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पाकिस्तान में मुहाजिरों का दर्द | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
विभाजन को साठ साल हो गए हैं लेकिन बँटवारे का दर्द किसी न किसी रूप में यहाँ आज भी महसूस किया जा सकता है. बँटवारे के बाद अपने लिए एक अलग देश का सपना आँखों में लिए मुसलमानों का पाकिस्तान पलायन हुआ. ये लोग भारत में अपना सार घर-बार छोड़कर पाकिस्तान आए थे लेकिन पाकिस्तान में इन उर्दूभाषी लोगों को मुहाजिर कहा गया और इनमें से बहुत सारे लोग जिस हालत में आए थे आज भी उसी हालत में कराची की मैली-कुचैली गलियों में जीवन बिता रहे हैं. लगभग 50 फ़ीसदी मुहाजिर मुफ़लिसी की हालात में कराची तथा सिंध में रहते हैं. साठ साल बीत जाने बाद भी उनकी स्थिति में कोई बदलाव नहीं आया है. ग़रीबी से जूझते ये लोग बड़ी संख्या में कराची के गुज्जर नाला, ओरंगी टाउन, अलीगढ़ कॉलोनी, बिहार कॉलोनी और सुर्जानी इलाकों में रहते हैं. सरकारी आंकड़ों के अनुसार पाकिस्तान की आबादी लगभग 16.5 करोड़ है. जिसमें मुहाजिरों की संख्या लगभग आठ प्रतिशत है. ये वो लोग हैं जो विभाजन के समय पाकिस्तान आए थे. इसके अलावा 44.68 फ़ीसदी पंजाबी, 15.42 फ़ीसदी पश्तून, 14.1 फ़ीसदी सिंधी, 10.53 फ़ीसदी सिरायकी, 3.57 फ़ीसदी बलोच तथा 4.66 फ़ीसदी अन्य समुदाय हैं. विभाजन की पीड़ा कराची के गुज्जर नाले के निवासी और भारतीय शहर कानपुर से आए, 78 साल के मोहम्मद अनवर बँटवारे के दर्द को याद करते हुए कहते हैं, “जब हम पाकिस्तान पहुँचे तो पहले हमे थार के मरुस्थल में बनाए गए एक शिविर में रखा गया, जहाँ हम मजबूरी में ट्रेन के भापइंजन से निकला गरम पानी पीते थे." अनवर का कहना था, “हम किस तकलीफ़ से गुजरे हैं यह शायद इस युवा पीड़ी को नहीं मालूम होगा. हमने कई मंज़र देखे हैं जिसमें बँटवारे के दौरान दंगों में हमारे अजीज़ हमसे बिछड़ गए.”
अनवर ने बताया कि कानपुर में घर, ज़मीन, जो भी था सब कुछ छोड़कर केवल एक चादर लिए पाकिस्तान आए थे. मुआवज़े में सरकार की ओर से कुछ भी नहीं मिला. मुआवज़े में घर या संपत्ति उन्हीं को मिली जिनके आगे-पीछे कोई हाथ था. या जिन्होंने लूटा उनको ही सब मिला.” मोहम्मद अनवर ने कहा, “हम तो इस्लाम का झंडा लेकर अए थे और सोचा था कि मुसलमानों के लिए एक अलग देश बन रहा है तो कुछ सुख की सांस लेंगे पर यहाँ तो तकलीफ़ ही तकलीफ़ हैं”. बँटवारे के समय जब मोहम्मद अनवर ने कानपुर छोड़ा था तब उन की उम्र 17 साल थी, और फिर ग़रीबी के कारण उन्हें कानपुर लौटना नसीब नहीं हुआ. उन्होंने बताया, “भारत जाने के लिए इतने साधन नहीं हैं, पेट की चिंता करें या अपने मादरे-वतन कानपुर देखने की. दिल तो बहुत करता है, पर क्या करें, ग़रीबी ने दीवार सी खड़ी कर दी है.” उत्तर प्रदेश के शाहजहाँपुर से आए, 72 वर्षीय अयूब अली का कहना था, “शाहजहाँपुर में घर छोड़ा ज़मीन छोड़ी, पर यहाँ आने के बाद भी फ़क़ीर ही रहे. न किसी ने सिर छिपाने को जगह दी और न ही किसी ने कोई मदद की. बँटवारे के बाद से आज तक धक्के खा रहे हैं.” आख़िरी इच्छा गुज्जर नाले के ही रहने वाले अयूब अली ने कहा कि पाकिस्तान में सारी उम्र तकलीफ़ में गुज़री है, "मन करता है कि भारत जाकर आख़िरी दिन वहीं पर ही गुज़ारूँ. बँटवारे के बाद फ़िर कभी मुड़कर भी अपने शाहजहाँपुर को नहीं देखा, अब तो मन में एक ही अरमान है कि शाहजहाँपुर जाऊँ और वहीं पर ही मौत आ जाए.”
अयूब का कहना है, "पाकिस्तान में हमारी युवा पीढ़ी के लिए कोई रोज़गार की सुविधा उपलब्ध नहीं है. हमारे नौजवान सारा दिन गलियों में घूमते रहते हैं. सरकार को चाहिए कि उन्हें कम से कम कोई नौकरी तो दे." इन मैली-कुचैली गलियों में इधर-उधर चक्कर लगाने वाले अधिकतर नौजवान भारतीय फ़िल्मी हीरो, हीरोईनों के प्रशंसक हैं. एक नौजवान, आसिफ़ ने कहा कि उन्हें शाहरुख़ ख़ान बहुत पसंद हैं और वह भारत जाकर फ़िल्मों में काम करना चाहते हैं. आसिफ़ ने बताया, “बीए पास किए दो साल हो गए पर आज तक नौकरी नहीं मिली, सफ़ारिश है नहीं, हम ग़रीब लोग हैं इसलिए गलियों में धक्के खा रहे हैं.” कराची के जाने-माने प्रोफ़ेसर तौसीफ़ अहमद ने बताते हैं कि विभाजन के बाद भारत से पलायन करके आने वाले लोगों में काफ़ी लोग निम्न-मध्यम वर्ग के भी थे. तौसीफ़ अहमद ने कहा कि भारत से आने वाले लोग सांप्रदायिक हिंसा को झेलते हुए पाकिस्तान पहुँचे थे और उनके हाथ में कुछ भी नहीं था लेकिन जिन लोगों को कुछ नहीं मिल सका वह आज तक ग़रीबी में जी रहे हैं. कराची के इन मुहाजिरों की एक पीढ़ी ने जहाँ विभाजन का दर्द और सांप्रदायिक दंगों की पीड़ा झेली तो दूसरी ओर इनकी युवा पीढ़ी आज ग़रीबी से जूझ रही है. | इससे जुड़ी ख़बरें पाकिस्तान: जब-तब पटरी से उतरा लोकतंत्र10 अगस्त, 2007 | भारत और पड़ोस बँटवारे के साए में भारत-पाक संबंध10 अगस्त, 2007 | भारत और पड़ोस 'मात्र दो लोगों ने तय किया विभाजन'12 अगस्त, 2007 | भारत और पड़ोस आज़ादी के 60 बरस: विशेष रेडियो कार्यक्रम14 अगस्त, 2007 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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