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रियलिटी शो का सच: एक विवेचना | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
टीवी पर आ रहे रियलिटी और टैलेंट शो जहाँ कुछ की किस्मत चमका देते हैं तो कुछ को अस्पताल भी पहुँचा सकते हैं. जैसा हाल ही में कलकत्ता की 16 साल की शिंजिनी सेनगुप्ता के साथ हुआ. शिंजिनी एक शो में नृत्य प्रतिस्पर्धा में भाग ले रही थी और एक राउंड में उनके ख़राब नाच पर शो के जजों की फटकार पर वे न केवल रोईं बल्कि उनको इतना सदमा लगा कि उन्हें लकवा मार गया. उनका बंगलौर के एक अस्पताल में इलाज हो रहा है और डॉक्टरो का कहना है की शायद उन्हें पहले से ही कुछ बीमारी थी, जिस पर सार्वजनिक फटकार ने उनकी ये हालत कर दी. शिंजिनी की हालत पर बहस इस बात पर छिड़ गई कि इसके लिए कौन ज़िम्मेदार हैं. बहस इस तरह के शो पर भी सवाल उठने लगे और नियम क़ानून बनाने की चर्चा होने लगी. जाने-माने टीवी प्रोड्यूसर सिद्धार्थ बसु कहते हैं, "मैं समझता हूँ कि शिंजिनी के साथ जो घटना हुई है वो ख़तरे की घंटी है. चाहे बड़ा हो या छोटा, बेवजह किसी को भी अपमानित नहीं किया जाना चाहिए. बच्चों के लिए तो मापदंड अलग से तय होने ही चाहिए." इस सारे घटनाक्रम में जजों की भूमिका पर सवाल उठे. क्या वे ज़रूरत से ज़्यादा कह जाते हैं. 'सा रे गा मा' और 'जो जीता वही सिकंदर' में भाग ले चुकी हिमानी कहती हैं, "मेरा सा रे गा मा का अनुभव बहुत सकारात्मक रहा. मुझे बहुत ज़्यादा निगेटिव कमेंट्स नहीं मिले. खुद के भीतर वो क्षमता होनी चाहिए कि मंच पर हमारे साथ कुछ भी हो सकता है." हिमानी कहती हैं, "जज ही हैं जो हमें ज़ीरो से हीरो बना देते हैं या फिर हमें इतना सुना दें कि हमारा मनोबल ही टूट जाए. जजों को भी थोड़ा ख़्याल रखना चाहिए कि ऐसा न बोलें जिससे प्रतियोगी को ज़बर्दस्त धक्का लगे." डगर नहीं आसान काज़ी तौक़ीर टीवी में टैलेंट शो के शुरुआती दौर के एक प्रतियोगी हैं. उनके लिए फेम गुरुकुल में जीत फ़ायदे का सौदा रहा. वे भी कहते हैं कि प्रतियोगिता में जीत तो सबको दिखती है पर इसकी डगर आसान नहीं होती. तौक़ीर कहते हैं, "मैंने चुनौती स्वीकार की, आलोचनाएं झेली और प्रतियोगिता जीती. कुछ लोग आलोचना नहीं झेल पाते, लेकिन प्रतियोगियों को ये समझना चाहिए कि ये रियलिटी शो का हिस्सा है और आलोचना तो उन्हें झेलनी ही पड़ेगी." शिंजिनी के माँ-बाप सारा दोष जजों पर मढ़ रहे हैं पर ऐसे शो में जज बनने वालों का तर्क है कि अगर आप सही ग़लत नही बताएँगे तो प्रतियोगी कैसे अपने को सुधारेंगे, बेहतर बना पाएंगे ताकि जीत की इस दौड़ में आगे हों.
