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पुलिस की पीठ ठोंकी मुख्यमंत्री मोदी ने | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने फटने से पहले बमों की पहचान करने के लिए सूरत के निवासियों और पुलिस की तारीफ़ की है. सूरत में मंगलवार तक 20 बम बरामद किए गए थे. सूरत के निवासियों की प्रशंसा को मीडिया में प्रमुखता से जगह मिली है लेकिन मीडिया में मोदी की ओर से की गई पुलिस की प्रशंसा को जगह नहीं मिली है. उन्होंने कहा था, "गुजरात पुलिस ने बमों को खोजने और उन्हें निष्क्रिय करने में बहुत बढ़िया काम किया है." बाहर से देखने पर मुख्यमंत्री मोदी के ये शब्द सामान्य प्रशंसा के लगते हैं, लेकिन ये शब्द बहुत सावधानी से चुने गए हैं, क्योंकि अहमदाबाद में हुए धमाकों के बाद गुजरात पुलिस को इस तरह की नैतिक प्रशंसा की ज़रूरत थी. पुलिस पर बढ़ेगा दबाव इन घटनाओं से पुलिसवाले घबरा गए थे. आगे आने वाले दिनों में उन पर काम का दबाव और तनाव बढ़ेगा. एक गुजराती अख़बार के वरिष्ठ पत्रकार अजय उमट का मानना है कि ख़ुफ़िया विफलता को पुलिस के चेहरे पर देखा जा सकता है. उन्होंने कहा कि सूरत में लोग एक दूसरे से पूछ रहे हैं कि बमों को रखने के लिए बहुत सामान और लोग लगे होंगे, जिनका पता लगाने में पुलिस पूरी तरह नाकाम कैसे रही. नरेंद्र मोदी ने जिस दिन सूरत का दौरा किया था, उस दिन भी वहाँ से दो बम बरामद किए गए थे. अहमदाबाद में बम विस्फ़ोटों के बाद एक व्यक्ति को गिरफ़्तार किया गया था, जिसके बाद कहा गया कि बम विस्फोटों के मामले में यह पहली गिरफ़्तारी हैं. बाद में यह पता चला कि उस व्यक्ति का बम विस्फ़ोटों से कोई लेना-देना नहीं हैं, उसकी गिरफ़्तारी 2002 के दंगों के संबंध में की गई है. यह गिरफ़्तारी यह बताने का प्रयास थी कि जाँच में प्रगति हो रही है. अहमदाबाद में 90 मिनट में 17 धमाके हुए थे. इस बात को अब एक हफ़्ते हो चुके हैं, लेकिन पुलिस अभी तक कोई पुख़्ता सबूत नहीं ढूँढ़ पाई है. गुजरात पुलिस का क्राइम ब्रांच इस मामले की जाँच कर रहा है. वह कई अन्य मामलों की भी जाँच कर रहा है, लेकिन वह किसी भी मामले के अंतिम सिरे तक पहुँचता नहीं दिख रहा है. संसाधनों की कमी बीबीसी संवाददाता ने अहमदाबाद में बम धमाकों के दूसरे दिन रात में पुलिस के एक गश्ती दल के साथ शहर में गश्त लगाई थी. उस दल के प्रमुख इंसपेक्टर एमबी जोशी ने यह स्वीकार किया था कि पुलिस के पास जो संसाधन है वह चरमपंथी घटनाओं से निपटने में सक्षम नहीं है. उन्होंने कहा, " हम इस तरह की चरमपंथी घटनाओं को रोक सकते हैं अगर हमारे पास सूचनाएँ एकत्र करने की कोई विशेष यूनिट हो. आज मामलों की जाँच-पड़ताल, सूचनाएँ जुटाने और अन्य कामों को एक ही व्यक्ति को करना पड़ता है. एमबी जोशी की बात से राज्य के अन्य पुलिस अधिकारी सहमत थे, पर वे अपने नाम नहीं बताना चाहते थे. उन्होंने कहा कि राज्य की पुलिस को चरमपंथ से लड़ने के लिए और अधिकार और प्रशिक्षण की ज़रूरत हैं. पड़ोसी राज्य राज्य में पुलिस बल में 60 हज़ार लोग हैं, लेकिन उनमें से केवल एक हज़ार ही चरमपंथ से लड़ने में लगे हुए हैं. कुछ अन्य अधिकारियों ने आरोप लगाया कि राज्य सरकार ख़ुफ़िया तंत्र का प्रयोग विपक्षी नेताओं के बारे में सूचनाएँ एकत्र करने और अपने विरोधियों पर नज़र रखने में कर रही हैं. उसके बाद चरमपंथ से संबंधित सूचनाएँ जमा की जाती हैं. गुजरात को अपने पड़ोसी राज्यों की पुलिस की ओर भी एक नज़र डालनी चाहिए. महाराष्ट्र में मुंबई की लोकल ट्रेनों में हुए बम धामाकों और मालेगाँव में साइकिल में बम विस्फोट के बाद वहाँ की सरकार ने एंटी टेरेरिस्ट स्क्वाड (एटीएस) का गठन किया था. जिसके बाद से वहाँ अब तक कोई बम धमाका नहीं हुआ है. |
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