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अमरीका में बसेंगे भूटानी शरणार्थी | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
नेपाल में शरणार्थियों के तौर पर जीने को मजबूर भूटानी लोगों से पूछा जा रहा है कि क्या वो अमरीका में जाकर बसना चाहेंगे. 1990 के दशक से लगभग एक लाख लोग नेपाल के कैंपों में रह रहे हैं. ये लोग नेपाली मूल के हैं और अधिकतर हिंदू हैं. अमरीका ने पेशकश की है कि इनमें से 60 हज़ार लोगों को वो शरण दे सकता है और इसके लिए इंटरव्यू लेने की प्रक्रिया अगले हफ़्ते से शुरू हो जाएगी. वैसे कई और देशों ने भी कुछ शरणार्थियों को जगह देने के लिए हामी भरी है. वापसी का रास्ता ये शरणार्थी राजधानी काठमांडू से 500 किलोमीटर दूर दक्षिणपूर्वी नेपाल में संयुक्त राष्ट्र के शिविरों में रह रहे हैं. शरणार्थियों का मुद्दा नेपाल और भूटान के बीच तनाव का कारण रहा है और इस विषय पर दोनों देशों के बीच कई दौर की बातचीत हो चुकी है. समाचार एजेंसी एपी के अनुसार भूटान का प्रशासन नेपाल में रह रहे इन शरणार्थियों को वापस लेने को तैयार नहीं है. उसका तर्क है कि ये लोग अपनी मर्ज़ी से भूटान छोड़कर गए हैं और उन्होंने अपनी नागरिकता छोड़ दी है. संयुक्त राष्ट्र ने दूसरी अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के साथ मिलकर इन शरणार्थियों के पुनर्वास की कोशिश की है. इसके बाद अमरीका 60 हज़ार शरणार्थियों को बसाने के लिए तैयार हुआ है. इनमें से 15 हज़ार वर्ष 2008 में वहाँ जाएँगे और इसके बाद हर साल 20-20 हज़ार. अमरीका के अलावा ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, डेनमार्क, नीदरलैंड्स, न्यूज़ीलैंड और नॉर्वे ने भी कुछ शरणार्थियों को अपने यहाँ जगह देने में दिलचस्पी दिखाई है. नेपाल में बीबीसी संवाददाता का कहना है कि इनमें से कई लोग तो अमरीका जाना चाहते हैं लेकिन कुछ अब भी वापिस भूटान लौटने का सपना संजोए बैठे हैं. | इससे जुड़ी ख़बरें बर्मा से पलायन कर रहे हैं चिन आदिवासी23 अक्तूबर, 2007 | भारत और पड़ोस पाकिस्तान में मुहाजिरों का दर्द01 सितंबर, 2007 | भारत और पड़ोस भूटानी शरणार्थियों के ख़िलाफ कार्रवाई30 मई, 2007 | भारत और पड़ोस पाकिस्तान बंद कर रहा है शरणार्थी शिविर07 अगस्त, 2005 | भारत और पड़ोस अफ़ग़ान शरणार्थियों पर महत्वपूर्ण बैठक16 फ़रवरी, 2005 | भारत और पड़ोस | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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