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रैली के मद्देनज़र कड़े बंदोबस्त, कर्फ़्यू जारी | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारत प्रशासित कश्मीर में अलगाववादियों ने राज्य की स्वतंत्रता और स्वायत्तता की माँग को लेकर सोमवार को श्रीनगर के लाल चौक तक एक मार्च का आयोजन किया है. इसके मद्देनज़र प्रशासन ने सुरक्षा और नाकेबंदी के कड़े बंदोबस्त किए हैं. कश्मीर घाटी के कई इलाकों में रविवार से ही अनिश्चितकालीन कर्फ़्यू जारी है. दूसरी ओर अलगाववादियों ने लोगों से अपील की है कि स्वतंत्रता की माँग के समर्थन में लोग सोमवार को राजधानी श्रीनगर के लाल चौक की ओर मार्च करें. प्रशासन ने अलगाववादी गुटों के कई नेताओं को भी अपनी हिरासत में ले लिया है या नज़रबंद कर दिया है ताकि कर्फ़्यू तोड़ने और रैली करने की कोशिशें नाकाम रहें. प्रशासन रैली को रोकने में लग गया है. इसी के मद्देनज़र रविवार तड़के से ही पूरी घाटी में अनिश्चतकालीन कर्फ़्यू लागू कर दिया गया है. हालांकि छह अक्टूबर को प्रस्तावित इस रैली के लिए पहले 25 अगस्त की तारीख़ तय की गई थी पर प्रशासन ने इसे रोकने के लिए नौ दिनों तक घाटी में कर्फ़्यू लगाए रखा जिसकी वजह से रैली आयोजित नहीं हो सकी. इससे पहले अगस्त में घाटी में इसी माँग को लेकर चार बड़ी रैलियाँ हो चुकी हैं जिनमें लाखों लोग शामिल हुए थे. कड़े बंदोबस्त सोमवार की रैली के मद्देनज़र प्रशासन ने श्रीनगर के लाल चौक इलाक़े को पूरी तरह से सील कर दिया.
इस रैली को रोकने के लिए पुलिस ने अलगाववादी नेता यासीन मलिक को हिरासत में ले लिया है. यासीन मलिक इस रैली की आयोजन समिति के अध्यक्ष हैं. एक अन्य अलगाववादी नेता सैयद अली शाह गीलानी नज़रबंद थे, रविवार को उन्हें पेट में तकलीफ़ की शिकायत के बाद अस्पताल में भर्ती कराया दिया गया था. अभी हाल में भारत सरकार को कश्मीर में प्रदर्शनों से निपटने के तरीकों को लेकर एमनेस्टी और अन्य मानवाधिकार संगठनों की कड़ी आलोचना का सामना करना पड़ा था. ऐसे में सरकार जहाँ एक ओर रैली के आयोजन को पूरी तरह से नाकाम करना चाहती है वहीं प्रशासन की यह भी कोशिश है कि किसी भी तरह से कर्फ़्यू कमज़ोर न पड़े ताकि हिंसा की घटनाओं को टाला जा सके. जानकारों का मानना है कि राज्य में पिछले कुछ महीनों से स्वायत्तता और स्वतंत्रता की माँग ने जिस तरह से ज़ोर पकड़ा है, उससे आंदोलन को एकदम रोक पाना आसान काम नहीं रह गया है. पिछले कुछ सप्ताहों के दौरान यह भी देखने को मिला है कि स्वायत्तता की माँग में कश्मीर का आम आदमी अलगाववादी नेताओं को पीछे छोड़कर ख़ुद आगे बढ़ा है और अहिंसक प्रदर्शनों के ज़रिए अपनी बात लोग रख रहे हैं. ऐसे में सरकार के लिए आंदोलन का ताज़ा स्वरूप ख़ासा चुनौतीपूर्ण हो गया है. |
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