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शनिवार, 08 सितंबर, 2007 को 23:28 GMT तक के समाचार
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पाकिस्तान में मलयाली समुदाय

मालाबार मुस्लिम जमीयत
पाकिस्तान में मलयालम भाषी लोग करांची में होटल और पान की दुकानों के लिए जाने जाते हैं
भारतीय राज्य केरल से हज़ारों किलोमीटर दूर पाकिस्तान में रहने वाले मलयाली समुदाय ने कराची में भी अपनी मलयालम भाषा और संस्कृति को जीवित रखा है.

पाकिस्तान के दूसरे समुदायों से अलग-थलग रहने वाले ये मलयाली, कराची में अपने विशेष खाने पीने और पान की दुकानों के लिए भी जाने जाते हैं.

घरों में मलयालम बोलने वाले ये मालाबारी भारत से आए ज़रूर हैं, लेकिन अपने आप को मुहाजिर नहीं मानते. ये लोग मुख्यतौर पर कराची के बलदिया टाउन और मीठादर की कामिल गली में रहते हैं.

अधिकतर मलयाली 1921 में दक्षिण भारत में अंग्रेज़ों के विरुद्ध मोपला विद्रोह छिड़ने के बाद कराची चले गए थे.

मलयाली मूल रूप से व्यापारी थे, और उन्होंने कराची आने के बाद होटल और अन्य कारोबार शुरू किए. आज भी शहर भर में होटल और पान की दुकानों के मालिक मालाबारी हैं.

मालाबार मुस्लिम जमीयत के महासचिव, तारिक़ मसूद ने बीबीसी को बताया कि कराची में इस समय लगभग 20 हज़ार मलयाली रहते हैं और ये सभी पाकिस्तान बनने से पहले ही केरल से करांची आए थे.

योगदान

तारिक़ मसूद, जमीयत महासचिव
तारिक मसूद बताते हैं कि अभी भी बच्चों को मलयालम सिखाया जाता है

तारिक़ मसूद ने कहा, “पाकिस्तान की प्रगति में मालाबारियों का बहुत बड़ा योगदान है. पाकिस्तान बनने के बाद हमारे समुदाय ने क़ायदे आज़ाम मोहम्मद अली जिन्ना को 35 ड्राईवर दिए थे, क्योंकि 1947 में बँटवारे से पहले दूसरे मुसलमानों को ड्राइविंग लाइसेंस जारी नहीं किए जाते थे और केवल मालाबारियों के पास ही ड्राइविंग लाइसेंस थे.”

उन्होंने बताया कि कराची में रहने वाले 95 प्रतिशत मालाबारी व्यापारी हैं और इस समुदाय में साक्षरता दर 100 प्रतिशत है. उन्होंने कहा, “आप जानते हैं कि भारत में केरल सबसे साक्षर राज्य है और इसी कारण हमारी साक्षरता भी अच्छी है.”

तारिक़ ने कहा, “हम अपने घरों में मलयालम बोलते हैं और जमीयत की ओर से नौजवानों को भी अपनी यह मातृभाषा सिखाई जाती है.” उन्होंने बताया कि कराची में मलायालम भाषा और अपनी संस्कृति को बचाने के लिए मालाबार मुस्लिम जमीयत की ओर एक संस्थान खोला जाएगा.

85 वर्षीय मूसा ने बताया, “मैं केरल के कोझीकोड ज़िले से पाकिस्तान आया था और हम घर में मलायालम भाषा ही बोलते हैं, हमारे बच्चे उर्दू और अंग्रेज़ी पढ़ रहे हैं, लेकिन साथ ही मलायालम भी सीख रहे हैं, हम अपनी मातृ भाषा को नहीं भूल सकते.”

खान-पान

करांची में रहने वाले मलयालियों के विशेष आयोजनों और शादी-ब्याहों में बहुत से स्वादिष्ट और चटपटे व्यंजन पकाए जाते हैं लेकिन मालाबारी बिरयानी न हो तो फिर आयोजन में मज़ा नहीं आता.

 मैं केरल के कोझीकोड ज़िले से पाकिस्तान आया था और हम घर में मलायालम भाषा ही बोलते हैं, हमारे बच्चे उर्दू और अंग्रेज़ी पढ़ रहे हैं, लेकिन साथ ही मलायालम भी सीख रहे हैं, हम अपनी मातृ भाषा को नहीं भूल सकते
मूसा, मलयाली नागरिक

मालाबारी होटल के मालिक ग़ुलाम मोहम्मद ने बताया कि मालाबार का खान-पान तो पूरी दुनिया में मशहूर है, और कराची में भी मालाबारी बिरयानी, चमंडी के साथ बहुत पसंद की जाती है.

चमंडी एक प्रकार का सलाद है जो हरी मिर्च, नारियल, अदरक, प्याज़ और लहसुन से तैयार की जाती है.

ग़ुलाम मोहम्मद बताते हैं, “हमारे होटल पर कोकोनट करी, फ़िश फ़्राई, बनाना साग, मसाला दोसा और मालाबारी चाय भी लोग बहुत पसंद करते हैं

फ़िल्में

करांची के किसी भी दूकान पर मलयालम फ़िल्मों की सीडी या कैसेट तो नही मिलेगी लेकिन यहाँ रहने वाले मलयाली अपनी भाषा में फ़िल्में बड़े शौक़ से देखते हैं.

पान बेचने वाले एक नौजवान क़ासिम महमूद ने बताया, “कराची में तो ऐसी कोई दूकान नहीं जहाँ मलयालम फ़िल्मों की सीडी या कैसेट मिलती हो, हम लोग इन्हें दुबई से मंगवाते हैं.” उन्होंने कहा कि जब से उन्होंने मलयालम सीखी है तब से वे इस भाषा की फ़िल्में भी देखते हैं.

महमूद ने कहा, “मलयालम फ़िल्मों ने भारत के बॉलीवुड से अच्छा मुक़ाबला किया है, और आजकल केरल में काफ़ी अच्छी फ़िल्में बन रही हैं.” उन्होंने बताया, “मुझे मलायाली निर्देशक कमाल की फ़िल्में अच्छी लगती हैं और मैंने हाल में उनकी फ़िल्म “करुथापक्षिकल” देखी है जो मेरे मामू दुबई से लाए थे.”

करांची में रहने वाले मलयालियों की जनसंख्या पाकिस्तान के दूसरे समुदायों की तुलना में बहुत ही कम है पर ये लोग अपने स्वादिष्ट और चटपटे खानों, परंपरा और पान की दुकानों के लिए अलग ही पहचाने जाते हैं.

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