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भूटानी निर्वासितों ने माँगे अधिकार | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
निर्वासितों का नेतृत्व कर रहे तीन भूटानी गुटों ने राजा जिग्मे केसर नांग्याल को चेतावनी दी है कि अगर उन्होंने अपने नेपालीभाषी निर्वासितों को वापस नहीं लिया और मताधिकार न दिया तो वहाँ नेपाल की तरह ही अशांति फैल सकती है. उन्होंने कहा है कि यदि ऐसा नहीं हुआ तो उनकी आवाज़ 'ज्वालामुखी बनकर फूट पड़ेगी'. भूटान के हज़ारों नेपालीभाषी लोगों ने 1990 के दशक में अपना देश छोड़ दिया था. उनकी शिकायत थी कि जब उन्होंने राजशाही के अनुसार भूटानी तौर तरीक़ों को अपनाने से इनकार किया तो उन्हें प्रताड़ित किया गया. इनमें से बहुत से लोग नई शुरूआत करने के लिए अमरीका में जा बसे हैं लेकिन बाक़ी हज़ारों लोग अब भी पूर्वी नेपाल में स्थित उन शिविरों में रह रहे हैं जहाँ वे भूटान से आने के बाद रहते थे. गठबंधन भूटान पीपल्स पार्टी, द ड्रक नेशनल कांग्रेस और द भूटान गोरखा नेशनल लिबरेशन फ़्रंट ने मिलकर ‘नेशनल फ़्रंट फ़ॉर डेमोक्रेसी इन भूटान’ (एनएफ़डीबी) गठबंधन बनाया है.
एनएफ़डीबी ने भूटान के नए राजा जिग्मे केसर नांग्याल को एक संयुक्त ज्ञापन भेजकर भूटान में प्रजातंत्र की प्रक्रिया की शुरूआत करने पर बधाई दी है. साथ ही उन्हें चेतावनी भी दी है कि अगर उन्होंने निर्वासितों को भूटान वापस लौटने की अनुमति और वोट देने का अधिकार नहीं दिया तो वहाँ भी नेपाल की तरह अशांति पैदा हो सकती है. ज्ञापन में यह भी आरोप लगाया गया है कि पिछले दिनों भूटानी संसद के लिए हुए चुनाव के दौरान नेपाली मूल के हज़ारों भूटानी नागरिकों को वोटर की तरह पंजीकृत नहीं किया गया. राजशाही से प्रजातंत्र ज्ञापन के अनुसार, "भूटान कैसे एक प्रजातंत्र हो सकता है जहाँ हज़ारों भूटानी निर्वासित नागरिकों को प्रजातांत्रिक प्रक्रियाओं से बाहर कर दिया जाता हो और कथित रूप से आवश्यक सुरक्षा कारणों के नाम पर देश में रह रहे क़रीब 80 हज़ार नागरिकों को मताधिकार से वंचित कर दिया जाता हो." आरोप लगाया गया है कि यदि विभिन्न अल्पसंख्यक समुदायों के मुद्दों को सामने लाया जाए तो भूटान कभी भी स्थिर प्रजातंत्र नहीं रह सकेगा. भूटान की राष्ट्रीय संसद के निचले सदन के लिए मार्च में हुए चुनाव में देश की सिर्फ़ दो ही पार्टियों डीपीटी (भूटान यूनाइटेड पार्टी) और पीडीपी ने ही हिस्सा लिया था और इस चुनाव के साथ ही भूटान एक राजशाही से प्रजातांत्रिक देश बन गया. इन पार्टियों में से डीपीटी ने चुनाव जीता और सरकार बनाई लेकिन दोनों ही दलों ने राजा के प्रति अपनी प्रतिबद्धता का वचन दिया है. | इससे जुड़ी ख़बरें भूटान के पहले ही चुनाव विवादों में02 अप्रैल, 2008 | भारत और पड़ोस 'भूटान यूनाइटेड पार्टी चुनाव जीती'24 मार्च, 2008 | भारत और पड़ोस अमरीका में बसेंगे भूटानी शरणार्थी07 नवंबर, 2007 | पहला पन्ना लोकतंत्र की तरफ पहला क़दम31 दिसंबर, 2007 | भारत और पड़ोस भूटानी शरणार्थियों के ख़िलाफ कार्रवाई30 मई, 2007 | भारत और पड़ोस भूटान में राष्ट्रीय चुनावों का अभ्यास21 अप्रैल, 2007 | भारत और पड़ोस भूटान नरेश ने राजगद्दी छोड़ी15 दिसंबर, 2006 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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