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मंगलवार, 29 जुलाई, 2008 को 10:36 GMT तक के समाचार
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त्रासदी का मंज़र, शक की निगाहें

अहमदाबाद के अस्पताल में यश
सोमवार को अस्पताल में घायलों से मिलने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह गए थे
अहमदाबाद धमाकों के विध्वंस और त्रासदी से उबरने की कोशिश कर रहा है. लेकिन सड़कों पर वो चहल पहल या भीड़ नहीं दिखती जो आम तौर पर रहती है, उसकी जगह हर अजनबी, हर चीज़ को शक की नज़र से देखने वाली निगाहें हैं.

लोग अब यह कहते सुनाई देते हैं कि अगर अस्पतालों को निशाना बनाया जा सकता है तो कुछ भी हो सकता है. हिंसा की सीमा ख़त्म हो चुकी है. क्योंकि यह ना उम्र देखती है, ना मज़हब. अस्पतालों को निशाना बना कर सिर्फ़ यह संकेत दिया जा रहा था कि हिंसा जितना संभव हो उतनी निर्मम शक्ल में होगी.

सिविल अस्पताल में हुए दो बम धमाकों में कम से कम 38 लोग मारे गए हैं और कई लोग घायल हो गए. ज़्यादातर वो लोग इसकी चपेट में आए जो अस्पताल लाए जा रहे घायलों की मदद के लिए दौड़े थे.

अस्पताल में दो बच्चे भी थे जिनका वहां कोई काम नहीं था. 10 साल का यश और 11 साल का रोहन इसकी सज़ा भुगत रहे हैं.

अस्पताल में काम करने वाले एक कर्मचारी दुष्यंत व्यास के ये बच्चे अस्पताल के स्टाफ़ क्वार्टर में रहते थे और बस अपने पिता को यह दिखाने आए थे कि उन्होंने साइकिल चलानी सीख ली है. बस इतना कसूर था इनका जिसकी वजह से ये बच्चे आज उसी अस्पताल के बिस्तर पर ज़िंदगी और मौत के बीच झूल रहे हैं.

शक की निगाह

गीताबेन, यश और रोहन की माँ
अस्पताल में हुए धमाकों में यश और रोहन के पिता की मौत हो गई

अस्पताल में हुए दूसरे बम विस्फोट में उनके पिता की मौत हो गई. चूंकि बच्चे उस समय उनसे कुछ दूर थे वो घायल हो गए. रोहन सत्तर प्रतिशत से ज्यादा जल गया है और यश लगभग पचास प्रतिशत.

अस्पताल के बिस्तर पर नीमबेहोशी की हालत में यह दोनों बच्चे पानी के लिए कराह रहे हैं. शरीर के भीतर भी उतनी ही जलन है. यश अचानक ज़ोर ज़ोर से चीख कर अपनी मां से कहता है, "मां आइसक्रीम दे दो. फ्रिज में रखी है. आइसक्रीम दे दो...". फिर धीरे धीरे वो कराहने लगता है.

उसकी बगल के बिस्तर पर पड़ा रोहन एक ही बात दोहराता है, बहुत दर्द हो रहा है... बिस्तर के पास बैठी उनकी मां गीता बेन सूनी आंखों से उन्हें देखती रहती है. इन बच्चों के भीतर झुलसाती आग और ज़ख्मों का कोई इलाज नहीं है उसके पास. शायद वो सोच रही है कि कैसे वो इन बच्चों को बताएगी कि उनके पिता अब नहीं रहे.

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने सिविल अस्पताल में आ कर इन बच्चों का भी हाल जाना. सहायता का आश्वासन दिया. क्या मांगा गीता बेन ने प्रधानमंत्री से. अस्फुट सा जवाब आता है – कुछ नहीं.

लेकिन जब मैं वहां से निकला तो एक पत्रकार ने मुझे बताया कि गीता बेन मुझे वार्ड में खड़ा देख डर गई थीं और उससे पूछ रहीं थी, "यह आदमी आतंकवादी तो नहीं है. यह मेरे बच्चों को कुछ करेगा तो नहीं...".

पूरा शहर शक के घेरे में है. गीता बेन की चिंता समझ में आती है.

कैसी विडंबना

अस्पताल को देख कर भी लगता है जैसे सैनिक छावनी में बदल गया है. वहां से आठ किलोमीटर दूर वीएस अस्पताल में त्रासदी का दूसरा अध्याय है. यहां सात साल का इसरार मौत से जूझ रहा है. उसके चाचा बताते हैं कि इसरार कोमा में है. दिमाग़ में छर्रे घुस गए हैं.

नरोला में अपनी मां शोभरा बानो के साथ इसरार घर लौट रहा था. धमाके की चपेट में आ गया. उपर दूसरे वार्ड में मां बेहोश पड़ी है. तीन दिन से दोनों को होश नहीं. वो जानती तक नहीं कि उनका बेटा किस हालत में है. शोभरा बानो का पति पेशे से नाई है और एक वार्ड से दूसरे वार्ड दौड़ रहा है.

इसरार के रिश्तेदार बताते हैं उनका हाल पूछने कोई नहीं आया. कोई नहीं आया इसका एक सबूत यह भी है कि जिस वार्ड में इसरार कोमा में पड़ा है वहां पिछले पौने घंटे से बिजली तक नहीं है. अंधेरे और उमस भरे वार्ड में उसके रिश्तेदारों की नज़रें वेंटिलेटर मशीन पर हैं जो इसरार को ज़िंदा रखे हुए है.

दूसरे वार्डों में चक्कर लगाएं तो कई बिस्तरों के पास दीवार पर लिखा है-'ब्लास्ट इंजुरी'. अस्पताल में ज्यादातर घायल युवा हैं या बच्चे हैं.

कैसी विडंबना है कि इन अस्पतालों में घायल होने वाले ज्यादातर लोग घायलों को ख़ून देने आए थे, उनकी मदद करने आए थे.

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