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नेपाली राजशाही का इतिहास | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
ईसा से कोई 1000 साल पहले नेपाल का यह क्षेत्र छोटी-छोटी रियासतों और कुलों के परिसंघों में बंटा हुआ था लेकिन मध्यकाल के रजवाड़ों की सदियों से चली आ रही प्रतिद्वंद्विता को समाप्त करने का श्रेय जाता है गोरखा राजा पृथ्वी नारायण शाह को. राजा पृथ्वी नारायण शाह ने 1765 में नेपाल की एकता की मुहिम शुरू की और 1768 तक इसमें सफल हो गए. यहीं से आधुनिक नेपाल का जन्म होता है. फिर शाह राजवंश के पाँचवे राजा राजेंद्र बिक्रम शाह के शासन काल में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने नेपाल की सीमा के कुछ इलाक़ों पर क़ब्ज़ा किया तो 1815 में लड़ाई छिड़ गई जिसका अंत सुगौली संधि से हुआ. नेपाल के राजपरिवार में गुटबाज़ी बढ़ी तो अस्थिरता पैदा हुई. 1846 में राजा सुरेंद्र बिक्रम शाह के शासन काल में, जंग बहादुर राणा एक शक्तिशाली सैन्य कमांडर के रूप में उभरे. उनके प्रभाव को कम करने के लिए रानी ने षड़यंत्र रचा, भयंकर लड़ाई हुई, रानी के सैकड़ों समर्थक मारे गए और जंग बहादुर राणा और ज़्यादा शक्तिशाली होकर उभरे. इसके बाद राजपरिवार उनकी शरण में चला गया और प्रधानमंत्री पद वंशानुगत हो गया. राणा परिवार अंग्रेज़ों का समर्थक था. उसने भारत में हुई 1857 की क्रांति में विद्रोहियों के ख़िलाफ़ अंग्रेज़ों का साथ दिया था. इसलिए 1923 में ब्रिटेन और नेपाल के बीच एक संधि हुई जिसके अधीन नेपाल की स्वतंत्रता को स्वीकार कर लिया गया. 1940 के दशक में नेपाल में लोकतंत्र समर्थक आंदोलन की शुरुआत हुई और राजनीतिक दल राणा तानाशाही की आलोचना करने लगे. भारत की चिंता इस बीच चीन ने तिब्बत पर क़ब्ज़ा किया तो भारत को चिंता हुई कि चीन के हाथ कहीं नेपाल तक न पहुँच जाएँ. तब भारत की सहायता से राजा त्रिभुवन बीर बिक्रम शाह को नया शासक घोषित किया गया और नेपाली कॉंग्रेस पार्टी की सरकार बनाई गई.
लेकिन राजा और सरकार के बीच सत्ता को लेकर खींच-तान चलती रही. सन 1959 में राजा महेंद्र बीर बिक्रम शाह ने लोकतांत्रिक प्रयोग को समाप्त कर पंचायत व्यवस्था लागू की. सन 1972 में राजा बीरेंद्र बिक्रम शाह ने राजकाज सँभाला. सन 1989 में एक बार फिर लोकतंत्र के समर्थन में जन आंदोलन शुरु हुआ और राजा बीरेंद्र बीर बिक्रम शाह को सांवैधानिक सुधार स्वीकार करने पड़े. फिर मई 1991 में पहली बहुदलीय संसद का गठन हुआ. उधर 1996 में माओवादी आंदोलन शुरू हो गया. एक जून 2001 को नेपाल के राजमहल में हुए सामूहिक हत्या कांड में राजा, रानी, राजकुमार और राजकुमारियाँ मारे गए. उसके बाद राजगद्दी संभाली राजा के भाई ज्ञानेंद्र बीर बिक्रम शाह ने. फ़रवरी 2005 में राजा ज्ञानेंद्र ने माओवादियों के हिंसक आंदोलन का दमन करने के लिए सत्ता अपने हाथों में ले ली और सरकार को बर्ख़ास्त कर दिया. नेपाल में एक बार फिर जन आंदोलन शुरू हुआ और अंततः राजा को सत्ता जनता के हाथों में सौंपनी पड़ी और संसद को बहाल करना पड़ा. संसद ने एक विधेयक पारित करके नेपाल को धर्मनिरपेक्ष राज्य घोषित किया. 2007 में सांवैधानिक संशोधन करके राजतंत्र समाप्त कर दिया गया और नेपाल को संघीय गणतंत्र बना दिया. नेपाल के राजपरिवार के भारत से संबंध रहे हैं. राजा त्रिभुवन बीर बिक्रम शाह की पत्नी भारत के एक ठाकुर परिवार की थीं और उन्होंने अपनी सभी बेटियों की शादियाँ भारत के परिवारों में कीं. वर्तमान राजा ज्ञानेंद्र के पुत्र पारस की पत्नी हिमानी राजस्थान के सीकर राजपरिवार से हैं. | इससे जुड़ी ख़बरें राजशाही ख़त्म करने पर चर्चा28 मई, 2008 | भारत और पड़ोस काठमांडू में रैलियों पर प्रतिबंध26 मई, 2008 | भारत और पड़ोस भूटानी निर्वासितों ने माँगे अधिकार13 मई, 2008 | भारत और पड़ोस राजशाही ख़त्म करने की तारीख़ तय12 मई, 2008 | भारत और पड़ोस महिला प्रदर्शनकारियों पर गिरी गाज11 मई, 2008 | भारत और पड़ोस प्रचंड और राजा ज्ञानेंद्र की मुलाक़ात होगी07 मई, 2008 | भारत और पड़ोस 'हमारी जीत उभरते साम्यवाद का संकेत'04 मई, 2008 | भारत और पड़ोस अमरीका का माओवादियों से संपर्क 02 मई, 2008 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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