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हाथियों के ख़ौफ़ से बेहाल झारखंड के गाँव | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
जंगली हाथियों के झुंड झारखंड के संथाल परगना इलाक़े में बड़े पैमाने पर तबाही मचा रहे हैं. इंसानों और जानवरों में छिड़े इस युद्ध के कारण संथाल परगना में सैकड़ों लोग हाथियों के पैरों तले कुचल कर मारे जा रहे हैं. हजारों एकड़ में फैली फ़सलें बरबाद हो रहीं हैं और दहशतज़दा लोग हाथियों के आतंक के साए में ज़िंदगी गुज़ार रहे हैं. संथाल परगना प्रमंडल के लगभग पचास हज़ार परिवार हाथियों के आतंक से सीधे तौर पर प्रभावित हैं. यूँ तो झारखण्ड के अधिकांश इलाकों में जंगली हाथियों का आतंक है- मसलन पूर्वी और पश्चिमी सिंहभूम, चतरा, पलामू, गढ़वा और रामगढ़ ज़िले भी हाथियों का प्रकोप झेल रहे हैं. मगर सबसे ज्यादा अगर कोई इस आतंक का दंश झेल रहा है तो वह हैं संथाल परगना के सुदूर ग्रामीण इलाकों में रहने वाले लोग. दरअसल, 1999 तक हाथियों के विचरण करने का इलाका यानी 'कॉरिडोर' सुरक्षित था जहाँ से हाथियों के झुंड दूसरे राज्यों के जंगलों में चले जाया करते थे और फिर वहाँ से वापस झारखंड चले आते थे, इसलिए उनके झुंड कभी ग्रामीण इलाकों में नहीं जाया करते थे. संथाल परगना में हाथियों के आतंक से प्रभावित ग्रामीणों के बीच काम कर रहे सामजिक संगठन एग्रेरियन एसोसिएशन के सत्येंद्र सिंह कहते हैं, "झारखंड के गठन के बाद से ही यहाँ सब कुछ उल्टा पुल्टा हो गया. आबादी बढ़ने लगी. जंगल कटने लगे और हाथियों का 'कॉरिडोर' प्रभावित हो गया. यही कारण है कि हाथियों के झुंड गाँव में घुस रहे हैं." दिनों दिन हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं. शायद ही कोई ऐसी रात हो जिस रात हाथियों के झुंड ने किसी गाँव पर हमला न बोला हो. सुबह होते ही गाँव के लोग वन विभाग के कार्यालय की तरफ़ मुआवज़े के लिए डेरा डाल देते हैं. मगर ऐसा नहीं है कि सबको मुआवज़ा मिले. बहुत सारे ऐसे ग्रामीण हैं जो पिछले कई सालों से वन विभाग के चक्कर लगाकर थक गए हैं और उन्हें मुआवजे के नाम पर एक फूटी कौड़ी भी नहीं मिली. दुमका के सहायक वन संरक्षक प्रमोद अग्रवाल यह तो मानते हैं कि इंसान और जानवरों के बीच चल रहे तनाव के कारण स्थिति काफ़ी गंभीर होती जा रही है. मगर वह यह नहीं मानते हैं कि उनका विभाग मुआवज़ा देने में आनाकानी करता है. वह कहते हैं, "जब भी किसी गाँव में हाथियों का हमला होता है तो हम उसकी जांच करवाते हैं और नुकसान के हिसाब से मुआवजा दिया जाता है." वन अधिकारियों के दावे के विपरीत ज्यादातर स्थानों पर लोगों ने बताया कि उन्हें वन विभाग की ओर से कोई मुआवज़ा नहीं मिला है. हक़ीकत संथाल परगना का दौरा करते हुए मैं दुमका जिले के रामगढ प्रखंड से होता हुआ गुज़र रहा था. तभी पता चला कि दुमका-रामगढ़ मार्ग पर कुछ ग्रामीण धरना दे रहे थे.
वे मांग कर रहे थे की हाथी भगाने वाले विशेषज्ञों के दल को बुलाया जाए और झुंड को वहाँ से कहीं और भगाया जाए. ग्रामीणों ने बताया कि पिछली रात कितनी खौफनाक थी और उन लोगों नें किस तरह हाथियों के झुंड से मुकाबला किया. गाँव के अधिकांश घर तहस नहस हो गए और हाथियों ने गाँव में रखा सारा अनाज खा लिया. गाँव वालों नें बताया कि जिस वक्त हाथियों का झुंड हमला कर रहा था तो उन लोगों नें वन विभाग से मदद की गुहार लगाई थी. मगर विभाग की तरफ़ से कोई नहीं पहुंचा और पूरी रात जाग कर ग्रामीणों ने किसी तरह झुंड को अपने गाँव से भगाया. मगर तब तक तबाही मच चुकी थी. एक गाँव से लोग हाथियों के झुंड को भगाते हैं और झुंड दूसरे गाँव में घुस जाता है फिर वहाँ से भगाया जाता है और झुंड किसी और गाँव में घुस कर तबाही मचाता है. संथाल परगना के सुदूर ग्रामीण इलाकों में लोग कभी न ख़त्म होने वाली दहशत भरी रातों के बीच जीने की आदत डाल रहे हैं. रात रात भर मशाल और आज जला कर रतजगा, दिन भर कड़ी मेहनत और हर समय खौफ़, शायद यही यहाँ के लोगों की नियति बन गई है. कमाल की बात यह है कि इस राज्य में ऐसा कोई विशेषज्ञों का दल नहीं है जो ज़रूरत पड़ने पर हाथियों के झुंड को भगा सके. इस काम के लिए विभाग पूरी तरह पश्चिम बंगाल पर आश्रित है. |
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