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नागासाकी परमाणु त्रासदी की 60वीं बरसी | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
जापान के शहर नागासाकी में परमाणु त्रासदी की 60वीं बरसी मंगलवार को मनाई गई. नौ अगस्त 1945 की सुबह 11 बजकर दो मिनट पर नागासाकी के ऊपर से अमरीकी बमवर्षक विमान बी-29 गुज़रा और फ़ैट मैन नाम के बम के ज़रिए शहर को दे गया मौत की एक लंबी दास्तान. हमले को याद करते हुए आज नागासाकी शहर में समारोह हुए. शहर के शांति पार्क में हुए आयोजन में प्रधानमंत्री जुनिचिरो कोइज़ुमी समेत इस अवसर पर प्रधानमंत्री ने कहा कि ये मौक़ा सब पीड़ितों को याद करने और विश्व शांति के लिए प्रार्थना करने का है. वहीं नागासाकी के मेयर ने कहा कि अमरीकी नागरिकों को सोचना चाहिए कि क्या परमाणु हथियार रखने से उनका देश ज़्यादा सुरक्षित है. शहर के कथीड्रल में भी ख़ास आयोजन किया गया. कार्यक्रम में कुछ ऐसे लोग भी शामिल थे जो 60 साल पहले इस त्रासदी का शिकार हुए थे. दूसरा बम नागासाकी पर जो बम गिराया गया था उसमें प्लूटोनियम का इस्तेमाल हुआ था जबकि हिरोशिमा पर जो बम गिरा था उसमें यूरेनियम का इस्तेमाल किया गया था. शायद यही वजह थी कि नागासाकी में मरने वाले लोगों की संख्या लगभग 70 हज़ार थी जो हिरोशिमा के मुक़ाबले काफ़ी कम थी. अमरीका ने दूसरा परमाणु बम क्यों गिराया इसे लेकर भी काफ़ी बहस होती रही है. आम तौर पर कहा जाता है कि हिरोशिमा पर बम गिराए जाने के बाद भी जापान ने आत्मसमर्पण नहीं किया था और उससे बिना शर्त समर्पण करवाने के लिए दूसरा बम गिराना ज़रूरी था. मगर 1960 के दशक से ही कुछ इतिहासकारों और अब नागासाकी के मेयर का कहना है कि प्लूटोनियम से बने परमाणु बम के परीक्षण और उस पर हुए ख़र्च को सही ठहराने के लिए दूसरा बम गिराया गया. कुछ इतिहासकारों का तो ये भी कहना है कि नागासाकी पर बम हमला एक तरह से सोवियत संघ को चेतावनी देने की कोशिश थी, क्योंकि सोवियत संघ लगभग उसी समय सुदूर पूर्व में इस युद्ध में शामिल हो रहा था. माना जाता है कि तत्कालीन अमरीकी राष्ट्रपति ट्रूमैन सोवियत संघ को चेतावनी देना चाहते थे कि वे इस मामले से दूर ही रहें और नागासाकी के ज़रिए सोवियत संघ को ये दिखाने की कोशिश की गई कि अमरीका के पास सिर्फ़ एक ही परमाणु बम नहीं था बल्कि उसके पास इसका भंडार है. वर्षों के बीतने के बाद भी ये विवाद नहीं रुका है और नागासाकी पर बम क्यों गिराया गया या उसे गिराना क्या कभी भी न्यायोचित ठहराया जा सकेगा, ये बहस शायद इसी तरह चलती रहेगी. |
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