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पाकिस्तान की राजनीति किस ओर? | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
पाकिस्तान में सत्तारूढ़ गठबंधन में शामिल मुस्लिम लीग (नवाज़) के चेयरमैन और नवाज़ शरीफ़ ने अपनी पार्टी के सभी मंत्रियों को सरकार से अलग करने का फ़ैसला कर लिया है जिसके फलस्वरूप उनकी पार्टी के सभी मंत्री कैबिनेट से इस्तीफ़ा देंगे. लेकिन इस सारी परेशानी की वजह क्या है? दो बार प्रधानमंत्री रह चुके नवाज़ शरीफ़ कुछ महीने पहले लगे आपातकाल के दौरान बर्ख़ास्त किए गए सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के जजों की बहाली के मुद्दे पर यह रुख़ अपना रहे हैं. पाकिस्तान में हर कोई इस पर सहमत है कि नवंबर 2007 में लगाए गए आपातकाल के दौरान राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ ने जिस तरह से सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के जजों को हटाया था वो पूरी तरह से असंवैधानिक था. खुद परवेज़ मुशर्रफ़ भी यह स्वीकार कर चुके हैं. फ़रवरी 2008 में हुए आम चुनावों के बाद बेनज़ीर भुट्टो की पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी और नवाज़ शरीफ़ की पीएमएल (नवाज़) के बीच सरकार बनाने के लिए इसी बात पर समझौता हुआ था कि लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गई सरकार इन बर्खास्त किए गए जजों को बहाल कर लेगी.
असल मु्द्दा है सुप्रीम कोर्ट के बर्ख़ास्त मुख्य न्यायाधीश इफ़्तिखार चौधरी की बहाली. जिस वक़्त इफ़्तिखार चौधरी सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश थे उस समय पाकिस्तान में परवेज़ मुशर्रफ़ देश की बागडोर संभाले हुए थे. उस दौरान इफ़्तिख़ार चौधरी ने सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के तौर पर अपने फ़ैसलों में पाकिस्तान की सुरक्षा एजेंसी आईएसआई पर ही सवाल खड़े करने शुरू कर दिए थे. इफ़्तिख़ार चौधरी ने कुछ लापता हुए लोगों के मामले की सुनवाई करते हुए आईएसआई से तलब कर लिया था कि ये लापता लोग किस तरह से कथित तौर पर आतंकवादी बताए गए थे. इफ़्तिख़ार चौधरी ने राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ के दोबारा राष्ट्रपति बनाए जाने को चुनौती देने वाले मामलों की भी अदालत में सुनवाई को मंज़ूरी दे दी थी. और यही बात पाकिस्तान की सेना की आँख में सबसे बड़ी किरकिरी साबित हुई. क्या सोचते हैं लोग? नवंबर 2007 में राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ ने पाकिस्तान में आपातकाल लगा कर सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के जजों को बर्ख़ास्त कर दिया था.
वैसे इफ़्तिखार चौधरी के आलोचक कहते हैं कि उन्होंने राजनीति करने की कोशिश की. लिहाज़ा उनको बर्ख़ास्त किया जाना सही है लेकिन, चौधरी के समर्थक मानते हैं कि उन्होंने पाकिस्तान के सैन्य शासन के ख़िलाफ़ खड़े होने की हिम्मत दिखाई थी. इफ़्तिख़ार चौधरी के समर्थकों का कहना है कि अब अगर चौधरी को बहाल किया जाता है तो इससे संकेत मिलेगा कि पाकिस्तान में क़ानून व्यवस्था पूरी तरह आज़ाद है. सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के अध्यक्ष तारिक महमूद मानते हैं, "अगर हमने इफ़्तिखार चौधरी के मामले में समझौता किया तो समझ लीजिए कि हमने अपने उसूलों से समझौता कर लिया." "हम यह कैसे मंज़ूर कर सकते हैं कि आप कुछ जजों की तो बहाली कर दें लेकिन मुख्य न्यायाधीश को बहाल न करें. ये बिल्कुल भी मंज़ूर नहीं होगा." जजो की बहाली फ़रवरी 2008 में हुए आम चुनावों के दौरान इफ़्तिखार चौधरी की दोबारा बहाली एक बड़ा मुद्दा था. पूर्व प्रधानमंत्री और अपनी पार्टी पीएमएल (एन) के चेयरमैन नवाज़ शरीफ़ ने तो जजों की बहाली के मुद्दे पर ही चुनाव लड़ा था. नवाज़ की पार्टी के सांसद अयाज़ आमिर कहते हैं, "ये हमारी पार्टी की साख़ की बात है, हमने लोगों से वादा किया है. हमने पाकिस्तान में एक स्वतंत्र न्यायपालिका देने की बात की है. हम समझौता कैसे कर सकते हैं." नवाज़ शरीफ़ को इस मुद्दे पर पाकिस्तान में काफ़ी समर्थन और वाहवाही भी मिली. नवाज़ की कामयाबी का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के कार्रवाहक अध्यक्ष और बेनज़ीर भुट्टो के पति आसिफ़ अली ज़रदारी को सरकार बनाने के लिए नवाज़ शरीफ़ से हाथ मिलाना पड़ा. नवाज़ शरीफ़ ने सिर्फ़ एक मांग रखी थी और वो ये कि बर्ख़ास्त किए गए तमाम जजों की दोबारा बहाली हो. क्या सोचते हैं मुशर्रफ़? राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ पूर्व मुख्य न्यायाधीश इफ़्तिख़ार चौधरी की बहाली के खिलाफ़ हैं. मुशर्रफ़ को डर है कि चौधरी के फिर से मुख्य न्यायाधीश की कुर्सी पर बैठते ही सुप्रीम कोर्ट उनके फिर से राष्ट्रपति चुने जाने को असंवैधानिक क़रार दे सकता हैं या फिर नवंबर में पाकिस्तान में लगाए गए आपातकाल को भी ग़ैरक़ानूनी क़रार दिया जा सकता है.
