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गुरुवार, 31 जुलाई, 2008 को 01:48 GMT तक के समाचार
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सार्क सम्मेलन: कूटनीति चरम पर

चौदहवाँ सार्क सम्मेलन
इससे पहले हुए सम्मेलनों पर बेमतलब होने के आरोप लगते रहे हैं

कोलंबो में पंद्रहवें सार्क सम्मलेन में दक्षिण एशिया के आठ देशों के राष्ट्राध्यक्षों के दो और तीन अगस्त को होने वाली बैठकों से पहले कूटनीतिक गतिविधियाँ अपने चरम पर हैं.

इसी कड़ी में बुधवार को सार्क देशों के विदेश सचिवों की बैठकें हुईं.

संगठन में शामिल भारत, पकिस्तान, अफ़ग़ानिस्तान, श्रीलंका, बांग्लादेश, नेपाल, भूटान, मालदीव के कूटनयिक कोशिश कर रहे हैं कि इस सम्मलेन पर पिछले सम्मेलनों के तरह बेमतलब होने का दाग़ न लगे.

शायद इसीलिए सम्मलेन का ध्येय है,`पार्टनरशिप फॉर अवर पीपल' यानी अपने लोगों के लिए सहयोग.

अभी तक जिन मुख्य मुद्दों पर सार्थक बातचीत की आशा की जा रही है उनमें प्रमुख है, व्यापक सार्क विकास निधि स्थापित करना.

जिन अन्य विषयों पर चर्चा होनी है उसमें दक्षिण एशिया में खाद्य सुरक्षा, बिजली संकट और चरमपंथ हैं.

बी मुरलीधर रेड्डी कोलंबो में भारतीय अखबार 'द हिंदू' के संवाददाता हैं. वो कहते हैं, "इन समझौतों में कुछ भी ख़ास नहीं है. वृहद सार्क विकास निधि की बात तक़रीबन बारह साल से चल रही है, आतंकवाद से दक्षिण एशिया के सभी देश परेशान हैं पर भारत, पाकिस्तान अफ़ग़ानिस्तान बांग्लादेश और नेपाल सब के लिए आतंकवाद की परिभाषा अलग-अलग है."

शायद इसलिए यहाँ लोगों की निगाहें सार्क के भीतर क्या हो रहा है उस पर नहीं है, उसके आसपास क्या होने जा रहा है इस पर भी है.

महत्त्वपूर्ण मुलाकातें

गुरुवार को सार्क देशों के विदेश मंत्री अपने-अपने देशों के राष्ट्राध्यक्षों की मुलाक़ात के पहले बातचीत के प्रारूपों को अंतिम स्वरुप देने के लिए मिलेगें.

लेकिन नज़रें लगी हुई हैं सम्मेलन से इतर होने वाली मुलाक़ातों पर.

सबसे ज़्यादा उत्सुकता है भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री युसूफ़ रज़ा गिलानी की मुलाक़ात को लेकर.

इस मुलाक़ात पर नज़रें इसलिए भी लगीं हुई हैं क्योंकि पिछले कुछ समय से भारत और पकिस्तान के बीच संबंधों में एक बार फिर तनाव की छाया दिख रही है. कश्मीर में नियंत्रण रेखा पर दोनों तरफ़ से गोलीबारी हो रही हैं और दोनों ओर से आरोप प्रत्यारोप का दौर चल रहा है.

ठीक इसी तरह के कारणों के चलते अफ़ग़ानिस्तान के राष्ट्रपति हामिद करज़ई और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री की मुलाक़ात भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है.

श्रीलंका में विपक्ष के भारी भारत विरोध के बीच भारत-श्रीलंका में व्यापार संबंधों में ख़ासी बढ़ोत्तरी हुई है. इसके चलते श्रीलंका के राष्ट्रपति महिंद्रा राजपक्षे और भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की मुलाक़ात भी ख़ास मानी जा रही है.

सवाल बरक़रार

ऐसे कई लोग हैं जो इन संभावित मुलाक़ातों से प्रभावित नहीं हैं और सम्मलेन के औचित्य पर ही सवाल उठा रहे हैं.

 हमारे सामने अच्छे इरादों, वादों और सम्मेलनों का एक पहाड़ है पर ज़मीनी हकीकत कुछ और है
के गोडगे, पूर्व अतिरिक्त विदेश सचिव

श्रीलंका के पूर्व अतिरिक्त विदेश सचिव के गोडगे कहते हैं, "हमारे सामने अच्छे इरादों, वादों और सम्मेलनों का एक पहाड़ है पर ज़मीनी हकीकत कुछ और है."

गोडगे कहते हैं, "सार्क का मूल उद्देश्य था आपसी विश्वास बढ़ाना और वो तो कभी हो ही नहीं पाया. ऐसे में मुझे तो ये समझ ही नहीं आता कि ये सम्मलेन हो क्यों रहा है."

उनका मानना है कि ऐसे समय में जब भारत में कुछ समय बाद आम चुनाव आने वाले हैं, पाकिस्तान में हालत अस्थिर हैं, नेपाल में नई सरकार आने वाली है, श्रीलंका में भी इसको लेकर उत्साह नहीं है.

वे कहते हैं, "ये सम्मलेन केवल श्रीलंका सरकार की अपनी छवि सुधरने की कवायद भर लगती है."

सार्क सम्मेलन की तैयारियों के बीच श्रीलंका में सरकारी फौजों ने तमिल विद्रोहियों के ठिकानों पर भारी हमले जारी रखें हैं.

पहली बार श्रीलंका में सुरक्षा के लिए अभूतपूर्व इंतज़ाम किए गए हैं.

भारतीय प्रधानमंत्री के साथ सुरक्षा का भारी लावलश्कर आ रहा है. इसके अलावा भारतीय नौसेना के दो जंगी जहाज़ श्रीलंका की समुद्री सीमा के बाहर चौकस खड़े हैं.

इन इंतज़ामों के चलते श्रीलंका में तूफ़ान सा खड़ा हो गया है.

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