता शुरु करने की कोशिश13 नवंबर, 2006 | भारत और पड़ोस असम में संघर्षविराम ख़त्म, कार्रवाई शुरु24 सितंबर, 2006 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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