|
अकेली महिला संगीत निदेशक उषा खन्ना | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
उषा खन्ना भारतीय सिनेमा के हाल के इतिहास की अकेली संगीत निदेशक हैं. 'छोड़ों कल की बातें...' से लेकर 'शायद मेरी शादी का ख़याल...' तक बहुत से गीत हैं जिनको उन्होंने धुन दी और वे सदाबहार हो गए. वे कहती हैं कि अकेली महिला निदेशक होना उनके लिए कभी कोई चुनौती नहीं रहा...चुनौती हमेशा अच्छी धुन थी. 1942 में, ग्वालियर में जन्मी उषा खन्ना को संगीत विरासत में मिला. उनके पिता मनोहर खन्ना गीतकार,संगीतकार और गायक भी थे. तीन दशकों तक फिल्म इंडस्ट्री में धूम मचानें वाली उषा खन्ना का फिल्मी सफ़र चालीस साल लम्बा रहा. उन्होंने तक़रीबन ढाई सौ फिल्मों में संगीत दिया. 1959 में उन्होंने अपनी पहली फिल्म "दिल देके देखो" में संगीत दिया था. प्रस्तुत है सूफ़िया शानी से उनकी बातचीत के अंश. धुन बनाने की धुन कहाँ से लग गई आपको? घर पर संगीत का महौल तो था ही क्यों कि पिताजी गीत लिखा करते थे. इस तरह संगीत से लगाव बचपन से ही हो गया था. मैंने पहली धुन सोलह वर्ष की उम्र में बनाई थी. क्या आपसे पहले भी इस क्षेत्र में महिलाएं थीं? मैं अकेली महिला थी इस क्षेत्र में हालांकि मुझसे बहुत साल पहले सरस्वती देवी थीं जिन्होंने एकाध गाना किया था.
फिल्मी दुनियां पुरूषों की दुनिया मानी जाती है. क्या औरत होने के नाते आपको दिक्क़तें पेश आईं? बिलकुल नहीं, बल्कि मैं अकेली महिला थी और उस समय सभी चोटी के संगीतकार थे. नौशाद साहब, मदन मोहन, शंकर जयकिशन, रौशन जी. मुझे इन लोगों से कभी कोई परेशानी नहीं हुई. आपका धुन बनाने का तरीक़ा क्या है? मैंने कभी फॉर्मूले के तहत धुन नहीं बनाई बल्कि सावन जी का एक मशहूर गाना है."शायद मेरी शादी का ख्याल दिल में आया है..इसीलिए मम्मी ने मेरी तुम्हें चाय पे बुलाया है". इस गाने की धुन मैंने गाड़ी चलाते हुए बनाई थी और धुन सुनते ही सावन जी ने ओके कर दिया था. फ़िल्म 'हिदुस्तानी' का गाना "छोड़ो कल की बातें कल की बात पुरानी" इस गाने पर आज भी लोग झूम उठते है, कैसा लगता है आपको? बहुत अच्छा लगता है. मैं भावुक हो जाती हूँ. इस गाने के बोल मेरी सोच का आईना है. मैं हमेशा आगे देखने में विश्वास रखती हूँ. आपने पंकज उधास, सोनू निगम जैसे नए गायकों को मौक़े दिए.कैसा अनुभव रहा आपका नए गायकों के साथ? मुझे कभी किसी से कोई परेशानी नहीं हुई. मेरा मानना है कि नए लोगों को भी चांस देना चाहिए और लोग भी तो नया सुनना चाहते हैं. जैसे जब मैं आई थी तो लोगों ने मेरा भी तो स्वागत किया था. बहुत दिनों से आप खामोश है क्या उषा खन्ना थक गई हैं? नहीं मैं थकी नहीं हूं..... अभी बल्कि गुजराती,मराठी फिल्मों और सीरियलों में संगीत दे रही हूँ. पिछले दिनों ही आशा पारेख के सीरियल ''कोरा काग़ज़" में भी मैंने संगीत दिया था. मेरी इच्छा है कि उषा खन्ना जब तक ज़िन्दा है काम करती रहे. | इससे जुड़ी ख़बरें अमरीका में 'बॉलीवुड म्यूज़िक अवार्ड्स' संपन्न10 नवंबर, 2006 | पत्रिका 'संत संगीतकार थे बिस्मिल्ला ख़ान'21 अगस्त, 2006 | पत्रिका 'नौजवानों को गुमराह कर रही हैं फ़िल्में'08 मार्च, 2006 | पत्रिका दुनिया का बेहतरीन संगीतकार कौन?29 जनवरी, 2006 | पत्रिका एक फ्रांसीसी का हिंदी संगीत प्रेम20 अप्रैल, 2005 | पत्रिका | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
| ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||