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सोमवार, 06 अगस्त, 2007 को 11:32 GMT तक के समाचार
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गांधी के बंदर सुने थे लेकिन कबूतर...

कराची के चौक पर कबूतर
गाँधी और कबूतर दोनों शांति के प्रतीक थे
भारत में बापू जी के कबूतर हों या न हों पर कराची में अनगिनत कबूतर उस जगह पर रहते हैं जहाँ विभाजन से पहले महात्मा गांधी की ऊँची प्रतिमा लगी हुई थी. स्थानीय लोग आज भी उन्हें 'गांधी जी के कबूतर' कहते हैं.

कराची में सिंध उच्च न्यायालय की सुन्दर इमारत और सिंध सरकार कार्यालय के बीच कबूतरों वाले चौक का नाम 'सेक्रेटेरिएट चौक' है. शहर में केवल एक ही चौक है जहाँ इतनी बड़ी संख्या में कबूतर रहते हैं.

चौक पर ही रहने वाले 85 वर्षीय आशिक़ अली ने बताया, "मैं लगभग 15 सालों से इन कबूतरों की सेवा कर रहा हूँ. मुझे कोई इस काम की पगार नहीं देता. गांधी साहब के कबूतरों की सेवा करना मेरा कर्तव्य है. महात्मा गांधी भारत के बहुत बड़े नेता थे, उन्होंने अंग्रेज़ों को यहाँ से भगा दिया.”

आशिक़ अली ने कहा कि जब से महात्मा गांधी की प्रतिमा लगी थी तब से कबूतर यहाँ हैं. पाकिस्तान बनने के बाद उनकी प्रतिमा को हटा दिया गया पर कबूतरों ने इस जगह को कभी नहीं छोड़ा. उन्होंने कहा, “गांधी साहब शांति के प्रतीक थे और कबूतर भी शांति के प्रतीक हैं. गांधी साहब की आत्मा कबूतरों से बात करती होगी इसलिए ये आज तक इधर हैं.”

 मैं लगभग 15 सालों से इन कबूतरों की सेवा कर रहा हूँ. मुझे कोई इस काम की पगार नहीं देता. गांधी साहब के कबूतरों की सेवा करना मेरा कर्तव्य है. महात्मा गांधी भारत के बहुत बड़े नेता थे, उन्होंने अंग्रेज़ों को वहाँ से भगा दिया.
अशिक़ अली, कबूतरों की सेवा करने वाले

आशिक़ ने बताया कि जब वे छोटे थे तो गांधी जी की प्रतिमा को देखने आते थे और कबूतरों को दाना भी डालते थे.

उन्होंने बीते दिनों को याद करते हुए बताया, “जब गांधी साहब की लंबी प्रतिमा लगी होती थी तब ये चौक बहुत सुन्दर लगता था. प्रतिमा हटाए जाने के बाद ये चौक बिल्कुल उजड़ गया.”

गांधी की प्रतिमा

पाकिस्तान के जाने-माने लेखक अर्दशेर कोवास्जी ने बीबीसी को बताया कि कराची में सिंध उच्च न्यायालय के सामने एक चौक पर सन 1931 के असपास महात्मा गांधी की काँस्य प्रतिमा लगाई गई थी.

उनका कहना था, “महात्मा गांधी ने अंग्रेज़ों के विरुद्ध अंदोलन में बड़ी भूमिका निभाई थी और कराची के लोगों ने उनके सम्मान में उनकी कांस्य प्रतिमा लगवाई.”

कोवास्जी ने कहा कि विभाजन के बाद 1948 में जब कराची में हिंदू-मुसलिम दंगे हुए तो हिंदू समुदाय ने शहर छोड़ने शुरू किया. स्थिति काफ़ी गंभीर हो गई थी.

कराची के कबूर
एक बुज़ुर्ग बताते हैं कि गांधी की प्रतिमा होने पर चौक बहुत शानदार लगता था

उन्होंने बताया, “दंगों के दौरान, एक दिन मोहम्मद अली जिन्ना गांधी की प्रतिमा के सामने गुजर रहे थे और उन्होंने अपने निजी सचिव एसएम युसुफ़ को कहा कि जब तक स्थिति सामान्य नहीं हो जाती तब तक गांधी जी की प्रतिमा को हटा कर सुरक्षित जगह पर विस्थापित कर दें.”

अर्दशेर कोवास्जी ने बताया कि जिन्ना के निजी सचिव ने कराची के पूर्व मेयर जमशेद मेहता से संपर्क किया और उनकी मदद मांगी. बाद में बीवीएस पारसी स्कूल के कुछ छात्रों ने रात में जाकर गांधी की प्रतिमा वहाँ से हटा कर उनके घर रख दी. मेरे पिता ने उसी समय भारतीय उच्चायुक्त से संपर्क किया लेकिन स्थिति इतनी गंभीर थी कि उच्चायुक्त ने जवाब नहीं दिया.

 दंगों के दौरान, एक दिन मोहम्मद अली जिन्ना गांधी की प्रतिमा के सामने गुजर रहे थे और उन्होंने अपने निजी सचिव एसएम युसुफ़ को कहा कि जब तक स्थिति सामान्य नहीं हो जाती तब तक गांधी जी की प्रतिमा को हटा कर सुरक्षित जगह पर विस्थापित कर दें
अर्दशेर कोवास्जी

उनका कहना था कि उन्होंने महात्मा गांधी की प्रतिमा को घर से लेकर बीवीएस स्कूल में छिपा दिया. कराची में काफ़ी सालों बाद जब जन-जीवन सामान्य हो गया और उच्चायोग खुल गया तो प्रतिमा भारतीय अधिकारियों के हवाले कर दी गई. आख़िरकार 1988 में प्रतिमा को इस्लामाबाद में भारतीय उच्चायोग में विस्थापित कर दिया गया जहाँ वह आज तक अच्छी स्थिति में मौजूद है.

वरिष्ठ पत्रकार अब्दुल हमीद छापड़ा ने बताया कि सिंध उच्च न्यायालय के सामने जब महात्मा गांधी की प्रतिमा लगी हुई थी तब ये बड़ी शानदार जगह थी. उन का कहना था “जब इस चौक पर गांधी जी की प्रतिमा थी तब ये कराची का 'ट्रफ़ालगर स्क्वायर' कहा जाता था जैसा कि लंदन में ट्रफ़ालगर स्क्वायर है.”

उन्होंने कहा, "मैं छोटा था तो यहाँ हर रोज़ आता था क्योंकि उन दिनों हमारा घर क़रीब था. पहले कबूतर हमारे हाथों पर बैठते थे, हमारे क़रीब आते थे और बिल्कुल भी नहीं डरते थे. प्रतिमा हटाए जाने के बाद कबूतर बहुत डरते हैं और अब क़रीब भी नहीं आते."

अब्दुल हमीद छापड़ा ने कहा कि अब तो लोगों ने फ़ायरिंग करके कबूतरों को डरा दिया है. गांधी जी के कबूतर गांधी जी से बहुत प्यार करते हैं इसलिए कबूतरों ने महात्मा गांधी के स्थान को नहीं छोड़ा.

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