नवाज़ शरीफ़ तो कहते हैं कि परवेज़ मुशर्रफ़ पर क़ानूनी तरीके से मुक़दमा चलाकर दोषी ठहराया जाना चाहिए. पाकिस्तान में राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ कमज़ोर दिखाई देते हैं लेकिन वो अब भी कुर्सी छोड़ते दिखाई नहीं देते. सूत्रों के मुताबिक़ परवेज़ मुशर्रफ़ अपने अधिकारों में कटौती करने के लिए तैयार हैं लेकिन वो चाहते हैं कि पाकिस्तान के मुख्य न्यायाधीश के अधिकारों में भी कमी की जाए. राजनीतिक गलियारों में ऐसी चर्चा है कि परवेज़ मुशर्रफ़ की पीठ पर हाथ रखने वाला अमरीका और पाकिस्तानी सेना भी कुछ इसी तरह की व्यवस्था चाहते हैं. क्या चाहती है पीपीपी ? पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (पीपीपी) भी पाकिस्तान में किसी तरह के राजनीतिक संकट का ख़तरा मोल लेना नहीं चाहती. पाकिस्तान की सूचना मंत्री शीरी रहमान कहती हैं, "हम नहीं चाहते कि पाकिस्तान एक बार फिर संवैधानिक संकट में फँस जाए. इससे स्थिरता ही ख़तरे में पड़ेगी." शीरीं रहमान मानती हैं कि ये बदलाव का दौर है और शांतिपूर्ण परिवर्तन से ये मसला भी हल हो जाएगा लेकिन कई लोग मानते हैं कि इसी शांतिपूर्ण परिवर्तन के कारण ही पाकिस्तान में सैन्य शासन के बाद लोकतंत्र क़ायम हुआ है. वैसे लोगों का ये भी मानना है कि ये सारा कुछ पश्चिमी देशों की बनाई गई रणनीति के तहत ही हुआ था और इसी रणनीति के तहत ही बेनज़ीर भुट्टो पाकिस्तान वापस लौटी थीं. क्या कोई सौदा हो गया है ? बेनज़ीर भुट्टो और तत्कालीन सैन्य प्रमुख परवेज़ मुशर्रफ़ के बीच एक सौदा हो गया था जिसके तहत पाकिस्तान की सैन्य सरकार ने भुट्टो पर लगे भ्रष्टाचार के तमाम आरोप वापस ले लिए थे. मुशर्रफ़ ने अपनी सेनाध्यक्ष की वर्दी छोड़ दी थी और पाकिस्तान में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव को मंज़ूरी दे दी गई थी.
वहीं, कुछ लोगों का मानना ये भी है कि आसिफ़ अली ज़रदारी ने राष्ट्रपति मुशर्रफ़ और नवाज़ शरीफ़ से अलग-अलग तरह से बातचीत की है. हालाँकि, आसिफ़ अली ज़रदारी ने बीबीसी को दिए एक इंटरव्यू में कहा था कि जब वो 1990 के दशक में हत्या और भ्रष्टाचार के मामलों में जेल में थे उस समय इफ़्तिखार चौधरी ने उनके ख़िलाफ़ एक अभियान चला रखा था. दूसरी तरफ़, आसिफ़ अली ज़रदारी जजों की बहाली को लेकर कटिबद्ध हैं लेकिन, उन्हें समझ में नहीं आ रहा है कि वो इस परेशानी का हल किस तरह से निकालें. वहीं, परवेज़ मुशर्रफ़ के ख़िलाफ़ आंदोलन जारी रखने वाले वकीलों और सामाजिक कार्यकर्ताओं की नज़र में ये कोई मसला ही नहीं है. दोनों ही मानते हैं कि राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ ने ग़ैरक़ानूनी और असंवैधानिक तरीके से काम किया है लिहाज़ा उन्हें परिणाम भुगतने होंगे. ये मानते हैं कि मुख्य न्यायाधीश ने उसूलों पर आधारित क़दम उठाया था इसलिए उन्हें बहाल किया जाना चाहिए लेकिन राजनीतिक गलियारों में ये चर्चा ज़ोरों पर है कि अब ऊँट किस करवट बैठेगा. ऐसा फ़ैसला करना बड़ा ही मुश्किल होगा जो सभी को मंज़ूर हो. |
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