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परमाणु हमले के बाद ऐसा होता संदेश | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
"इस देश पर परमाणु बम हमला हो चुका है. संचार माध्यम बुरी तरह से प्रभावित हैं, मरने वालों की संख्या और नुकसान के बारे में अभी तक पता नही चल सका है." "घर से बाहर निकलना ख़ुद को और ख़तरों में डालना हो सकता है. अगर आप बाहर निकलते हैं तो हो सकता है कि तो आपको खाना-पानी, चिकित्सा और संचार की सुविधा न मिल पाए." दरअसल, ये उस स्क्रिप्ट का हिस्सा है जो 1970 के दशक में बीबीसी और ब्रितानी सरकार ने तैयार किया था ताकि परमाणु बम हमलो के तुरंत बाद इसे प्रसारित किया जा सके. स्क्रिप्ट में ये भी निर्देश दिए गए हैं कि शांति बनाए रखें और अपने घरों में ही रहें. भरोसा स्क्रिप्ट के साथ जारी किए गए दूसरे काग़ज़ात बताते हैं कि इस बात पर भी जमकर बहस हुई थी कि इस संदेश को किस तरह प्रसारित किया जाए ताकि श्रोता इस पर पूरा भरोसा कर सकें. ये स्क्रिप्ट ब्रिटेन के नेशनल आर्काइव ने जारी किया है. इस स्क्रिप्ट के साथ सरकार और बीबीसी के बीच हुए संवाद को भी जारी किया गया है. जून 1974 में ब्रितानी डाक और संचार मंत्रालय से हेरल्ड ग्रीनवुड के एक पत्र में इस बात पर चर्चा की गई है कि किस समाचार वाचक को ये ऐलान पढ़ना चाहिए जिसकी आवाज़ पर विश्वास किया जा सके. ग्रीनवुड लिखते हैं ''दूसरे विश्व युद्ध के दौरान हम लोगों के लिए स्टुआर्ट हेब्बर्ड, ऑलिवर लिडेल और दूसरे मुख्य सामाचार वाचकों की आवाज़ें परिचित थीं.'' "हम ये आशा करते हैं कि संकट के समय जब युद्ध के बादल मंडरा रहे हो तो बीबीसी को इस तरह की आवाज़ों को विकसित करना चाहिए." ग्रीनवुड का कहना था कि पहले से रिकॉर्ड किए गए ऐलान को अगर अपरिचित आवाज़ में सुनवाया जाता है तो श्रोता उस पर विश्वास नहीं करेंगे. शक ग्रीनवुड का कहना था, " स्पष्ट है कि अगर अपरिचित आवाज़ के ज़रिए एक ही ऐलान को बार बार 12 घंटों तक दोहराया जाता है तो हो सकता है कि श्रोता इस बात पर शक करना शुरू करने लगें कि एक ही मशीन को हर एक घंटे के बाद स्विच ऑन कर दिया जाता है. .... और शायद बीबीसी इससे सहमत हो." मंत्रिमंडल का कहना था, "स्थानीय लाइव ऐलान श्रोताओं को ज़्यादा विश्वास दिला सकेगा." युद्धभूमि में मौजूद लोगों से कहा जाना था कि वे तब तक इंतज़ार करें जब तक सायरन बजाकर उन्हें नहीं बताया जाता है. परमाणु बम हमले के समय स्टाफ़ से कहा जाना था कि वे 14 दिनों के लिए छिपे रहें, जब उन्हें लगे कि वे सुरक्षित हैं तो बाहर निकलें. | इससे जुड़ी ख़बरें हिरोशिमा एटम बम हमले की 60 वीं बर्सी05 अगस्त, 2005 | पहला पन्ना कोई अफ़सोस नहीं बम गिरानेवालों को05 अगस्त, 2005 | पहला पन्ना परमाणु शक्ति के विकास का दौर05 अगस्त, 2005 | पहला पन्ना हिरोशिमा ने याद किया उस दिन को06 अगस्त, 2005 | पहला पन्ना वीडियोः हिरोशिमा में श्रद्धांजलि06 अगस्त, 2005 | पहला पन्ना नागासाकी परमाणु त्रासदी की 60वीं बरसी09 अगस्त, 2005 | पहला पन्ना बम गिराने वाले पायलट का निधन02 नवंबर, 2007 | पहला पन्ना बीबीसी वर्ल्ड सर्विस के 75 साल पूरे19 दिसंबर, 2007 | पहला पन्ना | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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