'जो जीता वही सिकंदर' में जज और विशाल-शेखर नामक मशहूर संगीत निर्देशक जोड़ी के शेखर कहते हैं, "गायक को उसकी कमियां बताना बहुत ज़रूरी है. लेकिन टीआरपी बढ़ाने के चक्कर में कुछ जज बहुत ज़्यादा बोल जाते हैं, ये सही नहीं है. गायकों को बहुत प्यार से समझाना चाहिए." कुछ शो तो उकसाने-भड़काने वाले बनाये ही जाते है.. यानी लोकप्रियता या टीवी की भाषा में टीआरपी के फेर में तड़का ज़रूरी है. मीडिया आलोचक शैलेजा वाजपेयी कहती हैं, "ये सारे रियल्टी शो विदेशी शो की नकल हैं. मसलन हैल्थ किचन नामक शो में तो जज गाली तक देते हैं. अगर शो में ड्रामेबाज़ी नहीं होगी तो इन्हें कौन देखेगा." पर टीआरपी के चक्कर में कभी-कभी हदें भी पार हो जाती हैं और शिंजिनी जैसी घटनाएं भी घट जाती हैं. डाँट-फटकार डाँट-फटकार का कई बार गहरा असर हो जाता है, ख़ासकर बच्चो पर. अपोलो अस्पताल में वरिष्ट मनोचिकित्सक डॉ संदीप वोहरा कहते हैं, "शिंजिनी का मामला बहुत गंभीर है. बच्चे बहुत संवेदनशील होते हैं. जजों को बहुत सोच-समझकर और सावधानी से टिप्पणियां करनी चाहिए." तो सवाल ये उठता है कि क्या टीआरपी की होड़ में कहीं प्रोड्यूसर शो के जजों पर ज़्यादा ड्रामा करने का दबाव तो नहीं डालते. क्या सब कुछ पहले से तय होता है. सिद्धार्थ बसु ऐसा नही मानते. वे कहते हैं, "मैं नहीं मानता कि किसी भी शो में प्रतियोगी को तैयारी कराई जा सकती है. प्रदर्शन अच्छा रहेगा तो शो अच्छा रहेगा. ड्रामेबाज़ी से कुछ नहीं होता. लड़ाई-झगड़े या बनावटी सनसनी से टीआरपी नहीं बढ़ती." कुछ ज़िम्मेदारी परिवारों की भी है. उन्हें भी सोचना चाहिए कि उनके बच्चे उनकी अभिलाषा पूरी करने का ज़रिया नहीं हैं और न ही कमाई का साधन. इसी ओर इशारा किया महिला और बाल कल्याण मंत्री रेणुका चौधरी ने. वे कहती हैं, "मां-बाप से भी पूछा जाना चाहिए कि ये जानते-बूझते भी कि उनके बच्चे इतने नाजुक हैं, वे बच्चों पर दबाव क्यों डालते हैं." फेम गुरुकुल विजेता काज़ी आज फिल्मों में काम कर रहे हैं. कुछ विजेताओं को फ़िल्मों में गाने का मौका मिला, कुछ का करियर चल निकला. शो का लोभ इसलिए इन शो का लोभ भी बढ़ा है और तादाद भी. पर इसका एक नकारात्मक प्रभाव ये पड़ा कि अब इतने विजेता हो गए हैं कि दर्शक भी कम हो गए हैं और जीत के फायदे भी.
हिमानी कहती हैं, "फ़ायदा तब था जब एक-दो शो चल रहे थे. अब तो इतने शो चल रहे हैं कि जो थोड़ा बहुत भी गाता है ऑडिशन देने चला आता है." पर रियलिटी शो ने गांवों और छोटे शहरों के कई गुमनाम लोग रातोंरात राष्ट्रीय स्टार बना दिया. इसे करोड़ों लोगों ने देखा कि कई परिवारों को लगने लगा कि उनका चिंटू, उनकी गुडिया भी किसी से कम नहीं है. शैलेजा वाजपेयी कहती हैं, "एक तरह से ये अच्छा है. छोटे शहरों के बच्चों को मौका मिल रहा है. लेकिन पहले इंडियन आइडल अभिजीत सावंत को ही लीजिए. एक-दो एलबम के बाद वो कहां हैं. पता नहीं." तो क्या शो के लिए नियम क़ानून बनाए जाने चाहिए या फिर इन्हें बंद कर दिया जाना चाहिए, ख़ासकर जिनमें बच्चे भाग लेते हैं. ज़िम्मेदारी डॉ संदीप वोहरा कहते हैं, "शो हों पर ज़िम्मेदारी भरे हों. शो के नियम क़ानून होने चाहिए. ऐसा न हो कि अभिभावक अपनी महत्वाकांक्षा के लिए बच्चों पर शो में शामिल होने का दबाव बनाएँ." इन शो में अक्सर बच्चों को उम्र से पहले बड़ा दिखाने की कोशिश की जाती है. उन्हें बड़ों जैसे कपड़े पहनाए जाते हैं, मेकअप किया जाता है. संगीत निर्देशक शेखर कहते हैं,"बच्चों को बच्चा रहना दें. रियल्टी शो बच्चों के लिए ठीक नहीं हैं. प्रतियोगिता के बजाय ट्रेनिंग शो होना चाहिए. मां-बाप को बच्चों की प्रतिभा निखारनी चाहिए." वहीं सिद्धार्थ बसु भी बच्चों पर बहुत दबाव डालने के ख़िलाफ़ हैं. वे कहते है नियम टीवी उद्योग को ख़ुद बनाने चाहिए और अभिभावकों को भी ज़िम्मेदारी से काम लेना चाहिए. वो कहते हैं, "मां-बाप का बच्चों को प्रोत्साहित करना सही है, लेकिन एक सीमा तक ही ये ठीक है." यानी मुनाफ़े के लिए और मनोरंजन का साधन बने इन शो के निर्माताओं को जहाँ ज़्यादा ज़िम्मेदारी दिखाने कि ज़रूरत है, वहीं जजों को समझना चाहिए कि उन पर शो टिके हैं और शो के दौरान बच्चे उनके हर शब्द को पत्थर की लकीर मानते हैं. ऐसे में वे कहीं बच्चों को आहत तो नहीं कर रहे हैं. माँ-बाप को भी सोचना ज़रूरी है कि प्रतिस्पर्धा, लोकप्रियता और कमाई के लालच में कहीं वे अपनी बच्चों पर ज़रूरत से ज़्यादा दबाव तो नही डाल रहे. कहीं आगे बढ़ने की इस अंधी दौड़ में वो अपनी बच्चों की जान शिंजिनी कि तरह ख़तरे में तो नहीं डाल रहे हैं. |
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