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गुरुवार, 04 सितंबर, 2008 को 11:42 GMT तक के समाचार
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बहुदलीय व्यवस्था का कठिन गणित

प्रचंड
पूर्व छापामारों को सेना में शामिल करने का सवाल बाक़ी है
नेपाल में सरकार बना चुके माओवादी अब बहुदलीय जनतंत्र और कूटनीति के गणित का कठिन सबक़ सीख रहे हैं.

इस प्रक्रिया में माओवादी पार्टी जितनी विकट समस्याओं से दो चार हो रही है उतनी समस्याएँ शायद दस साल तक चली हथियारबंद लड़ाई के दौरान भी उसके सामने नहीं आई होंगी.

माओवादियों की सरकार बनने के बाद पार्टी के भीतर नेतृत्व की नई खींचतान शुरू हो चुकी है. ये होड़ इतनी बढ़ चुकी है कि पार्टी से सहानुभूति रखने वाले लोग पार्टी की एकजुटता को लेकर चिंतित हैं.

पार्टी के तीन बड़े नेताओं – प्रचंड, बाबूराम भट्टाराई और रामबहादुर थापा 'बादल' – के सरकार में आने के बाद शीर्ष नेतृत्व के बचे हुए लोग चाहते हैं कि पार्टी संगठन की ज़िम्मेदारी उन्हें सौंप दी जाए. इस दावेदारी में पार्टी के महामंत्री रह चुके मोहन वैद्य 'किरन' का नाम सबसे ऊपर है.

पत्रकारिता की भाषा में कहा जाए तो कई लोग किरन को हार्डलाइनर या कट्टर मानते हैं. युद्धविराम के बाद छावनियों में रह रहे लगभग बीस हज़ार माओवादी छापामारों पर उनका काफ़ी असर भी माना जाता है.

पार्टी में असंतोष

किरन और उनका समर्थन करने वाले कार्यकर्ता इस बात से बहुत ख़ुश नहीं है कि माओवादी पार्टी 'जनयुद्ध' को भुलाकर संसदीय राजनीति के चक्र में फँस गई है.

 प्रधानमंत्री बनने के बाद मैं अब पहले जैसी भाषा इस्तेमाल नहीं कर सकता
प्रचंड

माओवादी पार्टी में कुछ लोगों के लिए यही चिंता का विषय है लेकिन प्रचंड इस संकट से चिंतित नज़र नहीं आते.

प्रधानमंत्री पद सँभालने के कुछ दिन बाद उन्होंने अपने एक राजनीतिक मित्र को भरोसा दिलाया, “पार्टी का गंभीरतम संकट तो 2005 में ही गुज़र गया जब पार्टी टूट के कगार पर पहुँच गई थी.”

लेकिन पार्टी नेतृत्व इस बात को लेकर सचेत है कि किरन का असंतोष उन छापामारों को किसी हद तक प्रभावित कर सकता है जो बंदूक़ के सहारे व्यवस्था परिवर्तन करने का सपना देखकर 'जनयुद्ध' में शामिल हुए थे.

पार्टी के भीतर 2005 में आए जिस संकट का ज़िक्र प्रचंड ने किया उसमें पार्टी में दूसरे नंबर के नेता बाबूराम भट्टाराई लगभग अलगाव में पड़ गए थे और कहा जा रहा था कि हथियारबंद लड़ाई के चरम पर माओवादी पार्टी अब टूटी, तब टूटी.

जनतंत्र के सबक़

उस संकट को टालने में प्रचंड सफल रहे और उनके आशावाद का यही आधार है कि नेतृत्व की मौजूदा खींचतान को भी सुलझा लिया जाएगा.

पर पार्टी के भीतरी संकट को ही नहीं प्रचंड को अब बहुदलीय जनतंत्र में गठबंधन की राजनीति के पेंचों को भी समझना पड़ रहा है.

आम चुनाव में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरने के बावजूद जब चार महीने तक भी वो सरकार नहीं बना पाए तब उन्होंने बहुदलीय व्यवस्था का असली सबक़ सीखा.

 पार्टी का गंभीरतम संकट तो 2005 में ही गुज़र गया जब पार्टी टूट के कगार पर पहुँच गई थी
प्रचंड

इस बीच राजनीतिक पार्टियों के आपसी समीकरण दिमाग़ घुमा देने वाली गति से बने बिगड़े उसमें माओवादी पार्टी राष्ट्रपति का पद गँवा बैठी.

प्रधानमंत्री के तौर पर प्रचंड ने परंपरा को तोड़ते हुए भारत की बजाए पहले चीन जाने का फ़ैसला किया. उन्हें चीन से लौटने पर ही महसूस हुआ कि भारत इससे कितनी सशंकित हो गया और कूटनीति की दुनिया में इससे कितनी बड़ी हलचल मच गई.

एक ओर प्रचंड को बहुदलीय व्यवस्था के नियमों और चालपट्टियों को समझना-साधना पड़ रहा है तो दूसरी ओर पार्टी छापामारों के सामने ये भी साबित करना पड़ रहा है कि वो अपने क्रांतिकारी मक़सद को भूले नहीं है.

लेकिन प्रचंड के सामने आ रही चुनौतियों का ये सिर्फ़ एक पहलू है.

दूसरा पहलू है जनयुद्ध में प्रचंड के सहयोगी और पार्टी के सिद्धांतकार बाबूराम भट्टाराई की नाराज़गी.

नाराज़गी

जानकारों के मुताबिक़ माओवादी पार्टी की सरकार बनने के बाद बाबूराम भट्टाराई सरकार में अपनी स्थिति को लेकर नाराज़ हैं.

उन्हें उम्मीद थी कि सरकार में प्रचंड के बाद दूसरे नंबर पर वो ही होंगे, लेकिन सरकार में शामिल एकीकृत मार्क्सवादी लेनिनवादी पार्टी के नेता बामदेब गौतम को उप प्रधानमंत्री और गृहमंत्री का पद दिए जाने से भट्टाराई अपनी स्थिति को कमज़ोर मान रहे हैं.

यही कारण है कि बामदेब गौतम के शपथ ग्रहण समारोह से भट्टाराई की अनुपस्थिति सबको खटकी थी.

माओवादी पार्टी के नेतृत्व में शामिल लोग कहते हैं कि इस सरकार के दीर्घायु होने पर उन्हें शक है. उनका कहना है कि जैसे ही पार्टी अपने क्रांतिकारी कार्यक्रम को लागू करने की कोशिश करेगी, एकीकृत मार्क्सवादी-लेनिनवादी जैसी पार्टियाँ सरकार को हिलाने में सबसे आगे होंगी.

लेकिन फ़िलहाल प्रचंड किसी को भी नाराज़ नहीं करना चाहते. यहाँ तक कि उस नेपाली सेना के उच्च अधिकारियों को जिनके ख़िलाफ़ उन्होंने दस साल तक युद्ध लड़ा था.

प्रधानमंत्री पद सँभालने के बाद पहली बार बीबीसी को दिए एक इंटरव्यू में उन्होंने स्वीकार किया है कि “प्रधानमंत्री बनने के बाद मैं अब पहले जैसी भाषा इस्तेमाल नहीं कर सकता.”

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