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बुधवार, 02 जुलाई, 2008 को 16:34 GMT तक के समाचार
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साथी नहीं मुसीबत बने हाथी

मेदनीपुर में बाढ़
बाढ़पीड़ित इलाक़ों से राहत सामग्री नहीं मिलने की शिकायतें आ रही हैं
झारखंड से सटे पश्चिम बंगाल के पूर्वी और पश्चिमी मेदिनीपुर ज़िलों में पिछले दिनों आई बाढ़ के बाद अब उन इलाक़ों में राहत पहुंचाने के काम में जुटे अधिकारियों के लिए एक नई मुसीबत पैदा हो गई है.

यह मुसीबत है उस इलाक़े में रहने वाले और झारखंड से आने वाले हाथियों का झुंड.

राहत सामग्री के तौर पर चिवड़ा और गुड़ बाँटा जाता है. लेकिन हाथी अब गुड़ की गंध से उन मकानों और राहत शिविरों पर हमले कर रहे हैं जहां राहत सामग्री का स्टॉक रखा गया है.

ख़ास तौर पर पश्चिमी मेदिनीपुर ज़िले के विभिन्न बाढ़ग्रस्त इलाक़ों में राहत सामग्री की भारी किल्लत पैदा हो गई है. वन विभाग के अधिकारियों को भी इस नई मुसीबत से निजात पाने का कोई उपाय नहीं सूझ रहा है.

बाढ़ पीड़ित इलाक़ों से पहले ही राहत सामग्री नहीं मिलने की शिकायतें आ रही हैं.

हाल में हाथियों ने कई राहत शिविरों पर धावा बोला है. इससे राहत शिविरों में रह रहे बाढ़ पीड़ितों को आधा पेट खाकर या भूखे रह कर दिन काटने पड़ रहे हैं.

इस बाढ़ से अब तक 51 लोगों की मौत हो चुकी है. कुल 35 लाख लोग इससे प्रभावित हैं. इसके अलावा लगभग डेढ़ हजार राहत शिविरों में तीन लाख 70 हज़ार लोगों ने शरण ले रखी है
असीम दासगुप्ता

पश्चिमी मेदिनीपुर के विभिन्न ब्लॉक मुख्यालयों और वहां खोले गए राहत शिविरों में राहत सामग्री का स्टॉक रखा गया है. लेकिन बाढ़पीड़ितों तक पहुँचने के पहले इसका ज्यादातर हिस्सा हाथियों के पेट में पहुंच जाता है.

हाथियों का धावा

खड़गपुर रेंज के डिवीज़नल फ़ारेस्ट अफ़सर मिलन कांति मंडल कहते हैं, "पानी से घिरे जंगलों में पर्याप्त भोजन नहीं मिलने की वजह से ही हाथी राहत शिविरों पर धावा बोल रहे हैं."

हाथी
झारखंड के जंगलों में बहुत हाथी हैं

इस सप्ताह तीन दिनों में ऐसी चार घटनाएं हो चुकी हैं. मंडल ने खुद उन शिविरों का दौरा किया है. वे बताते हैं कि झारखंड की दलमा पहाड़ियों से हाथियों का एक झुंड इलाक़े में पहुंचा है. वही खाने की तलाश में राहत शिविरों पर हमले कर रहा है.

इन हाथियों के हमलों के डर से पश्चिम मेदिनीपुर ज़िले के नयाग्राम और आसपास के राहत शिविरों में रहने वाले लोग रातों को चैन से सो भी नहीं पाते.

बीते सप्ताह घर और खेत डूब जाने के बाद एक राहत शिविर में शरण लेने वाले दीपेश जाना बताते हैं, "दो दिन पहले ही रात के समय चार हाथियों ने अचानक इस शिविर पर हमला कर दिया और हमारे लिए रखा राशन खा गए."

जाना कहते हैं, "हाथी हमारे लिए साथी नहीं, बल्कि मुसीबत बन गए हैं."

राहत शिविर के तौर पर इस्तेमाल किए जा रहे स्कूलों के आस-पास भी रात के समय कई हाथी मंडराते और भीतर घुसने की कोशश करते नज़र आए हैं. लेकिन इमारत पक्की होने की वजह से वहां उनका वश नहीं चला.

मंडल का कहना है, "दो-तीन महीने पहले झारखंड की ओर से हाथियों का झुंड यहां के जंगलों में घुसा था. भोजन की तलाश में आने वाले हाथियों के झुंड को बाढ़ के पानी ने घेर दिया है. नतीजतन वे अब आसपास के स्थानों पर खाने की तलाश में पहुंच जाते हैं."

वे बताते हैं कि हाथी आधे किलोमीटर दूर से भी अपने भोजन की गंध पा जाते हैं. वे चालाक होते हैं और यह समझते हैं कि जहां लोगों का समूह है वहां भोजन जरूर होगा. उनके राहत शिविरों के आसपास मंडराने की यही प्रमुख वजह है.

'हल्ला पार्टी'

मंडल कहते हैं कि पहले 'हल्ला पार्टी' इन हाथियों को मशालों और ड्रमों की सहायता से खदेड़ देती थी. लेकिन किरासन की कमी और आसपास के तमाम इलाकों के बाढ़ में डूबे होने की वजह से वह भी काम नहीं कर पा रही है.

राहत सामग्री
ज़िला प्रशासन के लिए हाथी से राहत सामग्री बचाना मुसीबत बन चुका है

इस मौसम की पहली बारिश में ही इलाक़े की तमाम नदियों के उफनने की वजह से इन दोनों ज़िलों के ज़्यादातर हिस्से पानी में डूब गए हैं.

पश्चिम बंगाल के वित्त मंत्री असीम दासगुप्ता बताते हैं, "इस बाढ़ से अब तक 51 लोगों की मौत हो चुकी है. कुल 35 लाख लोग इससे प्रभावित हैं. इसके अलावा लगभग डेढ़ हजार राहत शिविरों में तीन लाख 70 हज़ार लोगों ने शरण ले रखी है."

पश्चिम मेदिनीपुर के जिल़ा प्रशासक नारायण स्वरूप निगम कहते हैं, "ज़िला प्रशासन इस नई मुसीबत से वाक़िफ़ है. हल्ला पार्टी को सक्रिय रखने की कोशिश हो रही है ताकि गांवों और राहत शिविरों में हाथियों को हमला करने से रोका जा सके."

वन मंत्री अनंत राय ने भी ज़िला प्रशासन और वन विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों को इस नई मुसीबत से जल्दी निजात दिलाने के लिए ठोस कदम उठाने का निर्देश दिया है ताकि राहत के लिए जूझ रहे बाढ़पीड़ितों को कम से कम इस मुसीबत से तो राहत मिले.

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