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शनिवार, 28 जनवरी, 2006 को 10:05 GMT तक के समाचार
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कहानी गांधी, उद्योगशाला और सहदेव की

सहदेव अपने नाती पोतो के साथ
महात्मा गांधी के दिखाए रास्ते पर चलने की जद्दोजहद
गांधी एक विचार था, जिसने हजारों जिंदगियां बदल दीं. सहदेव की जिंदगी उनमें से एक थी.

यह 13 साल के उस लड़के की कहानी है जो अपने गांव आमगाछी से दस कोस चलकर कमिश्नर से सिर्फ़ यह पूछने गया था कि वह पढ़ने कहां जाए.

सहदेव ने मौजूदा झारखंड के छोटे से गांव आमगाछी से 1940 में दिल्ली का रुख किया तो वह हरिजन सेवक संघ के स्कूल तलाश रहा था. जिसमें ठक्कर बापा जैसे लोग पढ़ाते थे.

किंग्सवे कैंप जहां आज भी हरिजन सेवक संघ का दफ्तर है, उसमें उस समय एक स्कूल और हरिजन छात्रों का छात्रावास भी था.

सहदेव ने इसी स्कूल में दाखिला ले लिया. "गांधीजी ने हरिजन छात्र-छात्राओं की पढ़ाई के लिए ही नहीं बल्कि उनके रहने के लिए छात्रावास भी बनाए थे, क्योंकि गांधीजी उनके रहने की परेशानी जानते थे. उस दौर के बड़े से बड़े नेता हरिजन सेवक संघ जरूर आते थे.

यहां एक उद्योगशाला खोली गई. उस जमाने का यह अच्छा खासा आईटीआई था, क्योंकि इसमें आधुनिक मशीनें लाई गई थीं. हालांकि बाद में इसे यहां से हटा दिया गया.

इस उद्योगशाला ने हज़ारों की संख्या में लोग प्रशिक्षित किए जिन्होंने देश के विभिन्न औद्योगिक उपक्रमों में काम किया.

सहदेव इस उद्योगशाला में पढ़ाई करने वाले सबसे पुराने लोगों में से हैं. पढ़ने के बाद यहीं नौकरी की.

करीब 80 साल की उम्र में भी उन्हें हरिजन सेवक संघ के परिसर की फिक्र है.

वह जिस मकान में रहते हैं, कभी डॉ. राजेंद्र प्रसाद रहते थे. बेशक वे वहीं हैं, लेकिन गांधी के विचार ने उनके और उनके परिवार की ज़िंदगी बदल दीं.

उनके बड़े बेटे चितरंजन दास बैंक में प्रबंधक हैं. छोटे बेटे उमाशंकर डॉक्टर हैं और बेटी आशा दास दिल्ली में प्राचार्य.

आशा दास के मुताबिक "आज हम जो कुछ हैं, हरिजन सेवक संघ के उस वातावरण की वजह से. गांधीजी के विचार ने हम तीनों ही भाई बहनों की जिंदगी पर असर डाला है. सत्य, समय और पाबंदी हमारे ज़िंदगी में बहुत महत्वपूर्ण हैं."

परिवर्तन का केंद्र

आजकल किंग्सवे कैंप की शक्ल बदलने की योजना पर ट्रस्ट विचार कर रहा है. लेकिन यह हरिजन सेवक संघ ही है जो हजारों ज़िंदगियों में परिवर्तन लाने का माध्यम बना.

 गांधीजी ने हरिजन सेवक संघ को आज़ादी के आंदोलन का चेतना केंद्र बना दिया था. वह हरिजनों को बुनियादी प्रशिक्षण देने को लेकर काफ़ी समर्पित थे
सहदेव

सहदेव याद करते हैं," गांधीजी ने हरिजन सेवक संघ को आज़ादी के आंदोलन का चेतना केंद्र बना दिया था. वह हरिजनों को बुनियादी प्रशिक्षण देने को लेकर काफ़ी समर्पित थे. वह जब भी दिल्ली आते, तमाम व्यस्तताओं के बावजूद एक बार किंग्सवे कैंप जरूर आते थे.''

वो कहते हैं कि हरिजन सेवक संघ के कामकाज को गांधीजी बड़ी गंभीरता से लेते थे. इसके लिए धन जुटाने में उन्हें कोई परेशानी नहीं आई थी. इंदिरा गांधी भी यहां नियमित आने वालों में से थीं.

कभी इस आंदोलन में अहम भूमिका निभाने वाले वियोगी हरि को याद करते हुए सहदेव बताते हैं "वियोगी हरि ने यहां ज़बर्दस्त काम किया था. वह अद्भुत व्यक्ति थे. उन्होंने देश के कई हिस्सों में स्कूल खोले."

गांधीजी जानते थे कि दलितों की बेहतरी का सबसे अच्छा तरीका यही है कि उन्हें बेहतर शिक्षा दी जाए.

सहदेव के मुताबिक, " हरिजन सेवक संघ के स्कूल से पढ़कर निकलने वाले छात्रों को रोज़गार की कोई समस्या नहीं रहती थी. बहुत से लोग सरकारी सेवाओं में चले गए. बहुत से निजी क्षेत्रों में काम करते थे. और वे पूरी तरह दक्ष होते थे."

सहदेव ने यहीं एकाउंटेंट का काम शुरू कर दिया और वे आज तक वहां हैं.

मुश्किलें

पिछले करीब एक दशक से हरिजन सेवक संघ आर्थिक संसाधनों के लिहाज से मुश्किल में हैं, लेकिन अब भी करीब 284 दलित बच्चों का एक आवासीय विद्यालय यहां संचालित किया जा रहा है.

सचिव हीरापाल गंग नेगी बताते हैं," मैं हरिजन सेवक संघ के कामकाज से तो डेढ़-दो साल पहले ही जुड़ा हूं. चूंकि संसाधन नहीं हैं इसलिए गांधी निर्माण ट्रस्ट के जरिए भवनों की मरम्मत, पुताई के अलावा कुछ निर्माण की योजनाएं हैं.''

नेगी दिल्ली में पढ़ाते हैं और दो घंटे का वक्त इस काम को देते हैं. उनका कहना है, " सहदेवजी या रामराज जी को भी बहुत कम पैसा दे पाते हैं. लेकिन हरिजन सेवक संघ के प्रति उनका समर्पण काबिले तारीफ़ है."

गांधी की उद्योगशाला के सहदेव और रामराज जैसे कुछ छात्र बराबर यहां आते हैं, भले ही स्वतंत्रता संग्राम के इस ऐतिहासिक स्मारक को अब कांग्रेस ने बिसरा दिया हो.

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