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शुक्रवार, 19 सितंबर, 2008 को 04:37 GMT तक के समाचार
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सीमा के सवाल पर भारत-चीन वार्ता
मनमोहन सिंह चीन में
दोनों देशों के बीच रिश्तों की बर्फ़ पिघल नहीं रही है
भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार एमके नारायणन अपनी दो दिवसीय चीन यात्रा पर चीन की राजधानी बीजिंग पहँचे हुए हैं.

शुक्रवार को नारायणन बातचीत के दूसरे और अंतिम दिन अपने समकक्ष चीनी अधिकारी से मिल रहे हैं. इस दौरान दोनों देशों के बीच सीमा निर्धारण और इसे लेकर उठते रहे विवादों पर बातचीत करेंगे.

एक वर्ष बाद दोनों देश अपने अपने सीमा क्षेत्रों के मुद्दे पर बातचीत के लिए एक बार फिर आमने-सामने हैं.

बातचीत अब उसी बिंदु से आगे चल रही है जहाँ पिछले वर्ष छूटी थी पर जानकार मानते हैं कि पिछले एक वर्ष के दौरान दोनों ओर हुई गतिविधियों का असर भी इस बातचीत पर पड़ेगा.

इस वक्त भारत अमरीका के साथ परमाणु क़रार की लगभग सारी कड़ियाँ पार कर चुका है और इस मुद्दे पर अमरीकी सीनेट में मतदान की औपचारिकता ही शेष है.

इस समझौते पर चीन का अपना अलग रुख रहा है. न्यूक्लियर सप्लायर्स ग्रुप की बैठक के दौरान भी चीन क़रार का परोक्ष रूप से विरोध ही करता नज़र आया था. चीन इस बात का भी विरोध कर रहा था कि भारत को किसी भी एनएसजी सदस्य देश से ईधन लेने की छूट मिले.

उस वक्त भारत सरकार और यहाँ तक कि भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार एमके नारायणन ने भी चीन के रुख़ की कड़े शब्दों में निंदा की थी.

अब भारत की ओर से वही नारायणन चीन की यात्रा पर हैं और एक अलग मुद्दे यानी सीमा विवाद पर बातचीत कर रहे हैं.

संबंधों के नए सवाल

पर पिछले दिनों दोनों ओर से होती रही बयानबाज़ियों से यह बातचीत अप्रभावित रहेगी, विश्लेषक ऐसा सोचने को सही नहीं मानते हैं.

एक और मुद्दा इस दौरान सिर उठाता दिख रहा है. ऐसी बात सामने आ रही है कि पाकिस्तान भारत-अमरीका परमाणु क़रार की तर्ज पर ही चीन से समझौते की कोशिश कर रहा है.

भारत- चीन के झंडे
ताज़ा बातचीत में पिछले दिनों की बयानबाज़ियों का असर दिख सकता है

ऐसे में यह एक अहम सवाल भारत की ओर से उठाया जा सकता है कि पाकिस्तान और चीन के बीच इस तरह के समझौते की बात कितनी सही है और चीन इसे किस तरह से देख रहा है.

दोनों देशों के संबंधों पर नज़र रख रहे जानकार मानते हैं कि अगर चीन ऐसे समझौते की दिशा में आगे बढ़ने की बात स्वीकारता है तो बातचीत पर उसका असर दिखाई देगा.

दोनों पक्षों के बीच तीन साल पहले राजनीतिक स्तर पर एक खाका तैयार हो चुका है पर अभी तक उसे लागू किया जाना बाकी है.

यह खाका कहता है कि सीमाओं को सुलझाने में ऐसी ज़मीन की लेन-देन नहीं होगी जिसमें लोग बसे हुए हैं. यानी सिक्किम इस विवाद की परिधि से बाहर हो जाना चाहिए पर चीन सिक्किम के कुछ हिस्से पर दावेदारी कर रहा है.

ऐसे में लोगों के बीच यही एक सवाल सबसे मुखर रहता है कि दोनों देशों के बीच परस्पर नक्शों की अदली-बदली की स्थिति बन पाई है या नहीं. अगर नहीं तो ऐसा कबतक शुरू हो सकेगा.

विषेशज्ञों की मानें तो ऐसा इसलिए ज़रूरी है क्योंकि दोनों पक्षों के बीच सीमा विवाद का समाधान इसी रास्ते होकर जाता है.

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