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हाथियों ने तोड़ी वर्षों की परंपरा | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
माना जाता है कि अगर कोई हाथी अपने झुंड से बिछड़ कर मनुष्यों के बीच चला जाए तो फिर झुंड उसे कभी वापस नहीं लेता लेकिन भुवनेश्वर में हाथियों के झुंड ने अपने सात महीने के बिछुड़े साथी को वापस ले लिया है. भुवनेश्वर के चंद्रका वन्यप्राणी अभ्यारण्य में साथ महीने का एक हाथी छह मई को अपने झुंड से बिछड़ गया लेकिन अभ्यारण्य के प्रयासों के कारण 41 दिनों के बाद इस बच्चे को उनके झुंड से मिला दिया गया और हाथियों के बारे में सालों से चली आ रही धारणा ग़लत साबति हो गई. वन्यप्राणी विशेषज्ञ इस घटना को चमत्कार से कम नहीं मान रहे हैं. वाइल्ड लाईफ ट्रस्ट ऑफ इंडिया के अध्यक्ष अशोक कुमार ने कहा कि ऐसी घटनाएं विरले ही होती हैं. वाइल्ड लाइफ सोसाइटी ऑफ इंडिया के सचिव विश्वजीत मोहंती के अनुसार वह एक आध ऐसे किस्से ज़रूर जानते हैं जब हाथियों के झुंड ने बिछडने के कुछ घंटों के भीतर उसे वापस झुंड में जगह दी हो लेकिन पूरे 41 दिनों बाद किसी बिछडे़ हाथी की झुंड में वापसी निःसंदेह एशिया में एक अनोखी घटना है. बिछड़ना और पुनर्मिलन गत छह मई को हाथी का यह बच्चा भुवनेश्वर के निकट कृषि विश्विद्यालय के पास एक गड्ढे में गिरकर अपने झुंड से बिछड़ गया था. वन अधिकारियों ने उसे गड्ढे से निकालकर चिलु नाम के एक प्रशिक्षित महावत की देखरेख में रख दिया. जहां हाथी को कलिंग नाम दिया गया. पुनर्मिलन के इस निराले घटनाक्रम को बहुत क़रीब से देखने वाले वाइल्ड लाईफ ट्रस्ट ऑफ इंडिया के वरिष्ठ अधिकारी संदीप तिवारी बताते हैं कि 16 जून को जब हाथियों का झुंड कलिंग से सिर्फ 200 मीटर दूर था तभी उसने झुंड का ध्यान आकर्षित करने के लिए ऊंची आवाज़े निकालनी शुरू कर दीं.
कुछ ही देर में एक मादा हाथी आवाज की दिशा में बढ़कर कलिंग के पास आ गई और उसे सूंघने और पुचकारने लगी. चंद्रका के वन अधिकारी अक्षय पटनायक ने बताया कि सभी को इस घड़ी का बेसब्री से इंतज़ार था लेकिन इसके साथ साथ वह इस बात को लेकर काफी दुविधा में थे कि झुंड कलिंग को वापस लेगा या नहीं. यही कारण था कि कुछ वन अधिकारियों को झुंड की निगरानी में लगाया गया. और अगले दिन शाम पौने चार बजे कलिंग को झुंड में अपनी माँ का दूध पीते देख़ा गया. हालांकि यह सब कुछ इतना आसान नहीं था. वन विभाग अधिकारियों ने इससे पहले कलिंग को मई माह के अंत में अभयारण्य के भरतपुर इलाके में इस उम्मीद में छोड़ा था कि उधर से गुजर रहा 18 सदस्यीय हाथियों का दल शायद उसे अपने साथ ले लेगा. दल कलिंग से मात्र दो सौ मीटर की दूरी से होकर गुज़र गया.इसके बाद 11 और 12 जून को भी ऐसी ही कोशिशें की गईं जो नाका़म रहीं थी. चिलु का दुःख कलिंग की घर वापसी से सभी के चेहरे खिले नज़र आए लेकिन एक व्यक्ति ऐसा भी है जिसका चेहरा उतरा हुआ था. वह था छह हफ्तों तक कलिंग की देखरेख करने वाला महावत चिलु. अपनी निराशा को छिपाते हुए चिलु कहता है कि कलिंग उसके बेटे जैसा था और उसे इस बात की खुशी है कि वह जंगल में खुश रहेगा. हालांकि उसे इस बात की चिंता है कि 40 दिनों तक लैक्टोजेन पीकर रहने वाले कलिंग को कहीं ख़ाने पीने में परेशानी न हो. | इससे जुड़ी ख़बरें हाथी भगाने के लिए मिर्ची बम08 जून, 2005 | भारत और पड़ोस जंगली हाथियों पर नियंत्रण की कोशिश02 सितंबर, 2005 | भारत और पड़ोस हाथियों से परेशान है छत्तीसगढ़20 नवंबर, 2005 | भारत और पड़ोस अब हाथियों के लिए 'परिवार नियोजन'16 सितंबर, 2006 | भारत और पड़ोस मुंबई के हाथियों में लगेंगे माइक्रोचिप08 अक्तूबर, 2006 | भारत और पड़ोस हाथी पोलो को हरी झंडी मिली16 नवंबर, 2006 | भारत और पड़ोस असम में मारा गया 'लादेन'15 दिसंबर, 2006 | भारत और पड़ोस महावत को मिला हाथी की मौत का मुआवजा21 दिसंबर, 2006 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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