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नेपाल में खाद्यान्न की कमी की चेतावनी | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
नेपाल सरकार और संयुक्त राष्ट्र ने चेतावनी दी है कि देश में हज़ारों लोग खाद्यान्न की ज़बरदस्त कमी का सामना कर रहे हैं. एक नई रिपोर्ट में ये बात सामने आई है कि तेल की कमी, हड़ताल और ख़राब मौसम की वजह से ज़रूरतमंद लोगों तक खाने-पीने की चीज़ें नहीं पहुँच पा रही हैं. साल भर में चावल की क़ीमत 50 फ़ीसदी तक बढ़ चुकी है. जबकि खाद्य तेल की क़ीमत पिछले छह महीनों में 30 प्रतिशत तक बढ़ चुकी हैं. खाद्यान्न की बढ़ती क़ीमतों ने पूरे दक्षिण एशिया में ग़रीब लोगों को सबसे ज़्यादा प्रभावित किया है. नेपाल सरकार और संयुक्त राष्ट्र विश्व खाद्य कार्यक्रम की तरफ़ से जारी की गई रिपोर्ट में इस बात की पुष्टि कर दी है कि खाद्यान्न की आसमान छूती क़ीमतें और मौसम की मार से ख़राब हो चुकी फ़सलों ने नेपाल को बुरी तरह तोड़ कर रख दिया है. विश्व खाद्य कार्यक्रम का अनुमान है कि नेपाल के तक़रीबन 25 लाख लोगों को तुरंत खाद्य सहायता की ज़रूरत है. हालांकि, संयुक्त राष्ट्र की तरफ़ से नेपाल के कुछ गाँवों में कुछ खाद्य कार्यक्रम चलाए गए हैं. इनमें हर महीने बच्चों के साथ-साथ उनकी माँ के लिए विशेष खाद्य सहायता दी जाती है और उनकी मेडिकल जाँच भी की जाती है. बीबीसी संवाददाता ने ग़रीबी की मार झेल रहे ऐसे ही एक गाँव का दौरा किया. संवाददाता के अनुसार नेपाल के पश्चिमी ज़िले अच्छाम में कई परिवार अपनी ज़रूरत से कम खाकर गुज़ारा कर रहे हैं. अपनी खाद्य ज़रूरतों को पूरा करने के लिए इन्हें घर की चीज़ें बेचनी पड़ रही हैं और गाँव के मर्द रोज़गार की तलाश में पड़ोसी देश भारत गए हुए हैं. मई महीने में नेपाल सरकार ने चावल और दूसरी खाद्य चीज़ों के निर्यात पर पाबंदी लगा दी थी ताकि खाद्यान्न की कमी और बढ़ती क़ीमतों पर काबू पाया जा सके. वैसे नेपाल खाद्य पदार्थों का कोई बड़ा उत्पादक देश नहीं है लेकिन वो गेहूँ और बासमाती चावल चीन और बांग्लादेश जैसे देशों को निर्यात करता है. |
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