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प्रयोग करना बुरा नहीं: बप्पी लाहिरी | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
हिन्दी सिनेमा के पहले हिन्दी पॉप संगीतकार बप्पी लहरी के जीवन और कैरियर में काफ़ी कुछ है जो असाधारण है. डिस्को संगीत के भारतीय जनक और पुरूष फैशन सज्जा के अग्रिम पंक्ति के सोने जवाहरातों से लदे इस चर्चित ग्लैमर पुरूष ने अरसे बाद अनुपम खेर की फ़िल्म ‘मैंने गांधी को नहीं मारा’ से वापसी की. बांग्ला फिल्मों में नामी गायक, संगीतकार रहे परेश लहरी के इस संगीतकार बेटे ने ‘टैक्सी नबर नौ दो ग्यारह’ में एक फिर गायकी के जलवे दिखाकर बता दिया कि वे अभी इंडस्ट्री में मौजूद हैं. सारेगामा के बाद सोनी चैनल के नए शो 'के फ़ॉर किशोर' के लिए एक बार फिर जज की भूमिका में आने वाले बप्पी दा का मानना है कि इस बार वे सचमुच किसी शो को अपने दिल के क़रीब महसूस कर रहे हैं. प्रस्तुत है बप्पी लाहिरी से बातचीत के कुछ अंश: शो से जुड़ने की खास वजह आपके मामा किशोर कुमार हैं? अब तक मैं जितने भी शो में जज बना वो चैनलों के आग्रह पर था. इसे मैं ख़ुद करना चाहता था. यह पहला शो है जिसमें किशोर मामा के जीवन से जुड़े लीना, अमित और सुमित भी शामिल हैं. मेरे साथ उनका गहरा रिश्ता था. मैंने उनके साथ आखरी गीत ‘वक़्त की आवाज़’ का रिकार्ड किया था. अगले दिन वे नही रहे. चौंतीस सालों में मैंने उनके साथ संयोग से ऐसे गीत रिकार्ड किए जिनके शब्दों में जिंदगी के सुर सुनाई पड़ते हैं. किशोर कुमार के बारे में आप क्या कहेंगे? वे लिजेंड थे. उनके गीत और उनकी प्रतिभा का कोई मुकाबला नही हो सकता. यह मैं इसलिए नहीं कह रहा हूँ कि उन्होंने संगीतकार बनने में मेरी मदद की बल्कि इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि वे इंडस्ट्री के बहुआयामी व्यक्तित्व थे. वे जीते जी एक स्मारक बन गए थे. उन्होंने बतौर अभिनेता, कॉमेडियन, गायक, संगीतकार या फ़िल्म निर्देशक जो किया वो कोई कभी नही कर पाएगा. मैंने जब उनके साथ ‘चलते चलते’ का गाना किया तो उनका कहना था यह हिट होगा. मैं थोड़ा संशकित था पर आज उस गीत के बोल हम चाह कर भी भुला नहीं सकते. फिर जूनियर गायक भी संगीत की समझ को लेकर आपसे बहस क्यों करते हैं? इससे मुझे कोई फ़र्क़ नही पड़ता. वे सब अपने मुकामों से परिचित हैं. लोग आते जाते रहते हैं. मेरे साथ के कई गायक और संगीतकार अब काम नही कर रहे हैं. ‘सारेगामा’ या ‘इंडियन आइडल’ जैसे शो में जज बनने को आप काम कहते हैं? ऐसे शो प्रतिभाओं को मंच देने के साधन मात्र हैं. उनकी असली परीक्षा उसके बाद होती है. हर आदमी को अपनी राय बताने का हक़ है . चाहे वो अभिजीत हों या हिमेश रेशमिया. मैंने चार हज़ार से ज्यादा गाने कंपोज़ किए. अलीशा चिनॉय, रूना लैला और शेरॉन प्रभाकर को मैंने ही ब्रेक दिया था. मैं पहला आदमी था जो सामंथा फॉक्स को भारत लेकर आया. मैंने किसी को निराश नहीं किया.
आपके संगीत में पश्चिम के असर का आरोप लगता रहा है? इसका मतलब है पंचम दा के संगीत का कोई मतलब नही. मैं एल्विस प्रेस्ली का प्रशंसक हूँ. ये मैंने किशोर मामा से सीखा. आज लोग आसानी से मेरे गीतों की नक़ल कर लेते हैं. आज भी मेरे ‘गोरी हैं कलाइयाँ’ और ‘हबीबा’ जैसे रीमिक्स को कोई छू नही सका. मैंने कभी गीत की आत्मा को नही मारा. मेरे ‘गोरी हैं कलाइयाँ’ को बीबीसी ने अपने यहाँ जगह दी. लेकिन नब्बे के दशक के बाद भारतीय संगीत मर गया. अब सत्तर और अस्सी के दशक की तरह ‘जख्मी’, ‘शराबी’ या ‘नमक हलाल’ जैसा संगीत नही बनता. बस एक बार मैंने ‘घायल' के गीत 'सोचना क्या' में स्पैनिश लोकगीत का प्रयोग किया. अब एक फ़िल्म में कई लोग मिलकर काम करते हैं पर मैंने कभी ऐसा नही किया. लोग आज तुरंत कुछ भी करने के लिए तैयार हो जाते हैं. संगीत समय माँगता है. आप किशोर दा का इतना सम्मान करते हैं पर कभी अमित और सुमित के साथ काम नहीं किया? मैंने अमित के साथ ‘इल्ज़ाम’, ‘घर का चिराग’ और ‘आज का अर्जुन’ में काम किया है. मेरा बेटा बाप्पा लहरी सुमित के साथ काम कर रहा है. आपको याद हो तो किशोर दा की फ़िल्म 'दूर वादियों में कहीं ' अभी तक रिलीज़ नहीं हुई है. अब लोगो की पसंद और इंडस्ट्री तेजी से बदल रही है. यह अलग बात है कि कुछ लोगों ने संगीत के बहाने संगीत को बदलने की क़वायद शुरू की है और उसे क्षेत्रीय और पाकिस्तानी संगीत की खुराक देनी शुरू की है. इसके चलते हिन्दी फिल्मों के लोकप्रिय संगीत को नुकसान पहुँचा है. प्रयोग करना ग़लत बात नहीं है. मैंने ख़ुद किए हैं. इसमे स्थायित्व नहीं होता. जब नए लोग आते हैं तो पुराने लोगों को उन्हें जगह देनी ही पड़ती है. आगे क्या कर रहे हैं? कुछ समय पहले रामू के साथ काम किया था. इसके अलावा पहलाज निहलानी की ‘खुशबू’, रमेश सिप्पी की ‘चांदनी चौक टू चाइना’ और ‘भूतनाथ’ जैसी फ़िल्में आने वाली हैं. | इससे जुड़ी ख़बरें पुराने रंग में रंगा एक नया गीत25 अक्तूबर, 2007 | मनोरंजन एक्सप्रेस अकेली महिला संगीत निदेशक उषा खन्ना21 दिसंबर, 2006 | मनोरंजन एक्सप्रेस 'मुझे आज भी अचार खाना पसंद है'27 सितंबर, 2006 | मनोरंजन एक्सप्रेस लोगों की रुचि बदली तो संगीत भी बदला..01 अगस्त, 2006 | मनोरंजन एक्सप्रेस मोहम्मद रफ़ी की याद ...30 जुलाई, 2006 | मनोरंजन एक्सप्रेस | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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