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जंगली हाथियों पर नियंत्रण की कोशिश | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
पूर्वोत्तर भारत के राज्य असम में जंगली हाथियों के नियंत्रण के लिए कुंकी के नाम से जाने जाने पालतू हाथियों की मदद ली जा रही है. असम में उग्र हाथियों के झुंड एक बड़ी समस्या है और हर साल अनेक लोग अपनी जान खो देते हैं. विशेषज्ञों ने उग्र हाथियों को पालतू हाथियों से घेर कर उन्हें रास्ते पर लाने की कोशिश की है. सबसे अधिक प्रभावित ज़िले में इस रणनीति को अपनाया गया, वहाँ हाथियों की हिंसा से मरनेवालों की संख्या आधी हो गई. वन अधिकारी जंगली हाथियों के झुंड को गतिविधियों पर नज़र रखते हैं और उनको पालतू हाथियों से घेर कर गाँव से दूर रखते हैं. इस योजना को वर्ल्ड वाइल्डलाइफ़ फंड से समर्थन हासिल है.यह रणनीति सबसे पहले ब्रह्मपुत्र नदी के किनारे स्थित असम के सोनितपुर ज़िले में अपनाई गई. सन 2000 से हर साल 25 से 30 लोग जंगली हाथियों के शिकार हो जाते हैं. ज़िले के अधिकारियों का कहना है कि जब से इन पालतू हाथियों की मदद ली गई है तब से इनके शिकार लोगों की संख्या आधी हो गई है. असम के वन विभाग ने वर्ल्ड वाइल्डलाइफ़ फंड की मदद से पालतू हाथियों का एक दल बनाया है जो इसी काम में लगा है. असम के वन मंत्री प्रद्युत बोरदोलोई का कहना है कि वन अधिकारियों ने ऐसे 50 दल बनाए गए हैं और इसमें महावत और सर्चलाइट और तेज़ आवाज़ उत्पन्न करनेवाले उपकरण शामिल हैं. इसके पहले वन्य विशेषज्ञों ने जंगली हाथियों को दूर रखने के लिए तार लगाने और मिर्ची बम प्रणाली स्थापित करने की भी कोशिश की थी. पूर्वोत्तर भारत में जंगली हाथी अच्छी-ख़ासी संख्या में पाए जाते हैं और अकेले असम में इनकी संख्या 5000 से अधिक बताई जाती है. लेकिन जैसे-जैसे असम में लोगों की आबादी बढ़ती गई, लोगों ने ऐसे इलाक़ों में पाँव पसारने शुरू कर दिए जो हाथियों के आने-जाने की जगह थी. सैटेलाइट से मिली तस्वीरें ये बताती हैं कि असम में 1996 से 2000 के बीच जंगल की लगभग तीन लाख हेक्टेयर ज़मीन ग्रामीणों ने हथिया ली. |
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