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गाह चाहता है मन मोहने वाला नाम | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
क्या होगा अगर पुरानी दिल्ली के लोग दरियागंज की मुख्य सड़क का नाम जनरल परवेज़ मुशर्रफ़ मार्ग रखने की माँग करें? अगर जालंधर के लोग कहें कि वहाँ जनरल ज़िया उल हक़ स्मारक बनाया जाए तो क्या राजनीतिक बवाल नहीं मच जाएगा? आख़िर आप अपने गाँव या शहर की किसी सड़क का नाम एक ऐसे देश के प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति के नाम पर कैसे रख सकते हैं जिससे आपके तीन तीन बार युद्ध हो चुके हों! लेकिन पाकिस्तान की चकवाल तहसील में पड़ने वाले गाह गाँव के लोग इन सब बातों-विवादों से बेपरवाह हैं. वो चाहते हैं कि उनके गाँव का नाम मनमोहनगाह रखा जाए, क्योंकि इसी गाँव में पैदा हुआ, पला-बढ़ा बच्चा अब भारत का प्रधानमंत्री है और गाह के लोग इस बात पर बहुत गर्व करते हैं. उन्हें इस बात से कोई सरोकार नहीं है कि 'दुश्मन देश' के प्रधानमंत्री का नाम अपने गाँव के नाम से जोड़ने का क्या असर होगा. नाम रोशन पड़ोस के भगवाल गाँव में रहने वाले यार मोहम्मद बचपन में उसी स्कूल में पढ़े थे जिसमें मनमोहन सिंह ने शिक्षा हासिल की. यार मोहम्मद कहते हैं, "मैं मनमोहन सिंह को सलाम करता हूँ कि हमारे गाँव का नाम उन्होंने रोशन किया है." जिस प्राइमरी स्कूल में मनमोहन सिंह ने शुरुआती शिक्षा हासिल की वहाँ अब भी गाह गाँव के बच्चे पढ़ने जाते हैं. मनमोहन सिंह के सहपाठी शाह वली को बचपन के दिन साफ़ साफ़ याद हैं. उन्होंने कहा, "मनमोहन सिंह और मैं बहुत गहरे दोस्त थे और एक ही बोरी पर बैठकर पढ़ते थे. स्कूल में बेंच तो अब आई हैं, पहले सब बच्चे बोरियों पर बैठते थे." शाह वली अब सत्तर की उम्र पार कर चुके हैं. उन्हें शिकायत है कि भारत से आने वाले सभी लोग पूछते हैं कि तुम भारत जाना चाहते हो. लेकिन दो साल बीत गए, इससे आगे की बात कोई नहीं करता. मनमोहन सिंह के एक और साथी ग़ुलाम मोहम्मद भी बहुत प्यार से अपने बचपन के दोस्त को याद करते हैं. उन्होंने कहा, "आम बच्चों की तरह ही वो भी स्कूल से छुट्टी होने के बाद गुल्ली डंडा खेलते थे या दूसरे खेल खेला करते थे."
लेकिन फिर बँटवारा हुआ और ग़ुलाम मोहम्मद को पता नहीं चला कि उनका साथी मनमोहन सिंह कहा गया या उसने आगे की पढ़ाई कहाँ की. बँटवारे की याद मनमोहन सिंह के सहपाठी शाह वली की स्मृति में अब भी ताज़ा है. शाह वली कहते हैं, "बँटवारे के समय मैं अंबाला में था. जब गया था बाग़ खिला हुआ था. जब लौट के आया तो बाग़ उजड़ गया." प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की स्मृति में अपने गाँव की पता नहीं कैसी यादें होंगी. लेकिन अगर आज वो इन्हें खोजने अपने पुश्तैनी गाँव पहुँचेंगे तो उन्हें यादों का बाग़ उजड़ा हुआ नहीं बल्कि रिश्तों की गरमाहट से भरा मिलेगा. |
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