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ज़मीन वापसी के विरोध में 'जम्मू बंद' | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
जम्मू-कश्मीर में अमरनाथ मंदिर बोर्ड को आवंटित की गई विवादित भूमि वापस देने की पेशकश का विरोध शुरू हो गया है. भारतीय जनता पार्टी सहित राज्य के कई हिंदूवादी और सामाजिक संगठनों ने इस पेशकश के विरोध में सोमवार को जम्मू बंद का आहवान किया है. बंद का आहवान करने वालों में विश्व हिंदू परिषद, बजरंग दल, शिवसेना, पैंथर्स पार्टी, अधिवक्ताओं के संगठन और कुछ अन्य सामाजिक संगठन भी शामिल हैं. रविवार को ही लगभग एक सप्ताह लंबे विरोध के बाद अमरनाथ मंदिर बोर्ड ने वो ज़मीन वापस करने की पेशकश की है जो राज्य सरकार ने उसे दी थी. राज्य में कई राजनीतिक दल और संगठन वन्य भूमि को मंदिर बोर्ड के नाम आवंटित किए जाने का विरोध कर रहे थे. नौबत यहाँ तक आ गई थी कि कांग्रेस के नेतृत्ववाली राज्य की गठबंधन सरकार से प्रमुख घटक पीडीपी ने समर्थन तक वापस ले लिया था. पर रविवार को अमरनाथ यात्रा की ज़िम्मेदारी राज्य सरकार ने अपने ज़िम्मे लेने की पेशकश की थी जिसके बाद साफ़ हो गया था कि अब विवादित भूखंड वन विभाग को वापस कर दिया जाएगा. आरोप-प्रत्यारोप भूमि वापसी की पेशकश का विरोध करनेवाले संगठनों ने राज्यपाल पर आरोप लगाया है कि उन्होंने राज्य के मुस्लिम कट्टरवाद के आगे घुटने टेक दिए हैं.
विरोधियों का कहना है कि सरकार की ताज़ा पेशकश के अमलीजामा पहनते ही अमरनाथ मंदिर बोर्ड का अस्तित्व की ख़त्म हो जाएगा जो कि ग़लत है. यह भी कहा जा रहा है कि नियमानुसार राज्यपाल को यह हक़ नहीं है कि वो अपने स्तर पर ही ज़मीन वापसी का फ़ैसला ले लें. इसके लिए एक क़ानूनी प्रक्रिया है और उससे भी पहले बोर्ड के सदस्यों के साथ सम्मिलित रूप से इस मुद्दे पर बातचीत होनी चाहिए थी. पिछले दिनों राज्य में इस बात को लेकर ज़ोरदार विरोध प्रदर्शन होता रहा कि किस वजह से वन क्षेत्र की ज़मीन को राज्य सरकार ने मंदिर बोर्ड के नाम आवंटित कर दिया. इसके विरोध में हिंसक प्रदर्शन होते रहे और इस दौरान कई लोग हताहत भी हुए. सरकार की मुश्किलें पहले भूमि आवंटन का विरोध झेल रही सरकार अब ज़मीन वापसी पर भी विरोध देख रही है. और तो और, भूमि आवंटन पर सरकार को आड़े हाथों लेने वाले राजनीतिक दल भी अभी तक शांत नहीं बैठे हैं. पीडीपी और नेशनल कांफ़्रेंस ने स्पष्ट तौर पर कहा है कि सरकार इस मुद्दे पर केवल घोषणा करने के बजाय औपचारिक रूप से भूमि वापसी की व्यवस्था करे. पृथकतावादी नेता सैय्यद अली शाह गीलानी ने तो सरकार की कोशिशों को खोखला करार देते हुए इन्हें ज़ुबानी बातें बताया है और एक तरह का फ़रेब है. सरकार ऐसा केवल टरकाने के लिए कह रही है इसलिए विरोध जारी रहेगा. |
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