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पश्चिम की नज़र पाकिस्तान पर | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
पाकिस्तान में आम चुनाव के एकदम बाद जिस तरह पश्चिमी देशों के राजदूत और दूसरे कूटनयिक सक्रिय हुए हैं उसे यहाँ कुछ लोग पाकिस्तान के भीतरी मामलों में दख़लंदाज़ी के तौर पर देख रहे हैं. चुनाव के एक हफ़्ते बाद भी केंद्र सरकार की तस्वीर साफ़ नहीं हो रही है, लेकिन चुनाव जीत कर आई पार्टियों के नेताओं से विदेशी राजदूतों की मुलाक़ातों का सिलसिला जारी है. कुछ पाकिस्तानी कूटनयिक मानते हैं कि पाकिस्तान ने परमाणु हथियारों की वजह से पश्चिमी देश चिंतित हैं और इसीलिए सरकार बनाने की प्रक्रिया में दिलचस्पी ले रहे हैं. पाकिस्तान के पूर्व विदेश सचिव शमशाद अहमद कहते हैं कि कूटनयिकों की ये सक्रियता इस बात को दर्शाती है कि पश्चिमी देश पाकिस्तान की परमाणु ताक़त के कारण चिंतित हैं. उन्होंने बीबीसी से एक बातचीत में कहा कि दुनिया में पाकिस्तान को लेकर दिलचस्पी ही नहीं बल्कि चिंता भी है क्योंकि पाकिस्तान एक परमाणु हथियारों से लैस देश है. उनका कहना है कि पाकिस्तान की स्थिरता में दुनिया अपना भला देखती है. पश्चिम की दिलचस्पी जिस तरह इस्लामाबाद में अमरीका, ब्रिटेन और फ़्रांस जैसे पश्चिमी देशों के राजदूतों की व्यस्तता चुनावों के बाद बढ़ी है उससे कई विश्लेषक संतुष्ट नहीं हैं. पहले पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के संयुक्त अध्यक्ष आसिफ़ अली ज़रदारी ने इस्लामाबाद में अमरीकी दूतावास पहुँचकर अमरीकी राजदूत ऐन डब्ल्यू पैटरसन से मुलाक़ात की. फिर राजदूत पैटरसन पाकिस्तान मुस्लिम लीग (नवाज़) के नेता मियाँ नवाज़ शरीफ़ और सूबा सरहद में जीत कर आई पार्टी अवामी नेशनल पार्टी के नेताओं से मुलाक़ात की. उधर ब्रिटेन के उच्चायुक्त राबर्ट ब्रिंकले भी आसिफ़ ज़रदारी और नवाज़ शरीफ़ से मिले. पाकिस्तान के पूर्व कूटनयिक नज़र अब्बास कहते हैं कि कूटनयिक के तौर पर चौंतीस वर्षों में उन्होंने ऐसा कभी नहीं देखा. उन्होंने कहा कि पश्चिमी देशों की इस सक्रियता को देखते हुए "पाकिस्तानी नागरिक के तौर पर मैं महसूस करता हूँ कि मैं पूरी तरह पाकिस्तानी नागरिक नहीं हूँ." भारत में पाकिस्तान के पूर्व उच्चायुक्त और पूर्व विदेश सचिव रियाज़ खोखर ने बीबीसी को बताया कि अमरीका राष्ट्रपति मुशर्रफ़ को अपना नज़दीकी सहयोगी मानता है और पाकिस्तान की सरकार में वो मुशर्रफ़ की कोई न कोई भूमिका देखना चाहता है. लेकिन पाकिस्तान की सरकार इसे स्वीकार करने को तैयार नहीं है. पाकिस्तान के मतदाताओं ने अपना फ़ैसला सुना तो दिया है, लेकिन सवाल है कि क्या ये फ़ैसला बड़ी ताक़तों को स्वीकार्य होगा? इस सवाल का जवाब अब आने वाले दिनों में ही मिल पाएगा. |
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